भारत इस समय डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी तकनीकों की बढ़ती मांग ने इस दिशा में निवेश को नई गति दी है, और देश धीरे-धीरे इस क्षेत्र के एक अहम केंद्र के रूप में उभरता दिख रहा है।
इस बदलाव में सरकार और निजी कंपनियां, दोनों की भूमिका अहम है। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक बड़े सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण घोषणाएं सामने आईं, जिनसे इस क्षेत्र में आने वाले समय की दिशा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इस पूरे प्रयास की रीढ़ केंद्र सरकार का इंडियाएआई मिशन है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025 में स्वीकृत इस मिशन के लिए कुल मिलाकर करीब दस हजार तीन सौ करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है, जिसका उद्देश्य देश में स्वतंत्र तकनीकी क्षमताएं विकसित करना है।
इस मिशन का मकसद केवल बड़ी घोषणाओं तक सीमित नहीं है। इसके तहत छात्रों, शोधकर्ताओं और नवाचार करने वाली कंपनियों को कंप्यूटिंग संसाधन उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि भारत की जरूरतों और भाषाओं के अनुरूप तकनीकी समाधान तैयार किए जा सकें।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, मिशन के तहत आईआईटी बंबई की अगुवाई वाले एक समूह को करीब नौ सौ अठासी करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इस राशि का उपयोग एक लाख करोड़ पैरामीटर वाले बड़े भाषा मॉडल के विकास के लिए किया जाएगा।
इसके साथ ही देश भर में पांच सौ से अधिक डेटा लैब स्थापित करने की योजना है। रिपोर्टों के अनुसार, इस काम के लिए आठ कंपनियों को चुना गया है, जिनमें टेक महिंद्रा, फ्रैक्टल एनालिटिक्स और भारतजेन जैसे नाम शामिल हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान देंगी।
राज्यों के स्तर पर भी बड़ी परियोजनाएं आकार ले रही हैं। नई दिल्ली के सम्मेलन के दौरान लार्सन एंड टुब्रो वियोमा ने गुजरात सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत कंपनी करीब पच्चीस हजार करोड़ रुपये का निवेश करने जा रही है।
यह परियोजना गुजरात के धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में 250 मेगावाट क्षमता वाला एक हरित डेटा सेंटर होगी, जिसके वर्ष 2028 तक शुरू होने की उम्मीद जताई गई है। बताया गया है कि गुजरात ने भी अपने बजट में तकनीक और डिजिटल सेवाओं के लिए आठ सौ करोड़ रुपये से अधिक की राशि रखी है।
डेटा सेंटर को हरित बताए जाने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है। ऐसे केंद्र बड़ी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं, इसलिए उन्हें अक्षय स्रोतों से मिलने वाली ऊर्जा से चलाने का विचार पर्यावरण की दृष्टि से लगातार अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।
जैसे-जैसे कंप्यूटिंग की मांग बढ़ती है, वैसे-वैसे ऊर्जा की जरूरत भी बढ़ती जाती है। ऐसे में स्वच्छ स्रोतों पर आधारित परियोजनाएं यह संकेत देती हैं कि तकनीकी विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ ले जाने की कोशिश की जा रही है, जो दीर्घकाल में उपयोगी हो सकती है।
इन घोषणाओं का असर केवल बड़े आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। मजबूत डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग ढांचा तैयार होने से देश के भीतर स्टार्टअप और शोध संस्थानों को बेहतर संसाधन मिल सकते हैं, जिससे नई तकनीकों पर काम करना पहले से आसान हो जाएगा।
हालांकि इतनी बड़ी परियोजनाओं के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। पर्याप्त बिजली, उपयुक्त भूमि और ठंडक बनाए रखने की व्यवस्था जैसी जरूरतें बड़े पैमाने पर सावधानीपूर्वक योजना की मांग करती हैं, ताकि ये केंद्र लंबे समय तक कारगर ढंग से काम कर सकें।
कुल मिलाकर, ये कदम दिखाते हैं कि भारत खुद को कंप्यूटिंग और डेटा के एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। आने वाले वर्षों में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि घोषित परियोजनाएं समय पर और टिकाऊ ऊर्जा के सहारे कितनी अच्छी तरह जमीन पर उतरती हैं।
