बेंगलुरु स्थित मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन में एक नर्सिंग छात्रा ने आत्महत्या कर ली, जिसके बाद पूरे संस्थान में हड़कंप मच गया है। पुलिस ने इस मामले में संस्थान के फैकल्टी सदस्यों के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न के आरोप में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की है। छात्रा के परिवार का आरोप है कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने लगातार उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिसके कारण वह इस कदर दबाव में आ गई कि उसने यह अंतिम कदम उठा लिया। यह घटना भारत के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की मानसिक सुरक्षा को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।
इस घटना के बाद मणिपाल अकादमी के सैकड़ों छात्र सड़कों पर उतर आए और प्रबंधन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। छात्रों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन फैकल्टी द्वारा किए जा रहे मानसिक उत्पीड़न की शिकायतों को लगातार नजरअंदाज करता रहा है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने प्रबंधन से दोषी शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई, एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन और छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र की स्थापना की मांग की। विश्वविद्यालय परिसर में तनाव का माहौल बना हुआ है और स्थानीय पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी है।
यह घटना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि लगभग इसी समय एमिटी यूनिवर्सिटी में भी एक MBA की छात्रा की गर्ल्स हॉस्टल की छत से गिरकर मौत हो गई। ये दोनों घटनाएं एक के बाद एक सामने आने से पूरे देश में शैक्षणिक संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में छात्रों पर अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, फैकल्टी द्वारा अपमानजनक व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी एक गहरी समस्या बन चुकी है। कई मामलों में छात्र शिकायत करने से भी डरते हैं क्योंकि उन्हें परिणाम भुगतने का डर होता है।
शिक्षा विशेषज्ञों और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने इन घटनाओं को लेकर भारत सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि हर विश्वविद्यालय में अनिवार्य रूप से काउंसलिंग सेवाएं उपलब्ध होनी चाहिए और फैकल्टी के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी तंत्र होना चाहिए। छात्र संगठनों ने भी देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है अगर सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। यह मामला एक बार फिर यह दर्शाता है कि भारत के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा और उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की तत्काल आवश्यकता है।
