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पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नाकाफी, कोटक ने कहा 17 रुपये प्रति लीटर और बढ़ाना जरूरी

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नाकाफी, कोटक ने कहा 17 रुपये प्रति लीटर और बढ़ाना जरूरी

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने पेट्रोल-डीजल की हालिया बढ़ोतरी को नाकाफी बताया है। कंपनियों को रोजाना 900 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है और 17 रुपये प्रति लीटर तक की और बढ़ोतरी जरूरी है।

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में की गई बढ़ोतरी को लेकर कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। कोटक की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा की गई यह कीमत वृद्धि "नाकाफी" है और तेल विपणन कंपनियों के भारी घाटे को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 900 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।

कोटक के विश्लेषकों का अनुमान है कि मौजूदा घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 17 रुपये प्रति लीटर तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी की आवश्यकता है। यह सुझाव आम उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है, क्योंकि ईंधन की कीमतों का सीधा असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और दैनिक जीवन की लगभग हर जरूरत पर पड़ता है। अगर सरकार इस सिफारिश को मानती है, तो पहले से महंगाई से जूझ रहे आम नागरिकों पर और बोझ बढ़ सकता है।

इस संकट की जड़ में वैश्विक ऊर्जा बाजार की अस्थिरता है। ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी भू-राजनीतिक तनाव ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों को तेजी से ऊपर धकेल दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है, वहां किसी भी तरह की बाधा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है। भारत, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है।

सरकार के सामने अब एक कठिन चुनौती है। एक तरफ इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों का भारी घाटा है, जो उनकी वित्तीय सेहत और शेयर बाजार में उनके प्रदर्शन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। दूसरी तरफ, ईंधन की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से महंगाई दर में उछाल आ सकता है, जिससे करोड़ों भारतीय परिवारों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को एक संतुलित नीति अपनानी होगी जिसमें कंपनियों को राहत भी मिले और आम जनता पर बोझ भी कम से कम पड़े। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार का फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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