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केंद्र सरकार ने लाहौल-स्पीति में चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना को मंजूरी दी, कोकसर में बनेगी करीब 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग

केंद्र सरकार ने लाहौल-स्पीति में चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना को मंजूरी दी, कोकसर में बनेगी करीब 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग

जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में केंद्र सरकार ने बहुचर्चित चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना को मंजूरी दे दी है, जिसे लेकर जल्द ही काम शुरू किया जाएगा। करीब 2352 करोड़ रुपए की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत चिनाब नदी की सहायक चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी का उपयोग किया जाएगा, और लाहौल घाटी के कोकसर क्षेत्र में लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी एक सुरंग बनाई जाएगी। साथ ही चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज भी तैयार होगा, जिससे नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकेगा। चंद्रा, चिनाब नदी का एक अहम हिस्सा है, और चिनाब उन वेस्टर्न रिवर्स में शामिल है जिनका अधिकतम जल उपयोग 1960 की इंडस वाटर ट्रीटी के तहत पाकिस्तान को मिला हुआ है। समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ जल विद्युत परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक और जल प्रबंधन से जुड़ा एक बड़ा कदम है, और इससे करीब 400 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की भी संभावना जताई जा रही है। परियोजना को NHPC द्वारा अंजाम दिया जाएगा।

जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में केंद्र सरकार ने बहुचर्चित चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना को मंजूरी दे दी है। इस परियोजना को लेकर जल्द ही काम शुरू किया जाएगा, और इसे प्रदेश तथा देश की जल सुरक्षा और ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक सकारात्मक और बेहतरीन प्रयास माना जा रहा है।

यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिस पर करीब 2352 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान है। इसके तहत चिनाब नदी की सहायक चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी का उपयोग किया जाएगा, ताकि उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सके।

परियोजना का एक अहम हिस्सा एक लंबी सुरंग है। योजना के तहत लाहौल घाटी के कोकसर क्षेत्र में लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी एक सुरंग बनाई जाएगी, जिसके जरिए चंद्रा नदी के पानी को आगे ले जाया जाएगा।

सुरंग के साथ-साथ नदी पर एक बैराज भी बनाया जाएगा। चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज तैयार किया जाएगा, जिससे नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकेगा और पानी को योजना के अनुरूप मोड़ा जा सकेगा।

इस परियोजना का एक बड़ा पहलू इसका सामरिक महत्व भी है। चंद्रा नदी, चिनाब नदी का एक अहम हिस्सा है, और चिनाब उन वेस्टर्न रिवर्स में शामिल है जिनका अधिकतम जल उपयोग 1960 की इंडस वाटर ट्रीटी के तहत पाकिस्तान को मिला हुआ है।

इसी वजह से इस परियोजना को सिर्फ पानी और बिजली से जोड़कर नहीं देखा जा रहा। इससे जहां पानी की जरूरतें और जल विद्युत क्षमता पूरी हो पाएगी, वहीं पाकिस्तान के साथ कूटनीतिक रिश्तों के लिहाज से भी यह परियोजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे पहले इस पानी को ब्यास बेसन में लाने की मांग भी उठाई गई थी।

परियोजना के समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ एक जल विद्युत परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक और जल प्रबंधन से जुड़ा एक बड़ा कदम है। प्रवीन शर्मा का तर्क है कि इससे हिमाचल प्रदेश में जल संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा। इस परियोजना से करीब 400 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की भी संभावना जताई जा रही है, और इसे NHPC द्वारा अंजाम दिया जाएगा।

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