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विक्रम-1 का प्रक्षेपण: भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट

विक्रम-1 का प्रक्षेपण: भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट

आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत के पहले निजी तौर पर बनाए गए ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का प्रक्षेपण किया गया। काउंटडाउन शून्य पर पहुंचते ही रॉकेट ने उड़ान भरी और इसके साथ ही भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने एक नया इतिहास रच दिया। इस रॉकेट को इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित कंपनी स्काईरूट ने तैयार किया है। मिशन को आगमन नाम दिया गया और रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। किसी तकनीकी कारण से प्रक्षेपण में लगभग 35 मिनट की देरी हुई और इसे दूसरी विंडो में अंजाम दिया गया। उड़ान के बाद रॉकेट ने अधिकतम वायुगतिकीय दबाव का क्षेत्र पार किया, प्रथम चरण का पृथक्करण हुआ तथा द्वितीय और तृतीय चरण का प्रज्वलन भी शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक ऐतिहासिक शुरुआत बताया।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए शनिवार का दिन एक ऐतिहासिक अवसर बन गया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से देश के पहले निजी तौर पर बनाए गए ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 का प्रक्षेपण किया गया। काउंटडाउन के शून्य तक पहुंचते ही रॉकेट ने आसमान की ओर उड़ान भरी और इसके साथ ही भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र एक नए दौर में दाखिल हो गया, जहां अब सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ निजी कंपनियां भी उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता रखती हैं।

प्रक्षेपण के इस क्षण को लाइव प्रसारण के जरिए देश और दुनिया ने देखा। मिशन कंट्रोल में मौजूद टीम की ओर से जैसे ही उड़ान की घोषणा हुई, विक्रम-1 को भारत के पहले निजी ऑर्बिटल प्रक्षेपण यान के रूप में दर्ज कर लिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस उपलब्धि को लेकर पोस्ट करते हुए इसे एक ऐतिहासिक शुरुआत बताया, जो देश के लिए गर्व का विषय है।

इस रॉकेट को स्काईरूट नामक कंपनी ने तैयार किया है, जिसे इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित किया गया था। यह प्रक्षेपण इस बात को दर्शाता है कि किस तरह कोई गैर-सरकारी कंपनी अब भारत में एक ऑर्बिटल रॉकेट को अंतरिक्ष में भेज सकती है। माना जा रहा है कि इससे भारत में भी उसी तरह का निजी अंतरिक्ष उद्योग खड़ा हो सकता है, जैसा अमेरिका में निजी क्षेत्र की कंपनियों के माध्यम से देखा जाता रहा है।

इस मिशन को आगमन नाम दिया गया है। वहीं रॉकेट का नाम विक्रम, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। स्काईरूट ने अपनी इस श्रृंखला के रॉकेटों का नाम उन्हीं के नाम पर रखा है। इससे पहले वर्ष 2022 में विक्रम-एस इसी श्रृंखला का हिस्सा था, जो एक सब-ऑर्बिटल प्रक्षेपण था, और अब उसी कड़ी में विक्रम-1 को प्रक्षेपित किया गया है।

उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने अपनी यात्रा के सबसे अहम चरणों को एक-एक कर पार किया। यान ने उस क्षेत्र को पार किया जहां उस पर सबसे अधिक वायुगतिकीय दबाव पड़ता है। इसके बाद प्रथम चरण का पृथक्करण हुआ और द्वितीय चरण का प्रज्वलन शुरू हुआ। इसके उपरांत तृतीय चरण का प्रज्वलन भी आरंभ हो गया और यान अपनी अंतरिक्ष यात्रा पर आगे बढ़ता चला गया, जबकि पूरी प्रक्रिया लगभग पंद्रह मिनट की बताई गई।

तकनीकी दृष्टि से भी विक्रम-1 को खास माना जा रहा है। इसकी बॉडी करीब 1.7 मीटर की है और इसे कार्बन कंपोजिट पदार्थ से बनाया गया है, जो स्टील से अधिक मजबूत होने के बावजूद वजन में हल्का होता है। रॉकेट लगभग 350 किलोग्राम पेलोड ले जाने में सक्षम बताया गया है। इस तरह की आधुनिक तकनीक से बना यह रॉकेट अपेक्षाकृत कम समय में तैयार हो जाता है और उपग्रहों को तेजी से अंतरिक्ष में स्थापित कर सकता है।

प्रक्षेपण से पहले किसी तकनीकी कारण से इसे कुछ समय के लिए रोकना पड़ा था और लगभग 35 मिनट की देरी के बाद इसे दूसरी विंडो में अंजाम दिया गया। पूरी टीम की लंबी मेहनत के बाद हुआ यह प्रक्षेपण भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे कम लागत में और तेजी से हल्के उपग्रह भेजने तथा उपग्रहों की पूरी श्रृंखला खड़ी करने का रास्ता खुल सकता है।

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