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हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की अनियंत्रित भीड़ गंभीर संकट बन गई है। शिमला में पिछले 24 दिनों में 6,31,000 वाहनों की एंट्री दर्ज की गई है और चार धाम यात्रा के पहले महीने में ही 55 तीर्थयात्रियों की मौत हो चुकी है, जिनमें 30 अकेले केदारनाथ रूट पर हुई हैं।
भारत के पहाड़ी इलाकों में इस गर्मी के सीजन में पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ ने भयावह स्तर छू लिया है। मैदानी इलाकों में पारा 45 डिग्री पार कर चुका है और लू के थपेड़ों से बचने के लिए लाखों लोगों ने पहाड़ों का रुख किया है। शिमला, मनाली, नैनीताल और मसूरी जैसे हिल स्टेशनों पर वाहनों की इतनी भीड़ है कि सोशल मीडिया पर लोग मजाक कर रहे हैं कि शहरों में कोई पीछे तो नहीं छूट गया।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 24 दिनों के भीतर अकेले शिमला में 6,31,000 वाहनों की एंट्री दर्ज की गई है। इनमें से 70,000 वाहन सिर्फ पिछले 72 घंटों में पहाड़ों पर पहुंचे हैं। केवल चंडीगढ़-कालका रूट से ही 3,70,000 गाड़ियां ऊपर गई हैं, जबकि किन्नौर, बिलासपुर और कुल्लू रूट से आने वाले वाहनों की संख्या भी इसी अनुपात में है। ये आंकड़े बताते हैं कि पहाड़ों की सड़कें अपनी क्षमता से कई गुना अधिक भार झेल रही हैं।
इससे भी गंभीर स्थिति उत्तराखंड में चार धाम यात्रा की है। राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार इस सीजन के शुरुआती एक महीने में ही स्वास्थ्य कारणों और अन्य वजहों से 55 तीर्थ यात्रियों की मौत हो चुकी है। इनमें सबसे अधिक 30 मौतें अकेले केदारनाथ रूट पर हुई हैं, जबकि बद्रीनाथ में 10, यमुनोत्री में 8 और गंगोत्री में 7 मौतें दर्ज की गई हैं।
यह डेटा स्पष्ट रूप से बताता है कि ऊंचाई पर बढ़ती भीड़ का दबाव सीधे तौर पर इंसानी जिंदगियों और चिकित्सा अवसंरचना पर भारी पड़ रहा है। कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह समय है धार्मिक पर्यटन के नाम पर जिस भीड़ को सरकारें अपनी उपलब्धि के रूप में गिना रही हैं, उस पर कैपिंग यानी सीमा निर्धारण की जाए। समस्या यह नहीं है कि लोग पहाड़ों पर क्यों आ रहे हैं, बल्कि यह है कि पहाड़ कितनी भीड़ और आबादी का बोझ सह सकते हैं।
पहाड़ी राज्यों की सरकारें इस भीड़ को राजस्व के नजरिए से देखती हैं, लेकिन बढ़ती मौतों और ट्रैफिक जाम का संकट अब नजरअंदाज करने लायक नहीं रहा। तुंगनाथ जैसे दुनिया के सबसे ऊंचाई पर बसे शिव मंदिर तक भी भीड़ का दबाव पहुंच चुका है। पर्यावरणविदों का कहना है कि पहाड़ों की पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक है और अनियंत्रित पर्यटन न सिर्फ यात्रियों की जान खतरे में डाल रहा है बल्कि इन क्षेत्रों के प्राकृतिक संतुलन को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है।