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बादानी फाउंडेशन की बसों से गांव की छात्राओं तक पहुंची पढ़ाई

बादानी फाउंडेशन की बसों से गांव की छात्राओं तक पहुंची पढ़ाई | AVALW News

ग्रामीण इलाकों की छात्राओं के लिए कॉलेज तक पहुंचना आसान बनाने वाली बादानी फाउंडेशन की बसों का बीते पांच वर्षों में करीब 664 छात्राएं लाभ उठा चुकी हैं, साथ ही महिलाओं को सिलाई जैसे हुनर भी सिखाए जा रहे हैं।

ग्रामीण इलाकों की छात्राओं के लिए कॉलेज तक पहुंचना अक्सर सबसे बड़ी चुनौती होती है, और इसी राह को बादानी फाउंडेशन की बसें आसान बना रही हैं। ये बसें छात्राओं को उनके गांव से कॉलेज तक लाने और ले जाने की सुविधा देती हैं। इससे उनकी पढ़ाई बिना किसी रुकावट के जारी रह पाती है। बीते पांच वर्षों में करीब 664 छात्राएं इस सुविधा का लाभ उठा चुकी हैं।

इस सुविधा का सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ा है जो पहले बेटियों को दूर पढ़ने भेजने में हिचकिचाते थे। अब बस की सुविधा आ जाने से परिवार बेफिक्र होकर बेटियों को कॉलेज भेज देते हैं। इससे आगे की पढ़ाई इन छात्राओं के लिए कहीं अधिक सुलभ हो गई है। गांव की लड़कियों के लिए यह बदलाव शिक्षा के दरवाज़े खोलने जैसा है।

फाउंडेशन का काम सिर्फ पढ़ाई तक पहुंचाने तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यहां सिलाई जैसे हुनर भी सिखाए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों से जुड़ी कई महिलाएं अपने सपनों को आकार देने में जुटी हैं। उनके लिए यह कमाई और पहचान, दोनों का जरिया बन रहा है।

रायखेडा गांव की रहने वाली प्रीति दीवर इसी बदलाव की एक मिसाल हैं। वे फैशन डिजाइनर बनने का सपना देखती हैं और उसे पूरा करने में जुटी हैं। उनका कहना है कि यहां आकर उन्हें पता चला कि कितनी महिलाएं काम कर रही हैं, जिसके बाद उन्होंने भी सिलाई सीखी। वे चाहती हैं कि उनके सिले हुए कपड़े पूरे देश तक पहुंचें।

गड़खेडा गांव की एक अन्य युवती के लिए यह कार्यक्रम आर्थिक संबल बन रहा है। उनका कहना है कि यहां से जो पैसा उन्हें मिलता है, वही उनकी कमाई बनकर उनके सपने को साकार करने में मदद करेगा। इस तरह यह पहल महिलाओं को आय का एक स्वतंत्र जरिया दे रही है। हुनर के साथ-साथ आत्मविश्वास भी इन महिलाओं तक पहुंच रहा है।

शिक्षा को घर-घर तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक स्तर पर भी कई मुहिम चलाई जा रही हैं। इनका मकसद यह है कि ज्यादा से ज्यादा परिवारों के लिए शिक्षा तक पहुंच आसान बने। बसों की सुविधा से लेकर हुनर सिखाने तक, यह पूरा प्रयास ग्रामीण महिलाओं और छात्राओं को सशक्त बनाने की दिशा में है। बीते पांच वर्षों के नतीजे बताते हैं कि यह बदलाव धीरे-धीरे जमीन पर दिख रहा है।

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