मल्टीप्लेक्स और ओटीटी के इस दौर में भारत के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर लगातार कम हो रहे हैं, फिर भी नॉस्टैल्जिया और फैनडम के दम पर आज भी टिके हुए हैं। यह कहानी है उन बड़े परदों की, जिन्होंने पीढ़ियों को सिनेमा से जोड़ा।
किसी छोटे शहर की मुख्य सड़क पर खड़ी वह ऊँची इमारत, बाहर लटके रंग बिरंगे पोस्टर और शाम होते ही टिकट खिड़की पर लगती लंबी कतार। दशकों तक भारत के लिए सिनेमा का यही चेहरा रहा है, और यह चेहरा था सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर का। एक बड़ा परदा, सैकड़ों सीटें और एक साथ हँसते रोते सैकड़ों अजनबी, यही इस देश का असली फिल्मी अनुभव हुआ करता था।
एक दौर की पहचान
सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर सिर्फ फिल्म दिखाने की जगह नहीं थे, वे एक सामाजिक ठिकाना थे जहाँ हर तबके का दर्शक एक ही परदे के सामने बैठता था। सामने की सस्ती सीटों से लेकर बालकनी तक, हर कोई एक ही कहानी में डूब जाता था। सीटी बजाना, तालियाँ पीटना और पसंदीदा संवाद पर शोर मचाना, यह सब मिलकर एक ऐसा साझा अनुभव बनाता था जिसकी बराबरी करना आसान नहीं है।
संख्या में लगातार गिरावट
बीते चार दशकों में इन सिनेमाघरों की संख्या तेज़ी से घटी है। अस्सी के दशक में देश भर में करीब बारह से तेरह हज़ार सिंगल स्क्रीन हुआ करते थे, जो सिनेमा प्रेमियों की सबसे बड़ी दुनिया थी। लेकिन साल दो हज़ार दस से दो हज़ार उन्नीस के बीच ही यह संख्या लगभग दस हज़ार से गिरकर सात हज़ार से भी नीचे पहुँच गई, और यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है।
आखिर बंद क्यों हो रहे हैं
इस गिरावट की कई वजहें हैं जो एक के बाद एक आती गईं। पहले टेलीविज़न ने घरों में मनोरंजन पहुँचाया, फिर वीसीआर और डीवीडी ने फिल्में घर तक ला दीं, और अब ओटीटी मंचों ने तो पूरी लाइब्रेरी जेब में रख दी है। इन सबके ऊपर कोविड महामारी ने ऐसी चोट की कि कई पुराने सिनेमाघर दोबारा अपने दरवाज़े कभी नहीं खोल पाए।
मल्टीप्लेक्स का उदय
जैसे जैसे सिंगल स्क्रीन घटे, वैसे वैसे मल्टीप्लेक्स का चलन बढ़ता गया। मौजूदा अनुमान के मुताबिक देश में मल्टीप्लेक्स परदों की संख्या करीब चार हज़ार से साढ़े चार हज़ार तक पहुँच चुकी है। आरामदेह सीटें, बेहतर ध्वनि, कई फिल्मों का एक साथ चयन और शॉपिंग मॉल का माहौल, इन सबने खासकर शहरी दर्शकों को अपनी ओर खींचा और सिनेमा जाने का तरीका ही बदल दिया।
दो हज़ार पच्चीस के आंकड़े
ताज़ा तस्वीर भी यही रुझान दिखाती है। फिक्की और ईवाई की दो हज़ार छब्बीस की रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल परदों की संख्या करीब एक प्रतिशत बढ़कर दस हज़ार तैंतीस तक पहुँची। लेकिन इस मामूली बढ़त के भीतर एक कड़वा सच छिपा है, क्योंकि साल के दौरान जहाँ दो सौ चालीस नए परदे जुड़े, वहीं एक सौ चौबीस परदे बंद भी हुए और इनमें ज़्यादातर सिंगल स्क्रीन ही थे।
टिकट की कीमत और आम दर्शक

सिंगल स्क्रीन की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उनकी कम टिकट कीमत रही है। जहाँ एक मल्टीप्लेक्स का टिकट कई बार आम परिवार के बजट से बाहर चला जाता है, वहीं मोहल्ले का पुराना सिनेमाघर आज भी सस्ते दाम पर बड़े परदे का अनुभव देता है। यही वजह है कि छोटे शहरों और गाँवों का बड़ा दर्शक वर्ग आज भी इन्हीं सिनेमाघरों पर निर्भर करता है।
नॉस्टैल्जिया और फैनडम का सहारा
कारोबारी दबाव के बावजूद कई सिंगल स्क्रीन आज भी जिंदा हैं, और इसकी बड़ी वजह है दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव। किसी बड़े सितारे की फिल्म के फर्स्ट डे फर्स्ट शो पर उमड़ती भीड़, परदे पर दूध चढ़ाना और नाचते गाते प्रशंसक, यह नज़ारा मल्टीप्लेक्स में शायद ही देखने को मिले। यह नॉस्टैल्जिया और फैनडम ही है जो इन पुराने परदों में आज भी जान फूँकता है।
सिनेमाघरों की अपनी भव्यता
इनमें से कई सिनेमाघर अपने आप में वास्तुकला का नमूना रहे हैं। जयपुर का राज मंदिर इसकी सबसे मशहूर मिसाल है, जहाँ की भव्य सजावट और शाही अंदाज़ देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं और फिल्म देखना अपने आप में एक यादगार अनुभव बन जाता है। ऐसे सिनेमाघर सिर्फ इमारतें नहीं, बल्कि अपने शहरों की सांस्कृतिक धरोहर बन चुके हैं।
शहर बनाम कस्बा
सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स की यह लड़ाई एक तरह से शहर और कस्बे की भी कहानी है। बड़े महानगरों में जहाँ मॉल और मल्टीप्लेक्स ने कब्ज़ा जमा लिया है, वहीं देश के कई छोटे शहरों और कस्बों में आज भी सिंगल स्क्रीन ही मनोरंजन का मुख्य ज़रिया बने हुए हैं। इसी वजह से गिनती के हिसाब से सिंगल स्क्रीन आज भी मल्टीप्लेक्स से आगे बने हुए हैं।
बदलाव के प्रयास
बाज़ार में बने रहने के लिए कुछ पुराने सिनेमाघर अब खुद को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं पर पुरानी सीटों की जगह आरामदेह कुर्सियाँ लगाई जा रही हैं, तो कहीं आवाज़ और परदे की गुणवत्ता सुधारी जा रही है ताकि वे मल्टीप्लेक्स के मुकाबले खड़े रह सकें। यह कोशिशें दिखाती हैं कि यह परंपरा आसानी से हार मानने को तैयार नहीं है।
एक सांस्कृतिक क्षति
जब कोई पुराना सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद होता है, तो सिर्फ एक इमारत नहीं टूटती, बल्कि यादों का एक पूरा संसार बिखर जाता है। जानकार इसे सिर्फ कारोबारी नुकसान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्षति मानते हैं, क्योंकि इसके साथ ही एक साथ बैठकर फिल्म देखने वाला वह साझा अनुभव भी धीरे धीरे खत्म होता जा रहा है जो पीढ़ियों की पहचान रहा है।
आगे की राह
आने वाले सालों में शायद सिंगल स्क्रीन कभी अपनी पुरानी बादशाहत वापस न पा सकें, लेकिन उनका पूरी तरह खत्म हो जाना भी तय नहीं है। सस्ती कीमत, भावनात्मक जुड़ाव और छोटे शहरों की ज़रूरत के दम पर वे अब भी एक अलग जगह रखते हैं। भारतीय सिनेमा की असली कहानी शायद इसी में है कि नया और पुराना, दोनों साथ साथ जिंदा रहें।