भारत में ओटीटी दर्शकों की संख्या 2026 में करीब 55 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। तमिल, तेलुगु और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का कंटेंट इस बढ़त का सबसे बड़ा आधार बन रहा है।
भारत में मनोरंजन देखने का तरीक़ा तेज़ी से बदल रहा है। बड़े परदे और टेलीविज़न की जगह अब मोबाइल और ओटीटी मंच ले रहे हैं, और इनके दर्शकों की संख्या हर साल करोड़ों की रफ़्तार से बढ़ रही है। सबसे ख़ास बात यह है कि इस बढ़त में क्षेत्रीय भाषाओं का कंटेंट सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है।
करोड़ों दर्शक, बढ़ता बाज़ार
आँकड़े इस बड़े बदलाव की तस्वीर साफ़ कर देते हैं। भारत में ओटीटी वीडियो देखने वालों की संख्या साल 2025 के लगभग बावन करोड़ से बढ़कर, 2026 में करीब पचपन करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। यह दिखाता है कि डिजिटल मनोरंजन अब देश के हर हिस्से तक तेज़ी से फैल चुका है।
यह वृद्धि यहीं रुकने वाली नहीं है। अनुमान है कि साल 2029 तक ओटीटी दर्शकों की संख्या लगभग तिरसठ करोड़ तक पहुँच सकती है। इसी के साथ, सब्सक्रिप्शन से होने वाली कमाई भी 2025 के करीब नौ हज़ार एक सौ बीस करोड़ रुपये से बढ़कर, 2026 में लगभग दस हज़ार तीन सौ करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है।
क्षेत्रीय कंटेंट की बढ़ती ताक़त

इस पूरे बदलाव के केंद्र में क्षेत्रीय भाषाओं का कंटेंट है। तमिल, तेलुगु, मलयालम, बंगाली और मराठी जैसी भाषाओं के कार्यक्रमों की दर्शक संख्या में, साल 2026 की पहली छमाही में ज़बरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दर्शक अब अपनी ही भाषा में बनी कहानियों को कहीं अधिक पसंद कर रहे हैं।
इस बढ़त का एक बड़ा हिस्सा छोटे शहरों से आ रहा है। टियर टू और टियर थ्री शहरों के दर्शक, जो अपनी भाषा में मनोरंजन चाहते हैं, नए सब्सक्राइबरों की बढ़त का मुख्य आधार बन गए हैं। यही वजह है कि तमाम मंच अब क्षेत्रीय कंटेंट में जमकर निवेश कर रहे हैं।
दक्षिण भारतीय सिनेमा का दबदबा
इस दौर में दक्षिण भारतीय सिनेमा ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ख़ासकर तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फ़िल्म उद्योग, कहानी कहने की कला और शानदार विज़ुअल इफेक्ट्स के मामले में लगातार नए मानक स्थापित कर रहे हैं, जिन्हें पूरे देश और विदेश में ख़ूब सराहा जा रहा है।
जानकारों का यह भी मानना है कि आने वाले समय में ओटीटी पर हिंदी के मुक़ाबले अन्य भारतीय भाषाओं का कंटेंट आगे निकल सकता है। यह रुझान भारत की भाषाई विविधता और हर क्षेत्र के दर्शकों की अपनी कहानियों के प्रति बढ़ती हुई रुचि को साफ़ दर्शाता है।
मंचों की रणनीति
विभिन्न ओटीटी मंच अपनी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस क्षेत्र में जियोहॉटस्टार सबसे आगे है, जिसके करीब दस करोड़ सब्सक्राइबर और लगभग पचास करोड़ सक्रिय उपयोगकर्ता बताए जाते हैं। वहीं सोनीलिव के भी तक़रीबन तीन करोड़ तैंतीस लाख सब्सक्राइबर हैं।
बाज़ार में कई और बड़े नाम भी सक्रिय हैं। अमेज़न प्राइम वीडियो के करीब दो करोड़ और नेटफ्लिक्स के लगभग एक करोड़ तैंतीस लाख भारतीय सब्सक्राइबर हैं, जबकि ज़ी5 जैसे मंच क्षेत्रीय भाषाओं में मौलिक कंटेंट के दम पर अपनी एक ख़ास जगह बनाए हुए हैं।
मोबाइल पर बदलता मनोरंजन
इस पूरे बदलाव को मोबाइल फ़ोन ने और तेज़ कर दिया है। सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन की पहुँच बढ़ने के साथ, अब गाँव और छोटे शहरों के लोग भी आसानी से अपनी पसंद का कंटेंट देख पा रहे हैं। इसी वजह से मंच अब मोबाइल पर बेहतर अनुभव देने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
पारंपरिक सिनेमा के लिए चुनौती
ओटीटी के इस तेज़ उभार ने पारंपरिक सिनेमाघरों के सामने भी नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। जब दर्शकों के पास घर बैठे इतने सारे विकल्प मौजूद हों, तो किसी फ़िल्म को सिनेमाघर तक खींच लाने के लिए उसका वास्तव में ख़ास और यादगार होना, पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है।
कंटेंट का लोकतंत्र
भारत में ओटीटी का यह बढ़ता दौर एक तरह से कंटेंट के लोकतंत्र जैसा है, जहाँ हर भाषा और हर क्षेत्र की कहानियों को अपना दर्शक मिल रहा है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव भारतीय मनोरंजन उद्योग की दिशा और उसके स्वरूप को और गहराई से बदलता हुआ नज़र आएगा।
क्षेत्रीय कंटेंट: साफ और अच्छे से समझाया.
यहाँ क्षेत्रीय कंटेंट के बारे में काफी कुछ सीखा.
विवरण के लिए धन्यवाद.
सच.
सहमत हूँ.
मैं भी यही सोचता हूँ.

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