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CULTURE · INDIA

पांच हज़ार साल की मिट्टी: हड़प्पा से दीये तक भारत की टेराकोटा परंपरा

सिद्धार्थ मल्होत्रा सिद्धार्थ मल्होत्रा siddharthmalhotra.avalw.com · 272 reads Respect0 Save Share Read only
READS394live count PUBLISHED11 Sept2026 READING TIME4 min749 words LANGUAGEHindi
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चाक पर घूमती मिट्टी और कुम्हार के मेहनतकश हाथ, यह कला भारत की सबसे पुरानी जीवित परंपराओं में से एक है। सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू होकर बांकुरा के घोड़े, मोलेला की मूर्तियों और जयपुर की ब्लू पॉटरी तक, पुराने बाज़ारों के कारीगरों को कैमरे में उतारने वाले एक पत्रकार की नज़र से यह कहानी।

पुराने बाज़ारों की गलियों में घूमते हुए, कारीगरों के हाथों की मेहनत को कैमरे में उतारना मेरा शौक है। इन्हीं में से एक दृश्य मुझे हमेशा मंत्रमुग्ध कर देता है, जब कोई कुम्हार अपने चाक पर मिट्टी के एक बेडौल लोंदे को, अपनी उंगलियों के हल्के से स्पर्श से, धीरे-धीरे एक बेहद खूबसूरत आकार में ढाल देता है।

मिट्टी के बर्तन बनाने की यह कला, जिसे हम टेराकोटा भी कहते हैं, भारत की सबसे पुरानी और आज भी पूरी तरह जीवित शिल्प परंपराओं में से एक है। सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर आज दीवाली पर जगमगाने वाले नन्हे दीयों तक, इसकी कहानी हज़ारों साल लंबी और बेहद दिलचस्प है।

पांच हज़ार साल पुरानी विरासत

भारत में मिट्टी शिल्प की जड़ें बेहद गहरी हैं। इतिहासकार मानते हैं कि इसकी शुरुआत लगभग ईसा पूर्व पच्चीस सौ में, यानी सिंधु घाटी की हड़प्पा सभ्यता के दौर में हुई थी। उस ज़माने के लोग बारीकी से पकाई गई लाल मिट्टी से तरह-तरह के बर्तन और छोटी-छोटी मूर्तियां बनाया करते थे।

इसके बाद यह कला धीरे-धीरे पूरे देश में फैलती चली गई। करीब साढ़े तीन हज़ार साल पहले, बिहार, झारखंड, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे कई इलाकों ने मिट्टी के काम की अपनी-अपनी अलग और बिल्कुल विशिष्ट शैलियां विकसित कर लीं, जो आज भी हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं।

चाक पर घूमती मिट्टी

साधारण गीली मिट्टी, कुशल हाथों और घूमते चाक के जादू से एक जीवंत आकार ले लेती है। यही हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है।
साधारण गीली मिट्टी, कुशल हाथों और घूमते चाक के जादू से एक जीवंत आकार ले लेती है। यही हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है।

इस पूरी कला के केंद्र में होता है कुम्हार और उसका चाक। साधारण सी दिखने वाली गीली मिट्टी, कुशल हाथों के जादू से तेज़ी से घूमते चाक पर एक जीवंत आकार ले लेती है। इसके बाद इन बर्तनों को कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता है और फिर तेज़ आंच में पकाकर मजबूत और टिकाऊ बनाया जाता है।

यह हुनर किसी किताब से नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी, पिता से बेटे और गुरु से शिष्य तक हाथों-हाथ पहुंचता आया है। इन कारीगरों की मिट्टी में सनी उंगलियों में मानो सदियों का अनुभव बसा होता है, और यही मेहनत मुझे हर बार अपने कैमरे में उसे कैद करने के लिए प्रेरित करती रहती है।

बांकुरा का घोड़ा

भारत के अलग-अलग हिस्सों की अपनी-अपनी मशहूर शैलियां हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध है पश्चिम बंगाल के बांकुरा ज़िले के पांचमुड़ा गांव का बांकुरा घोड़ा। कुम्भकार समुदाय के कुशल कारीगरों द्वारा बनाया गया, लंबी गर्दन वाला यह अनोखा घोड़ा कभी स्थानीय अनुष्ठानों में इस्तेमाल किया जाता था।

आज यही बांकुरा घोड़ा भारतीय लोक कला की एक बड़ी पहचान बन चुका है और देश के साथ-साथ विदेशों में भी खूब सराहा जाता है। इसकी सादगी और बेहद अनोखी बनावट इसे बाकी सब शैलियों से अलग करती है, और यह हमारी समृद्ध ग्रामीण कलात्मक विरासत का एक बेहतरीन उदाहरण है।

मोलेला और जयपुर की नीली मिट्टी

राजस्थान के मोलेला गांव की परंपरा भी अपने आप में बेहद खास है। यहां के कारीगर मिट्टी से देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं, लेकिन एक बिल्कुल अनोखे अंदाज़ में। ज़्यादातर टेराकोटा जहां त्रि-आयामी मूर्तियों पर ध्यान देता है, वहीं मोलेला के शिल्पी उभरी हुई राहत-नक्काशी में गहरी महारत रखते हैं।

वहीं राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर, अपनी ब्लू पॉटरी यानी नीली मिट्टी के बर्तनों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इन बर्तनों पर चढ़ी चमकीली नीली परत इन्हें एक शाही और बेहद आकर्षक रूप देती है, जो इसे भारत की सबसे विशिष्ट और पहचानी जाने वाली शिल्प शैलियों में से एक बनाती है।

दीये से लेकर सुराही तक

यह कला सिर्फ सजावट या मूर्तियों तक ही सीमित नहीं है। दीवाली पर जगमगाते मिट्टी के दीये, गर्मियों में पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने वाली सुराही और मटका, और चाय वाला मिट्टी का कुल्हड़, ये सब आज भी हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं और सीधे इन्हीं कुम्हारों के हाथों से निकलते हैं।

दिल्ली के उत्तम नगर में स्थित कुम्हार ग्राम जैसी जगहें, आज भी इस पुरानी परंपरा को बखूबी जीवित रखे हुए हैं। यहां राजस्थान और हरियाणा से आए सैकड़ों कारीगर मिलकर दीये, लैंप और तरह-तरह के सजावटी टेराकोटा सामान बनाते हैं, और पूरा इलाका हमेशा गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू से भरा रहता है।

मिट्टी में बसी पहचान

हालांकि आज यह पुरानी कला कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। प्लास्टिक और स्टील के सस्ते बर्तनों ने धीरे-धीरे मिट्टी की जगह लेनी शुरू कर दी है, जिससे कई कुम्हार परिवारों का गुज़ारा मुश्किल हो गया है। ऐसे में जीआई टैग जैसी पहल इन शिल्पों को नई पहचान और थोड़ी सुरक्षा देने की कोशिश कर रही हैं।

मेरे लिए मिट्टी का हर बर्तन सिर्फ एक चीज़ नहीं, बल्कि पांच हज़ार साल पुरानी विरासत को अपने भीतर थामे हुए एक जोड़ी मेहनतकश हाथों की जीती-जागती कहानी है। जब भी हम बाज़ार से एक साधारण मिट्टी का दीया खरीदते हैं, तो असल में हम इसी जीवित परंपरा और उसके कारीगरों को जिंदा रखने में मदद करते हैं।

4 responses

बांकुरा घोड़ा: कहीं और से बेहतर बताया.

4

एक शांत सोचा समझा लेख.

4

यहाँ बांकुरा घोड़ा के बारे में काफी कुछ सीखा.

2

बिल्कुल.

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सिद्धार्थ मल्होत्रा 2026-09-11 · 4 min read · 394 reads
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