avalw
CULTURE · INDIA

जेब में खनकता इतिहास: भारतीय सिक्कों का ढाई हज़ार साल पुराना सफर

सिद्धार्थ मल्होत्रा सिद्धार्थ मल्होत्रा siddharthmalhotra.avalw.com · 272 reads Respect0 Save Share Read only
READS641live count PUBLISHED12 Sept2026 READING TIME3 min663 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

जेब में खनकते साधारण से सिक्कों के पीछे ढाई हज़ार साल का गौरवशाली इतिहास छिपा है। प्राचीन पंच-मार्क सिक्कों से लेकर गुप्तकालीन सोने के सिक्कों, शेरशाह सूरी के रुपये और आज के दशमलव सिक्कों तक, यह सफर भारत की सभ्यता की अनोखी कहानी कहता है।

हम सब की जेब में रोज़ खनकने वाले साधारण से सिक्कों पर हमारी नज़र भला कितनी बार ठहरती है। लेकिन इन छोटे-छोटे धातु के टुकड़ों के पीछे असल में ढाई हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना एक बेहद रोचक और गौरवशाली इतिहास चुपचाप छिपा हुआ है, जो हमारी पूरी सभ्यता की कहानी अपने भीतर समेटे रखता है।

ढाई हज़ार साल पुराना सफर

भारत उन गिनी-चुनी सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, जहाँ सबसे पहले सिक्कों का इस्तेमाल शुरू हुआ था। माना जाता है कि हमारे देश में लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास सिक्के चलन में आए, यानी आज से करीब ढाई हज़ार साल पहले ही लोग इनका लेन-देन में इस्तेमाल करने लगे थे।

उस ज़माने के सबसे शुरुआती सिक्कों को पंच-मार्क सिक्के कहा जाता है, और इनका नाम इनके बनने के अनोखे तरीके पर ही रखा गया था। चांदी या तांबे के छोटे-छोटे टुकड़ों पर अलग-अलग चिह्नों के ठप्पे ठोककर ये सिक्के तैयार किए जाते थे, जो देखने में आज के गोल सिक्कों से काफ़ी अलग हुआ करते थे।

चेहरों और कला का दौर

समय के साथ सिक्कों की बनावट और उन पर उकेरी जाने वाली कलाकारी भी लगातार निखरती चली गई। इतिहासकार मानते हैं कि भारत में इंडो-ग्रीक शासकों ने ही सबसे पहले अपने सिक्कों पर शासक का चेहरा और उसका नाम बड़ी बारीकी से अंकित करने की परंपरा की शुरुआत की थी।

सिक्का कला अपने चरम पर तब पहुँची जब गुप्त काल में, यानी लगभग चौथी से छठी शताब्दी के बीच, सोने के बेहद सुंदर और कलात्मक सिक्के ढाले गए। इन पर राजाओं, देवी-देवताओं और विभिन्न प्रतीकों की इतनी बारीक नक्काशी होती थी कि इस दौर को अक्सर भारतीय सिक्का कला का स्वर्ण युग कहा जाता है।

जब जन्मा रुपया

आज हम जिस रुपये को अपनी मुद्रा के रूप में जानते हैं, उसकी असली जड़ें सोलहवीं शताब्दी में जाकर मिलती हैं। सन् पंद्रह सौ चालीस के आसपास शेरशाह सूरी ने चांदी का एक सिक्का जारी किया, जिसका वज़न लगभग साढ़े ग्यारह ग्राम था और जिसे रुपया कहा गया। आधुनिक भारतीय रुपया इसी ऐतिहासिक सिक्के की सीधी संतान माना जाता है।

इसके बाद मुगल बादशाहों और देश की तमाम रियासतों ने भी अपने-अपने सिक्के ढाले, जिन पर अक्सर फ़ारसी लिपि की बेहद खूबसूरत सुलेख देखने को मिलती है। आगे चलकर ब्रिटिश शासन के दौरान सिक्कों की बनावट और उन पर छपने वाले चिह्नों में एक बार फिर बड़ा बदलाव आया।

आना, चवन्नी और दशमलव

आज़ादी मिलने के कुछ वर्षों बाद, सन् उन्नीस सौ सत्तावन में भारत ने सिक्कों की दशमलव प्रणाली को अपनाया, जिसके तहत एक रुपये को सौ पैसों में बाँट दिया गया। इससे पहले हिसाब कुछ और ही हुआ करता था, जहाँ एक रुपये में सोलह आने होते थे, और आना, चवन्नी तथा अठन्नी जैसे नाम हर किसी की ज़ुबान पर चढ़े रहते थे।

आज की जेब तक

आज हमारी जेब में खनकते सिक्के, जिन पर अशोक स्तंभ का राजचिह्न अंकित होता है, दरअसल ढाई हज़ार साल पुरानी एक समृद्ध परंपरा के सीधे उत्तराधिकारी हैं।
आज हमारी जेब में खनकते सिक्के, जिन पर अशोक स्तंभ का राजचिह्न अंकित होता है, दरअसल ढाई हज़ार साल पुरानी एक समृद्ध परंपरा के सीधे उत्तराधिकारी हैं।

आज हमारी जेब में मौजूद हर सिक्के पर हमें अशोक स्तंभ का वही गौरवशाली राजचिह्न देखने को मिलता है, जो हमारे राष्ट्र की पहचान बन चुका है। भले ही आज हम डिजिटल भुगतान के दौर में जी रहे हों, पर सिक्कों और नोटों का अपना एक अलग महत्व और भरोसा आज भी पूरी तरह कायम है।

देश की मुद्रा को जारी करने और उस पर नज़र रखने की पूरी ज़िम्मेदारी आज भारतीय रिज़र्व बैंक के कंधों पर है। एक साधारण सी दिखने वाली इस व्यवस्था के पीछे, सदियों के अनुभव और लगातार होते सुधारों की एक बेहद लंबी और दिलचस्प कहानी छिपी हुई है।

इतिहास के मूक गवाह

असल में सिक्के केवल लेन-देन का ज़रिया भर नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के मूक गवाह भी होते हैं। किसी एक पुराने सिक्के को ध्यान से देखकर ही हम उस दौर के शासक, प्रचलित धर्म, कला की शैली, इस्तेमाल होने वाली भाषा और यहाँ तक कि उस समय की आर्थिक हालत तक का अंदाज़ा बड़ी आसानी से लगा सकते हैं।

यही वजह है कि पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के लिए पुराने सिक्के किसी अनमोल खज़ाने से कम नहीं होते। इसलिए अगली बार जब आपके हाथ में कोई सिक्का आए, तो कुछ पल ठहरकर यह ज़रूर सोचिएगा कि आपकी हथेली पर रखा यह छोटा सा टुकड़ा दरअसल ढाई हज़ार साल पुरानी एक जीवंत परंपरा का उत्तराधिकारी है।

6 responses

यहाँ भारतीय सिक्के के बारे में काफी कुछ सीखा.

4

स्पष्ट और अच्छा लिखा.

3

भारतीय सिक्के: साफ और अच्छे से समझाया.

2

अच्छा कहा.

0
सिद्धार्थ मल्होत्रा
Follow this desk
सिद्धार्थ मल्होत्रा
Create a free account to follow सिद्धार्थ मल्होत्रा. New stories land in your feed, and you can save any of them to your own reading lists.
Your library & lists →
सिद्धार्थ मल्होत्रा
WRITTEN BY THE AUTHOR
सिद्धार्थ मल्होत्रा 2026-09-12 · 3 min read · 641 reads
View profile →
VERIFY THIS STORY
ASK AI
सिद्धार्थ मल्होत्रा Keep following सिद्धार्थ मल्होत्राHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Up next
More
Statistics Search Become a creator Alliances About Terms Privacy