सेमिकॉन इंडिया 2026 में भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा साफ दिखी। बारह स्वीकृत इकाइयाँ, पाँच में उत्पादन शुरू और नई नीति के साथ देश चिप निर्माण की ओर बढ़ रहा है।
आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर कार, फ्रिज, एटीएम और अस्पताल की मशीनों तक, हर आधुनिक उपकरण के भीतर एक नन्हा सा सेमीकंडक्टर चिप धड़कता है। यही चिप आज की डिजिटल दुनिया की असली रीढ़ है। लंबे समय तक भारत इन चिपों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर रहा, लेकिन अब तस्वीर तेज़ी से बदल रही है और देश खुद अपनी चिप बनाने की दिशा में मज़बूत कदम बढ़ा रहा है।
सेमिकॉन इंडिया 2026 का मंच
इसी बदलाव की झलक हाल ही में सेमिकॉन इंडिया 2026 में दिखाई दी। यह आयोजन 17 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में शुरू हुआ और तीन दिनों तक चला, जिसमें दुनिया भर की कंपनियाँ और विशेषज्ञ एक साथ जुटे। इस बार आयोजन का विषय था सिलिकॉन से सिस्टम तक, यानी केवल कच्चा चिप बनाना नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र को देश के भीतर खड़ा करना।
यह विषय अपने आप में भारत की सोच को दर्शाता है। लक्ष्य सिर्फ यह नहीं है कि विदेशों से मँगाई जाने वाली चिपों की जगह देसी चिप ले लें, बल्कि यह है कि डिज़ाइन से लेकर निर्माण, पैकेजिंग और अंतिम उत्पाद तक की पूरी शृंखला भारत में ही विकसित हो। यही वजह है कि इस आयोजन को देश के तकनीकी भविष्य की दिशा तय करने वाला एक अहम पड़ाव माना जा रहा है।
आयात का भारी बोझ
भारत के इस अभियान की गंभीरता को समझने के लिए आयात के आँकड़ों पर नज़र डालना ज़रूरी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2017 से 2025 के बीच देश ने चिपों के आयात पर लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए, और यह खर्च हर साल तेज़ी से बढ़ता रहा। इतनी बड़ी राशि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता के जोखिम को साफ तौर पर उजागर करती है।
जब किसी देश की इतनी सारी ज़रूरतें बाहर से आने वाले एक ही तरह के पुर्ज़े पर टिकी हों, तो वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आई कोई भी रुकावट सीधे उसकी अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। बीते वर्षों में दुनिया ने चिपों की किल्लत के कारण कई उद्योगों को ठप होते देखा है। इसी सबक ने भारत को अपनी खुद की निर्माण क्षमता खड़ी करने की ओर प्रेरित किया है।
बारह इकाइयाँ, कई राज्य

इस दिशा में हुई प्रगति ठोस आँकड़ों में भी दिखती है। अब तक देश भर में कुल बारह सेमीकंडक्टर इकाइयों को मंज़ूरी दी जा चुकी है, और इनमें से पाँच में व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू हो चुका है। ये इकाइयाँ गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों में फैली हुई हैं, जिससे यह अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है।
इन बारह इकाइयों की बनावट भी विविध है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब और एक गैलियम नाइट्राइड आधारित माइक्रो एलईडी डिस्प्ले फैब शामिल है, जबकि शेष नौ इकाइयाँ चिपों की असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग यानी एटीएमपी और ओसैट श्रेणी की हैं। यह मिश्रण दिखाता है कि भारत पूरी शृंखला के अलग-अलग हिस्सों पर एक साथ काम कर रहा है।
ढोलेरा और वैश्विक साझेदारी
इस पूरे तंत्र में गुजरात के ढोलेरा में बन रही टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की इकाई को खास तवज्जो मिल रही है। इसे ताइवान की कंपनी पीएसएमसी के सहयोग से बनाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार यह इकाई 90 नैनोमीटर नोड पर काम करने की क्षमता रखेगी और 28 से लेकर 110 नैनोमीटर तक की चिप बनाने में सक्षम होगी, जो कई रोज़मर्रा के उपकरणों के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती हैं।
व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने वाली कंपनियों में माइक्रोन, केन्स सेमीकॉन और सीजी सेमी जैसे नाम शामिल बताए गए हैं। इनका आगे बढ़ना इस बात का संकेत है कि भारत में बनी पैकेज्ड चिप अब केवल कागज़ी योजना नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बनने लगी है। हर नई शुरू होती इकाई के साथ देश की निर्माण क्षमता का दायरा धीरे-धीरे और चौड़ा होता जा रहा है।
नीति और डिज़ाइन की ताकत
इस उछाल के पीछे लगातार चलती नीतिगत कोशिशें हैं। दिसंबर 2021 में शुरू हुए पहले चरण के लिए लगभग 76,000 करोड़ रुपये रखे गए थे, और जुलाई 2026 में दूसरे चरण, यानी सेमिकॉन 2.0 के लिए करीब 1,27,500 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी गई। इसके साथ ही स्वीकृत परियोजनाओं में कुल मिलाकर 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश जुड़ चुका है।
निर्माण के साथ-साथ डिज़ाइन के मोर्चे पर भी भारत की स्थिति मज़बूत है। रिपोर्टों के अनुसार करीब 900 करोड़ रुपये की चौबीस डिज़ाइन परियोजनाएँ चल रही हैं और तीन सौ से अधिक चिप डिज़ाइन तैयार किए जा चुके हैं। एक बड़ी बात यह भी है कि दुनिया के चिप डिज़ाइन से जुड़े कार्यबल का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा भारत में ही मौजूद है, जो देश की गहरी प्रतिभा को दर्शाता है।
आगे की राह
बेशक यह सफर आसान नहीं है। सेमीकंडक्टर निर्माण बेहद पूँजी और तकनीक पर निर्भर क्षेत्र है, जिसमें कुशल कर्मचारी, भरोसेमंद बिजली-पानी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी कई चुनौतियाँ सामने खड़ी हैं। फिर भी, स्वीकृत इकाइयों, बढ़ते निवेश और डिज़ाइन की गहरी जड़ों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत ने अपनी चिप कहानी का एक ठोस और भरोसेमंद आधार तैयार कर लिया है।

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