मोबाइल से चंद सेकंड में पैसे भेजने वाला यूपीआई आज भारत की जेब बदल चुका है। यह कैसे काम करता है, कब शुरू हुआ और कितना बड़ा हो चुका है, आइए उपलब्ध जानकारी के आधार पर आसान भाषा में समझते हैं।
चाय की एक छोटी दुकान हो या बड़ा शोरूम, आज भारत में लगभग हर जगह लोग जेब से नकदी निकालने के बजाय मोबाइल फोन निकालते हैं, एक कोड स्कैन करते हैं और पलक झपकते ही भुगतान कर देते हैं। इस बदलाव के पीछे जो व्यवस्था काम कर रही है, उसका नाम है यूपीआई। इस लेख में हम उपलब्ध जानकारी के आधार पर आसान भाषा में समझेंगे कि यूपीआई आखिर है क्या, यह कब शुरू हुआ, कैसे काम करता है और कितना बड़ा हो चुका है।
आखिर यूपीआई है क्या
सबसे पहले बुनियादी बात समझ लेते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूपीआई भारत में सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली डिजिटल भुगतान व्यवस्था है, जो मोबाइल फोन के जरिए एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में तुरंत पैसे भेजने की सुविधा देती है। यानी पैसा भेजने के लिए न तो बैंक जाने की जरूरत है और न ही किसी लंबी प्रक्रिया की, बस कुछ ही सेकंड में लेनदेन पूरा हो जाता है।
किसने किया इसे तैयार
यह व्यवस्था अपने आप नहीं बनी, इसके पीछे एक खास संस्था है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूपीआई को नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, यानी एनपीसीआई ने तैयार किया है, और यह भारतीय रिज़र्व बैंक की देखरेख में काम करती है। किसी भरोसेमंद संस्था की निगरानी में होने के कारण ही आम लोग इस व्यवस्था पर आसानी से भरोसा कर पाते हैं और रोजमर्रा के लेनदेन में इसका इस्तेमाल करते हैं।
साल 2016 में हुई शुरुआत

यूपीआई का सफर कुछ साल पहले शुरू हुआ था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी शुरुआती शुरुआत 11 अप्रैल 2016 को मुंबई में हुई थी, जब भारतीय रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने इसका उद्घाटन किया और शुरुआत में इससे 21 बैंक जुड़े थे। वहीं से यह व्यवस्था धीरे धीरे आगे बढ़ती गई और देखते ही देखते देश के करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई।
यह काम कैसे करता है
अब सवाल यह है कि यह पूरी प्रक्रिया चलती कैसे है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हर उपयोगकर्ता के पास एक खास पहचान होती है, जिसे यूपीआई पहचान या वर्चुअल भुगतान पता कहा जाता है। इसी पहचान की मदद से दो बैंक खातों के बीच सीधे पैसे भेजे जा सकते हैं। भुगतान करते समय आपको बस अपना गोपनीय पिन डालना होता है, और उसी से यह पुष्टि होती है कि लेनदेन आप ही कर रहे हैं।
क्यूआर कोड से आसान भुगतान
यूपीआई को इतना लोकप्रिय बनाने में क्यूआर कोड की बड़ी भूमिका रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दुकानों पर लगे क्यूआर कोड को मोबाइल से स्कैन करके भुगतान किया जा सकता है, जिसके लिए न किसी कार्ड की जरूरत होती है और न ही किसी अलग बटुए की। यही आसानी छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारियों तक, सभी के लिए इस व्यवस्था को बेहद सुविधाजनक बना देती है।
बैंक विवरण साझा करने की जरूरत नहीं
इस व्यवस्था की एक और खास बात इसकी सहूलियत और गोपनीयता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यूपीआई से पैसे भेजने के लिए सामने वाले को अपने बैंक खाते की पूरी जानकारी बताने की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ एक सरल पहचान या क्यूआर कोड के जरिए ही लेनदेन हो जाता है। इससे लोगों को अपनी संवेदनशील बैंक जानकारी बार बार साझा नहीं करनी पड़ती, जो एक बड़ी राहत की बात है।
कई बैंक और ऐप एक साथ
यूपीआई की एक और ताकत इसका लचीलापन है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक ही ऐप में कई अलग अलग बैंक खातों को जोड़ा जा सकता है, और उपयोगकर्ता अपनी पसंद के किसी भी यूपीआई ऐप से लेनदेन कर सकते हैं। अलग अलग बैंकों और ऐप के बीच यह आपसी तालमेल ही इस व्यवस्था को इतना सहज बनाता है कि लोग बिना किसी झंझट के इसका इस्तेमाल कर पाते हैं।
तेजी से बढ़ता इस्तेमाल
पिछले कुछ सालों में यूपीआई का इस्तेमाल जिस रफ्तार से बढ़ा है, वह हैरान करने वाला है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2016-17 में डिजिटल लेनदेन का कुल मूल्य बहुत ही कम था, लेकिन कुछ ही सालों में यह बढ़कर कई गुना अधिक हो गया। यह आंकड़ा दिखाता है कि किस तरह आम लोगों ने बहुत कम समय में इस नई व्यवस्था को खुले दिल से अपना लिया है।
हर सेकंड हजारों लेनदेन
आज यूपीआई का पैमाना बेहद विशाल हो चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हाल के आंकड़ों में एक ही महीने में अरबों की संख्या में लेनदेन दर्ज किए गए हैं, और औसतन हर सेकंड हजारों लेनदेन इस व्यवस्था से होकर गुजरते हैं। इतनी बड़ी संख्या में तेज और भरोसेमंद ढंग से लेनदेन संभाल पाना अपने आप में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती है।
दुनिया तक पहुंची यह व्यवस्था
यूपीआई की कामयाबी अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह व्यवस्था अब सिंगापुर, भूटान और कुछ अन्य देशों तक भी पहुंच चुकी है, जहां इसके जरिए भुगतान की सुविधा दी जा रही है। भारत में बनी एक भुगतान व्यवस्था का इस तरह दूसरे देशों में इस्तेमाल होना, देश की तकनीकी क्षमता की एक बड़ी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
सावधानी भी उतनी ही जरूरी
भले ही यूपीआई बेहद सुविधाजनक हो, लेकिन इसका इस्तेमाल करते समय सावधानी भी उतनी ही जरूरी है। अपना गोपनीय पिन कभी किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए और अनजान अनुरोधों को स्वीकार करने से बचना चाहिए। यह लेख केवल जानकारी देने के उद्देश्य से है, और किसी भी लेनदेन से पहले सतर्क रहकर सोच समझकर कदम उठाना ही सबसे समझदारी भरा तरीका माना जाता है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, यूपीआई ने भारत में पैसे के लेनदेन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। साल 2016 में शुरू हुई यह व्यवस्था आज करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी है और दुनिया के दूसरे देशों में भी इसकी चर्चा हो रही है। इस व्यवस्था की बुनियादी बातों और इसके काम करने के तरीके को समझकर, हम रोजमर्रा के डिजिटल लेनदेन को और अधिक सहजता और सतर्कता के साथ कर सकते हैं।

Keep subscribing to सिद्धार्थ शर्माHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Subscribe
