भारत की डिजिटल मुद्रा सीबीडीसी ने 2026 तक 15 करोड़ से अधिक लेन-देन और 34,000 करोड़ रुपये से अधिक का मूल्य पार कर लिया है। रिज़र्व बैंक इसे निजी क्रिप्टो के मुकाबले एक सुरक्षित, सरकार समर्थित विकल्प के रूप में पेश कर रहा है।
जब भी भारत में क्रिप्टोकरेंसी की बात होती है, तो अक्सर निजी सिक्कों और सरकारी सख्ती पर ही चर्चा टिक जाती है। लेकिन इसी शोर के बीच, भारतीय रिज़र्व बैंक चुपचाप अपनी खुद की डिजिटल मुद्रा को आगे बढ़ा रहा है, जिसे डिजिटल रुपया या सीबीडीसी कहा जाता है।
दरअसल, भारत में डिजिटल पैसे की कहानी दो अलग-अलग पटरियों पर चल रही है। एक तरफ़ निजी क्रिप्टो है, जिस पर भारी कर और कड़े नियम लागू हैं, और दूसरी तरफ़ है सरकार समर्थित डिजिटल रुपया, जिसे नियामक व्यवस्था के भीतर बढ़ावा दिया जा रहा है।
डिजिटल रुपया क्या है
डिजिटल रुपया असल में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी की गई एक डिजिटल मुद्रा है। इसे पूरी तरह सरकार का समर्थन प्राप्त है और यह नियंत्रित बैंकिंग व्यवस्था के भीतर काम करता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह राज्य का अपना डिजिटल पैसा है, न कि किसी निजी कंपनी का सिक्का।
इसकी पहुँच के आँकड़े भी ध्यान खींचते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 2026 तक डिजिटल रुपये से जुड़े लेन-देन 15 करोड़ का आँकड़ा पार कर चुके हैं, और इनका कुल मूल्य 34,000 करोड़ रुपये से भी अधिक हो गया है, जो इसके बढ़ते इस्तेमाल की ओर साफ़ इशारा करता है।
अब फोकस फीचर्स पर

दिलचस्प बात यह है कि रिज़र्व बैंक ने अब अपनी प्राथमिकता बदल ली है। केवल लेन-देन की संख्या बढ़ाने के बजाय, अब ध्यान ख़ास सुविधाओं के परीक्षण पर है। इनमें सबसे अहम है एनएफसी तकनीक के ज़रिए ऑफ़लाइन भुगतान की सुविधा, यानी बिना इंटरनेट के भी भुगतान करना।
दूसरी बड़ी सुविधा है प्रोग्रामेबल यानी क्रमादेशित लेन-देन की क्षमता। रिपोर्टों के अनुसार, इसका इस्तेमाल ख़ास तौर पर सरकारी हस्तांतरण के लिए सोचा जा रहा है। इसका मतलब है कि सब्सिडी या सहायता राशि को एक निश्चित उद्देश्य के लिए ही ख़र्च करने योग्य बनाया जा सकता है।
क्रिप्टो से अलग रुख
रिज़र्व बैंक डिजिटल रुपये को अपने पसंदीदा डिजिटल भुगतान माध्यम के रूप में पेश करता है, जो नियंत्रित बैंकिंग प्रणाली के भीतर रहता है। इसके उलट, वह निजी क्रिप्टोकरेंसी को पारंपरिक वित्त व्यवस्था से बाहर की सट्टेबाज़ी वाली संपत्ति मानता है, न कि कोई असली मुद्रा।
इस अंतर को समझाने में एक और बात अहम है। जहाँ निजी क्रिप्टो में लेन-देन को छिपाना संभव माना जाता है, वहीं डिजिटल रुपये का हर लेन-देन सत्यापन योग्य बताया गया है। इससे अवैध या बिना निशान वाले हस्तांतरण की गुंजाइश कम हो जाती है, जो सरकार के लिए एक बड़ा आकर्षण है।
निजी क्रिप्टो पर सख्ती
निजी क्रिप्टो भारत में अवैध नहीं है, लेकिन उस पर कर का बोझ बहुत भारी है। इससे होने वाले किसी भी लाभ पर 30 प्रतिशत की एकमुश्त दर से कर लगता है, और अधिग्रहण की लागत को छोड़कर कोई छूट नहीं मिलती। साथ ही, इसके नुकसान को किसी अन्य आय से समायोजित भी नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा, एक वित्तीय वर्ष में 10,000 रुपये से अधिक के हस्तांतरण पर 1 प्रतिशत टीडीएस भी लागू होता है। सभी क्रिप्टो एक्सचेंजों और सेवा प्रदाताओं को अब वित्तीय ख़ुफ़िया इकाई यानी एफ़आईयू-इंडिया के साथ पंजीकरण कराना और केवाईसी तथा मनी लॉन्ड्रिंग रोधी नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
वैश्विक महत्वाकांक्षा
डिजिटल रुपये को लेकर भारत की सोच घरेलू सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, रिज़र्व बैंक ने 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव भी रखा है, जिससे सीमा पार भुगतान और आसान हो सके।
अगर यह विचार आगे बढ़ता है, तो इसका असर काफ़ी बड़ा हो सकता है। कई देशों की सरकारी डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने से अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में मौजूदा व्यवस्थाओं पर निर्भरता घट सकती है। हालाँकि फ़िलहाल यह एक प्रस्ताव भर है, और इसे अमल में आने में समय लग सकता है।
आगे की राह
कुल मिलाकर, भारत का दांव साफ़ नज़र आता है। वह निजी क्रिप्टो को खुली छूट देने के बजाय अपनी सरकार समर्थित डिजिटल मुद्रा पर भरोसा जता रहा है। अब असली सवाल यह है कि आम लोग इसे कितना अपनाते हैं, और गोपनीयता तथा सुविधा के बीच संतुलन आख़िर कैसे बनता है।

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