avalw
CINEMA · IN

बड़े परदे का बड़ा दांव: कैसे आईमैक्स और प्रीमियम स्क्रीन बदल रहे हैं भारत का सिनेमा अनुभव

प्रिया शर्मा प्रिया शर्मा priyasharma.avalw.com · 4.7k reads Respect0 Save Share Read only
READS505live count PUBLISHED2 Sept2026 READING TIME4 min705 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

टिकट के दाम दोगुने या तिगुने, फिर भी दर्शक तैयार हैं। पठान और जवान जैसी फिल्मों के बाद भारत में बड़े परदे यानी प्रीमियम लार्ज फॉर्मैट का चलन तेज़ी से बढ़ा है। लेकिन क्या भारत में सचमुच असली आईमैक्स मौजूद है? पर्दे के पीछे की पूरी कहानी, प्रकाशित तथ्यों के साथ।

भारतीय सिनेमा की चर्चा अक्सर कमाई के आंकड़ों और सितारों के इर्द गिर्द घूमती है, लेकिन पिछले कुछ सालों में एक और बदलाव चुपचाप हमारे देखने के तरीके को बदल रहा है। यह बदलाव है बड़े परदे यानी प्रीमियम लार्ज फॉर्मैट स्क्रीन का, जहां दर्शक ऊंची कीमत चुकाकर भी खुशी से टिकट खरीद रहे हैं।

पठान, जवान और आरआरआर जैसी फिल्मों की भव्यता ने दर्शकों को घर के पर्दे से उठाकर वापस सिनेमाघरों तक खींचा है। लेकिन इस चमक के पीछे तकनीक, कीमत और थोड़ी सी गलतफहमी की एक दिलचस्प कहानी छिपी है, जिसे समझना बेहद ज़रूरी है। यहां दिए गए सारे तथ्य प्रकाशित रिपोर्टों पर आधारित हैं।

प्रीमियम अनुभव की बढ़ती भूख

बीते कुछ वर्षों में भारतीय दर्शकों के बीच सामान्य टिकट के बजाय एक बेहतर और भव्य अनुभव की मांग तेज़ी से बढ़ी है। बड़ी स्क्रीन, दमदार साउंड और साफ़ तस्वीर के लिए लोग अब खुशी खुशी अतिरिक्त पैसे खर्च करने को तैयार हैं, और यही रुझान आईमैक्स जैसी फॉर्मैट को लगातार आगे बढ़ा रहा है।

दोगुनी से तिगुनी कीमत, फिर भी हाउसफुल

इन प्रीमियम स्क्रीन का अर्थशास्त्र भी दिलचस्प है। रिपोर्टों के अनुसार आईमैक्स का टिकट अक्सर सामान्य टिकट से दो से तीन गुना तक महंगा होता है। सीटें भले ही कम हों, लेकिन ऊंची कीमत के कारण हर एक शो से होने वाली कमाई सामान्य स्क्रीन के मुकाबले कहीं ज़्यादा हो जाती है।

घर के पर्दे से मुकाबला

घर के पर्दे का आराम बनाम सिनेमाघर की भव्यता, यही वह लड़ाई है जिस पर आज का सिनेमा उद्योग टिका हुआ है।
घर के पर्दे का आराम बनाम सिनेमाघर की भव्यता, यही वह लड़ाई है जिस पर आज का सिनेमा उद्योग टिका हुआ है।

दरअसल यह पूरा दांव घर के आराम के खिलाफ़ है। जब कोई फिल्म कुछ ही हफ़्तों में स्ट्रीमिंग पर आ जाती है, तो सिनेमाघर को दर्शक को यह भरोसा दिलाना पड़ता है कि बड़े परदे का अनुभव घर पर दोहराया नहीं जा सकता। भव्य फॉर्मैट इसी भरोसे को बेचने का सबसे कारगर हथियार बनकर उभरा है।

बॉलीवुड और बड़े परदे का मेल

हिंदी सिनेमा ने भी इस अवसर को बखूबी पहचाना है। बड़े बजट की एक्शन फिल्में अब खास तौर पर इसी भव्य फॉर्मैट को ध्यान में रखकर बनाई और प्रचारित की जा रही हैं। आने वाली रामायण और महेश बाबू तथा एस एस राजामौली की वाराणसी जैसी परियोजनाएं तो बड़े परदे के लिए ही तैयार की जा रही हैं।

असली आईमैक्स का सच

यहां एक ऐसी बात है जो शायद बहुत से दर्शकों को हैरान कर दे। तकनीकी रूप से असली आईमैक्स वह होता है जो पंद्रह सत्तर मिलीमीटर फिल्म या विशेष लेज़र प्रणाली पर लंबे फ्रेम में दिखाया जाता है, और रिपोर्टों के मुताबिक भारत में व्यावसायिक रूप से ऐसा एक भी पर्दा फिलहाल मौजूद नहीं है।

देश में जो इकलौता पंद्रह सत्तर मिलीमीटर सिस्टम बताया जाता है, वह अहमदाबाद के गुजरात साइंस सिटी में लगा है, जो असल में एक विज्ञान शिक्षा केंद्र है, कोई व्यावसायिक सिनेमाघर नहीं। यानी भारत में आम दर्शक जिसे आईमैक्स कहकर देखता है, वह मूल आईमैक्स से तकनीकी रूप से थोड़ा अलग होता है।

तो फिर हम क्या देखते हैं

भारत में लगभग सभी आईमैक्स ब्रांडेड पर्दे डिजिटल फॉर्मैट पर चलते हैं, जिन्हें आईमैक्स विद लेज़र या डिजिटल आईमैक्स कहा जाता है। इनमें लेज़र वाला संस्करण चमक और कंट्रास्ट के मामले में काफ़ी बेहतर माना जाता है, इसलिए दर्शकों को मिलने वाला अनुभव फिर भी सामान्य स्क्रीन से कहीं आगे बना रहता है।

असली आईमैक्स क्यों नहीं टिका

इसके पीछे कुछ ठोस व्यावहारिक कारण हैं। असली आईमैक्स के लिए खास तौर पर बने बड़े ऑडिटोरियम चाहिए, जबकि भारत के ज़्यादातर मल्टीप्लेक्स मॉल के भीतर मौजूद जगहों में ही ढाले जाते हैं। इसके अलावा उपकरण की भारी लागत और उस फॉर्मैट में बनी फिल्मों की कमी भी बड़ी बाधाएं रही हैं।

कौन चला रहा है ये पर्दे

भारत में इन प्रीमियम पर्दों को मुख्य रूप से पीवीआर आईनॉक्स, सिनेपोलिस और मिराज जैसी कंपनियां चलाती हैं। दिल्ली का पीवीआर प्रिया, मुंबई का मिराज आईमैक्स वडाला और बेंगलुरु का पीवीआर नेक्सस इनमें कुछ जाने पहचाने नाम हैं, जिनमें से वडाला को साल 2024 के अंत में लेज़र प्रणाली के साथ दोबारा खोला गया था।

छोटे शहरों तक फैलता दायरा

पहले यह भव्य अनुभव सिर्फ़ बड़े महानगरों तक सीमित था, लेकिन अब यह धीरे धीरे छोटे शहरों की ओर भी बढ़ रहा है। पुणे, अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ और कोच्चि जैसे शहरों में भी अब ऐसे पर्दे पहुंच चुके हैं, जिससे प्रीमियम सिनेमा अब सिर्फ़ महानगरों का विशेषाधिकार नहीं रह गया है।

आगे की राह

कुल मिलाकर तस्वीर साफ़ है। भारतीय दर्शक अब सिर्फ़ फिल्म देखना नहीं चाहता, वह एक पूरा अनुभव खरीदना चाहता है, और इसी सोच पर आज का सिनेमा उद्योग अपना दांव लगा रहा है। भले ही तकनीकी परिभाषाओं पर बहस चलती रहे, बड़े परदे की यह चमक फिलहाल भारतीय सिनेमा के लिए एक मज़बूत सहारा बनी हुई है।

2 responses

बॉलीवुड: साफ और अच्छे से समझाया.

3

बॉलीवुड को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.

2
प्रिया शर्मा
Follow this desk
प्रिया शर्मा
Create a free account to follow प्रिया शर्मा. New stories land in your feed, and you can save any of them to your own reading lists.
Your library & lists →
प्रिया शर्मा
WRITTEN BY THE AUTHOR
प्रिया शर्मा 2026-09-02 · 4 min read · 505 reads
View profile →
VERIFY THIS STORY
ASK AI
प्रिया शर्मा Keep following प्रिया शर्माHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Up next
More
Statistics Search Become a creator Alliances About Terms Privacy