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सिंगल स्क्रीन का संकट: बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड के बीच सिनेमाघरों की खामोश गिरावट

प्रिया शर्मा प्रिया शर्मा priyasharma.avalw.com · 4.7k reads Respect0 Save Share Read only
READS658live count PUBLISHED27 Aug2026 READING TIME4 min791 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

एक ओर भारतीय फिल्में हज़ार करोड़ के आँकड़े छू रही हैं, दूसरी ओर देश के सिनेमाघर सिकुड़ रहे हैं। सिंगल स्क्रीन बंद हो रहे हैं, टिकट महंगे होते जा रहे हैं और हज़ारों इलाकों में एक भी पर्दा नहीं। बॉक्स ऑफिस की चमक के पीछे छिपे इस गहरे ढांचागत संकट का विश्लेषण।

भारतीय सिनेमा के लिए बीता समय बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड और हज़ार करोड़ की कमाई वाली फिल्मों के लिए याद किया जा रहा है। लेकिन इस चकाचौंध भरी सुर्खियों के ठीक पीछे एक कहीं अधिक गंभीर और खामोश संकट पनप रहा है। जिन सिनेमाघरों में यह जादू रचा जाता है, वे धीरे-धीरे सिकुड़ रहे हैं, और यह विरोधाभास भारतीय फिल्म उद्योग के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े करता है।

सिकुड़ते सिंगल स्क्रीन

कभी हर शहर की पहचान रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर एक-एक कर बंद होते जा रहे हैं।
कभी हर शहर की पहचान रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर एक-एक कर बंद होते जा रहे हैं।

इस गिरावट का सबसे स्पष्ट चेहरा सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में दिखता है। एक समय देश में लगभग 9,500 सिंगल स्क्रीन थिएटर हुआ करते थे, लेकिन 2025 तक यह संख्या घटकर करीब 6,500 रह गई। केवल 2018 से 2024 के बीच ही लगभग एक हज़ार सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर हमेशा के लिए बंद हो गए, जो इस क्षेत्र में हो रहे तेज़ संकुचन को साफ़ दर्शाता है।

इन बंद होते थिएटरों का सबसे बड़ा नुकसान आम दर्शक को उठाना पड़ रहा है। अधिकांश सिंगल स्क्रीन दक्षिण भारत के बाहर के इलाकों में बंद हुए हैं, और यही वे सिनेमाघर थे जो सबसे सस्ते टिकट उपलब्ध कराते थे। इनमें टिकट की कीमत आमतौर पर साठ रुपये से एक सौ अस्सी रुपये के बीच रहती थी, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग भी आसानी से फिल्में देख पाते थे।

स्क्रीन की भारी कमी

समस्या केवल पुराने थिएटरों के बंद होने तक सीमित नहीं है, बल्कि नए पर्दों की कमी भी उतनी ही गंभीर है। साल 2025 के अंत तक भारत में कुल 10,033 सिनेमा स्क्रीन थीं, जो छह साल पहले की तुलना में बमुश्किल ज़्यादा हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक होने के बावजूद, देश में पर्दों की वृद्धि लगभग ठहरी हुई है।

भौगोलिक असमानता इस तस्वीर को और चिंताजनक बना देती है। भारत के लगभग 19,000 पिन कोड में से करीब 16,350 इलाकों में आज भी एक भी सिनेमा स्क्रीन मौजूद नहीं है। यानी देश का बहुत बड़ा हिस्सा बड़े पर्दे के अनुभव से पूरी तरह वंचित है, और सिनेमा का लाभ मुख्य रूप से बड़े शहरों और महानगरों तक ही सिमटकर रह गया है।

अंतरराष्ट्रीय तुलना इस कमी को और उजागर करती है। भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 6.8 स्क्रीन हैं, जबकि अमेरिका में यह आँकड़ा 109, फ्रांस में 95, ब्रिटेन में 66 और चीन में 64 है। इतने विशाल दर्शक वर्ग और सिनेमा प्रेम वाले देश के लिए यह घनत्व बेहद कम है, और यह दिखाता है कि विकास की कितनी बड़ी संभावना अब भी अनछुई पड़ी है।

महंगे टिकट, घटते दर्शक

जहाँ सस्ते सिनेमाघर बंद हो रहे हैं, वहीं टिकट की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं। साल 2025 में औसत टिकट मूल्य लगभग बीस प्रतिशत बढ़कर 161 रुपये तक पहुँच गया, जबकि दर्शकों की संख्या करीब छह प्रतिशत घटकर लगभग 83.2 करोड़ रह गई। यह संयोजन खतरनाक है, क्योंकि महंगे टिकट और घटती उपस्थिति एक-दूसरे को और बढ़ावा देते हैं।

बड़ी मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं में तो कीमतें और भी अधिक हैं। पीवीआर आइनॉक्स का औसत टिकट मूल्य जून तिमाही में 273 रुपये तक पहुँच गया, जो प्रीमियम मूल्य निर्धारण की ओर इशारा करता है। इसके साथ ही खाने-पीने पर प्रति व्यक्ति खर्च भी वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में रिकॉर्ड 148 रुपये तक जा पहुँचा, जो पहले के 132 रुपये से अधिक है।

यह आँकड़े एक बदलती व्यावसायिक रणनीति की ओर इशारा करते हैं। सिनेमाघर अब कम दर्शकों से अधिक कमाई पर निर्भर होते जा रहे हैं, जहाँ हर दर्शक से टिकट और खाने-पीने के ज़रिए अधिकतम राजस्व जुटाया जाता है। लेकिन यह मॉडल फिल्म देखने को एक महंगा विलास बना देता है, जो आम परिवारों के लिए बार-बार सिनेमाघर जाने को कठिन बना सकता है।

कारण और आगे की राह

इस संकट के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। बढ़ते रियल एस्टेट के दाम, संचालन की ऊँची लागत, घटती दर्शक संख्या और ओटीटी प्लेटफॉर्म से मिलती कड़ी प्रतिस्पर्धा ने अकेले सिनेमाघर चलाने को बेहद मुश्किल बना दिया है। जब लोग घर बैठे किफ़ायती दाम पर मनोरंजन पा सकते हैं, तो महंगे थिएटर तक खींचकर लाना और भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

हालाँकि उद्योग इस चुनौती से निपटने की कोशिश भी कर रहा है। पीवीआर आइनॉक्स जैसी बड़ी कंपनी ने अगले पाँच वर्षों में कम से कम एक हज़ार नई स्क्रीन जोड़ने की योजना बनाई है, जिसमें ज़ोर छोटे और किफ़ायती सिनेमाघरों पर है। यह रणनीति स्वीकार करती है कि भविष्य केवल महंगे प्रीमियम अनुभव में नहीं, बल्कि व्यापक और सुलभ पहुँच में भी छिपा है।

अंततः, भारतीय सिनेमा का असली भविष्य केवल हज़ार करोड़ कमाने वाली फिल्मों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगा कि कितने लोग वास्तव में बड़े पर्दे तक पहुँच पाते हैं। यदि सिनेमाघर सिकुड़ते रहे और टिकट आम आदमी की पहुँच से दूर होते गए, तो रिकॉर्ड कमाई की चमक के नीचे उद्योग की बुनियाद ही कमज़ोर पड़ती जाएगी। असली जीत पर्दों को जनता तक वापस लाने में है।

3 responses

सिनेमाघर का अच्छा विश्लेषण.

4

सिनेमाघर: कहीं और से बेहतर बताया.

2

सिनेमाघर के बारे में बहुत उपयोगी लेख.

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प्रिया शर्मा
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प्रिया शर्मा 2026-08-27 · 4 min read · 658 reads
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