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इंटरवल का अर्थशास्त्र: कैसे पॉपकॉर्न बना भारतीय मल्टीप्लेक्स की सबसे बड़ी ताकत

प्रिया शर्मा प्रिया शर्मा priyasharma.avalw.com · 4.7k reads Respect0 Save Share Read only
READS4live count PUBLISHED15 Sept2026 READING TIME4 min836 words LANGUAGEHindi
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भारतीय सिनेमाघरों में फिल्म का टिकट भले ही सबसे बड़ी कमाई हो, पर असली मुनाफा पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक से आता है। पीवीआर आईनॉक्स के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि खानपान का कारोबार कैसे मल्टीप्लेक्स की रीढ़ बन चुका है।

किसी भी भारतीय दर्शक से सिनेमा हॉल के अनुभव के बारे में पूछिए, तो बड़े परदे और सितारों के साथ साथ एक और चीज़ ज़रूर याद आएगी, गरमागरम पॉपकॉर्न से भरा डिब्बा और ठंडी कोल्ड ड्रिंक। यह सिर्फ एक आदत नहीं है, बल्कि एक विशाल कारोबार है, जो आज भारतीय मल्टीप्लेक्स उद्योग की सबसे मज़बूत और मुनाफे वाली नींव बन चुका है।

इंटरवल की परंपरा

भारतीय सिनेमा की एक खास पहचान है फिल्म के बीच में आने वाला इंटरवल, जो दुनिया के कई देशों में लगभग गायब हो चुका है। यही मध्यांतर दर्शकों के लिए सुस्ताने और कुछ खाने पीने का मौका बनता है, और ठीक इसी क्षण में सिनेमाघरों के लिए कमाई का सबसे बड़ा दरवाज़ा खुलता है। भूख और उत्साह का यह मेल खानपान की बिक्री को ज़बरदस्त रफ्तार देता है।

पॉपकॉर्न का अर्थशास्त्र

ऊपर से देखने पर पॉपकॉर्न बेचना एक मामूली काम लगता है, लेकिन इसके पीछे का गणित चौंकाने वाला है। मुट्ठी भर मक्के के दानों की लागत बेहद कम होती है, जबकि उससे बना पॉपकॉर्न कई गुना ऊँची कीमत पर बिकता है। यही वजह है कि खानपान का यह हिस्सा सिनेमाघरों के लिए बहुत ऊँचे मुनाफे वाला साबित होता है और टिकट से भी ज़्यादा फायदेमंद बन जाता है।

2088 करोड़ का धंधा

इस कारोबार का पैमाना समझने के लिए देश की सबसे बड़ी सिनेमा शृंखला पीवीआर आईनॉक्स के आँकड़े काफी हैं। कंपनी के अनुसार बीते वित्त वर्ष में उसने अकेले खानपान से लगभग दो हज़ार अठासी करोड़ रुपये कमाए। यह आँकड़ा पिछले साल के मुकाबले करीब साढ़े उन्नीस प्रतिशत अधिक है, जो दिखाता है कि यह बाज़ार कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है।

कुल कमाई का लगभग एक तिहाई

बड़े परदे के सामने पॉपकॉर्न का डिब्बा अब सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि सिनेमाघरों की कमाई का सबसे मुनाफे वाला हिस्सा बन चुका है।
बड़े परदे के सामने पॉपकॉर्न का डिब्बा अब सिर्फ नाश्ता नहीं, बल्कि सिनेमाघरों की कमाई का सबसे मुनाफे वाला हिस्सा बन चुका है।

यह कमाई कितनी बड़ी है, इसका अंदाज़ा इससे लगता है कि खानपान अब कंपनी की कुल आमदनी का लगभग एक तिहाई हिस्सा बन चुका है। पीवीआर आईनॉक्स की कुल सालाना कमाई करीब छह हज़ार सात सौ तैंतालीस करोड़ रुपये रही, जिसमें टिकट बिक्री सबसे आगे रही, उसके ठीक पीछे खानपान, और फिर विज्ञापन तथा अन्य आय का स्थान रहा।

टिकट बनाम पॉपकॉर्न

यहाँ एक दिलचस्प पहलू छिपा है। फिल्म के टिकट से होने वाली कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिनेमाघरों को फिल्म निर्माताओं और वितरकों के साथ बाँटना पड़ता है, जिससे उनके हाथ में कम पैसा बचता है। इसके उलट पॉपकॉर्न और पेय पदार्थों की बिक्री पूरी तरह सिनेमाघर की अपनी होती है, इसलिए भले ही टिकट सबसे बड़ी आय हो, असली मुनाफा अक्सर खानपान से ही आता है।

प्रति व्यक्ति खर्च

कंपनियाँ अब इस बात पर बारीकी से नज़र रखती हैं कि हर दर्शक औसतन खानपान पर कितना खर्च करता है, जिसे प्रति व्यक्ति खर्च कहा जाता है। ताज़ा आँकड़ों के अनुसार इस वर्ष की पहली छमाही में यह आँकड़ा करीब एक सौ सैंतालीस रुपये प्रति व्यक्ति तक पहुँच गया। इस संख्या को बढ़ाना ही मल्टीप्लेक्स कंपनियों की सबसे बड़ी रणनीतिक प्राथमिकता बन गई है।

क्यूएसआर को पछाड़ा

पॉपकॉर्न के इस कारोबार की रफ्तार इतनी तेज़ है कि इसने देश की कई बड़ी फास्ट फूड शृंखलाओं को भी पीछे छोड़ दिया है। रिपोर्टों के अनुसार पीवीआर आईनॉक्स के खानपान कारोबार की वृद्धि दर कई मशहूर क्विक सर्विस रेस्तराँ कंपनियों से आगे निकल गई। इसका मतलब है कि एक तरह से सिनेमाघर अब चुपचाप देश की बड़ी खाद्य शृंखलाओं में शुमार हो चुके हैं।

सिनेमा से आगे

इस सफलता से उत्साहित होकर कंपनियाँ अब पर्दे के दायरे से बाहर भी कदम रख रही हैं। पीवीआर आईनॉक्स फूड कोर्ट, ऑनलाइन डिलीवरी मंच और अपने खुद के खाद्य ब्रांड जैसी नई राहें तलाश रही है। मकसद साफ है, खानपान के कारोबार को सिर्फ फिल्म देखने आए दर्शकों तक सीमित न रखकर उसे एक स्वतंत्र और बड़ी आमदनी के स्रोत में बदल देना।

ओटीटी के दौर में सहारा

यह रणनीति ऐसे समय में और भी अहम हो जाती है जब घर बैठे ओटीटी मंचों पर फिल्में देखना आम हो गया है। जब दर्शकों को सिनेमाघर तक खींचना पहले से कठिन है, तब खानपान से होने वाली मोटी कमाई इन कंपनियों को आर्थिक रूप से टिके रहने में मदद करती है। कई मायनों में पॉपकॉर्न ही वह सहारा है जो बड़े परदे के कारोबार को स्थिरता देता है।

ऊँची कीमतों पर सवाल

हालाँकि इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जिस पर दर्शक अक्सर नाराज़गी जताते हैं। सिनेमाघरों में पानी की बोतल से लेकर पॉपकॉर्न तक की कीमतें बाहर के मुकाबले कई गुना अधिक होती हैं, और यह बहस समय समय पर सुर्खियाँ बनती रहती है। कंपनियों के लिए चुनौती यही है कि वे मुनाफा भी कमाएँ और दर्शकों को ठगा हुआ महसूस भी न होने दें।

दर्शक अनुभव का हिस्सा

कीमतों की शिकायतों के बावजूद सच यह है कि अधिकांश दर्शकों के लिए पॉपकॉर्न सिनेमा जाने के अनुभव का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। परदे पर रोमांच और हाथ में गरम पॉपकॉर्न, यह जोड़ी भारतीय दर्शक की स्मृतियों में गहराई से बसी हुई है। यही भावनात्मक जुड़ाव है जो इस कारोबार को केवल एक लेनदेन से बढ़कर एक परंपरा बना देता है।

आगे की राह

आने वाले वर्षों में भारतीय मल्टीप्लेक्स का भविष्य काफी हद तक इसी खानपान कारोबार की दिशा पर निर्भर करेगा। नई पेशकशें, बेहतर गुणवत्ता और शायद कुछ हद तक संतुलित कीमतें इस विकास को आगे बढ़ा सकती हैं। एक बात तय है कि जब तक भारतीय दर्शक बड़े परदे से प्यार करते रहेंगे, पॉपकॉर्न का यह मीठा और नमकीन अर्थशास्त्र फलता फूलता रहेगा।

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प्रिया शर्मा 2026-09-15 · 4 min read · 4 reads
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