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डॉलर के मुक़ाबले लुढ़कता रुपया: क्यों 2026 में भारतीय मुद्रा बार-बार नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर

आदित्य बोस आदित्य बोस adityabose.avalw.com · 241 reads Respect0 Save Share Read only
READS8live count PUBLISHED19 Sept2026 READING TIME3 min660 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

साल 2026 में रुपया डॉलर के मुक़ाबले करीब 7 प्रतिशत लुढ़ककर बार-बार नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँचा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, महँगा कच्चा तेल, ऊँचे व्यापार शुल्क और चौड़ा होता चालू खाता घाटा इसकी बड़ी वजहें हैं। जानिए इस गिरावट का आम आदमी की जेब पर क्या असर पड़ता है।

रिकॉर्ड निचले स्तर की ओर

आँकड़े इस गिरावट की कहानी बहुत साफ़ बयान करते हैं। साल की शुरुआत में रुपया करीब 89 रुपये प्रति डॉलर के आसपास था, लेकिन फ़रवरी के अंत तक यह 90 का स्तर पार कर गया और मार्च में पहली बार 95 के पार पहुँच गया। इस दौरान यह एशिया की सबसे कमज़ोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बन गया।

पूरे साल के लिहाज़ से देखें तो रुपये में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बीते कुछ महीनों में यह कई बार अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँचा है, और हर नया रिकॉर्ड बाज़ार तथा नीति-निर्माताओं दोनों के लिए एक चेतावनी की तरह देखा गया है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली

इस कमज़ोरी की एक बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की बिकवाली है। जनवरी में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 3 अरब डॉलर निकाल लिए, जबकि पिछले साल यह आँकड़ा लगभग 18 अरब डॉलर तक पहुँच गया था। जब निवेशक इस तरह पैसा निकालते हैं, तो रुपये पर दबाव और बढ़ जाता है।

इसके साथ ही आयातकों और बड़ी कंपनियों की ओर से डॉलर की लगातार माँग बनी रहती है। भुगतान के लिए जब बाज़ार में डॉलर की माँग उसकी आपूर्ति से ज़्यादा हो जाती है, तो स्वाभाविक रूप से रुपये की कीमत उसके मुक़ाबले और नीचे की ओर खिसकने लगती है।

कच्चे तेल का बोझ

डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होता रुपया आयात को महँगा और आम आदमी की जेब को हल्का कर देता है।
डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होता रुपया आयात को महँगा और आम आदमी की जेब को हल्का कर देता है।

रुपये की सेहत का सीधा नाता कच्चे तेल से भी है। भारत अपनी ज़रूरत का 80 प्रतिशत से ज़्यादा कच्चा तेल विदेशों से मँगाता है, और इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर चुकाने पड़ते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम चढ़ते हैं, तो देश का आयात बिल और चालू खाता घाटा दोनों एक साथ बढ़ जाते हैं।

इसी चालू खाता घाटे को लेकर चिंता काफ़ी गहरी है। अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में यह घाटा पिछले वर्षों के मुक़ाबले 40 से 50 अरब डॉलर तक अधिक चौड़ा हो सकता है। एक लगातार बड़ा चालू खाता घाटा रुपये की टिकाऊ कमज़ोरी का सबसे भरोसेमंद संकेत माना जाता है।

टैरिफ और वैश्विक हालात

वैश्विक व्यापार का माहौल भी रुपये के लिए अनुकूल नहीं रहा है। भारतीय निर्यात, जैसे रत्न-आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन कलपुर्ज़ों पर लगाए गए ऊँचे शुल्कों ने उन डॉलर की आवक को घटा दिया है, जो सामान्य तौर पर रुपये को मज़बूती देने में मदद करते हैं।

इसके अलावा अमेरिका में बॉन्ड पर बढ़ती ब्याज दरें और दुनिया भर में फैला भू-राजनीतिक तनाव भी अपना असर डालते हैं। ऐसे अनिश्चित माहौल में निवेशक अक्सर उभरते बाज़ारों से पैसा निकालकर अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाने वाली अमेरिकी संपत्तियों की ओर रुख़ कर लेते हैं।

आम आदमी पर असर

इस पूरी उठापटक का असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है। कमज़ोर रुपया तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और खाद्य तेल जैसी आयातित चीज़ों को महँगा कर देता है, जिससे महँगाई को बढ़ावा मिलता है। विदेश में पढ़ाई और घूमने का ख़र्च भी पहले से कहीं अधिक भारी हो जाता है।

हालाँकि इसका हर पहलू नकारात्मक नहीं है। कमज़ोर रुपया निर्यातकों, सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों और विदेश से पैसा भेजने वाले प्रवासी परिवारों के लिए फ़ायदेमंद भी साबित होता है, क्योंकि उन्हें अब हर एक डॉलर के बदले पहले से ज़्यादा रुपये मिलते हैं।

आरबीआई की भूमिका

इस अस्थिरता को थामने में भारतीय रिज़र्व बैंक की भूमिका बेहद अहम रहती है। ज़रूरत पड़ने पर आरबीआई अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये की तेज़ गिरावट को नरम करने की कोशिश करता है। सात सौ अरब डॉलर से अधिक का यह भंडार इस समय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है।

आगे की राह

आगे रुपये की चाल कई बातों पर निर्भर करेगी, जिनमें कच्चे तेल के दाम, अमेरिकी नीतियाँ, व्यापार शुल्क और विदेशी निवेश का प्रवाह प्रमुख हैं। जानकार मानते हैं कि निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, इसलिए बाज़ार और नीति-निर्माताओं दोनों के लिए सतर्कता बेहद ज़रूरी है।

कुल मिलाकर, रुपये की यह गिरावट किसी एक वजह की नहीं, बल्कि कई वैश्विक और घरेलू दबावों की मिली-जुली तस्वीर है। इसे संभालना एक नाज़ुक संतुलन का काम है, जहाँ अर्थव्यवस्था की भीतरी मज़बूती और बाहरी झटकों के बीच लगातार तालमेल बिठाना पड़ता है।

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आदित्य बोस 2026-09-19 · 3 min read · 8 reads
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