बीते वित्त वर्ष में भारतीय कंपनियों ने आईपीओ के ज़रिए करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये जुटाकर सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। 219 कंपनियों की लिस्टिंग, दुनिया में दूसरा स्थान और घरेलू निवेशकों की बढ़ती ताक़त, जानिए भारत के प्राथमिक बाज़ार में आई इस ऐतिहासिक तेज़ी की पूरी कहानी।
भारत के शेयर बाज़ार में इस समय एक अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर सेंसेक्स और निफ्टी में उतार-चढ़ाव जारी है, वहीं दूसरी ओर नई कंपनियों के बाज़ार में उतरने यानी आईपीओ की मानो एक आँधी सी आई हुई है। बीते वित्त वर्ष में इस लहर ने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
रिकॉर्ड तोड़ आँकड़े
आँकड़े सचमुच हैरान करने वाले हैं। एनएसई की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारतीय कंपनियों ने आईपीओ के ज़रिए करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 20 अरब डॉलर जुटाए। इस दौरान कुल 219 कंपनियाँ बाज़ार में सूचीबद्ध हुईं, जो अब तक का सबसे बड़ा सालाना आँकड़ा माना जा रहा है।
इस तेज़ी की असली अगुवाई मुख्य बोर्ड यानी मेनबोर्ड की बड़ी कंपनियों ने की। अकेले मेनबोर्ड खंड में 108 आईपीओ आए, जिन्होंने मिलकर करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये जुटाए। यह जारी होने वाले इश्यू की संख्या और जुटाई गई पूँजी, दोनों ही लिहाज़ से एक बिल्कुल नया कीर्तिमान है।
लगातार तीसरा रिकॉर्ड साल
यह कोई एक बार की बात नहीं है। कैलेंडर वर्ष 2026 में भी प्राथमिक बाज़ार से जुटाई गई रकम 1 लाख करोड़ रुपये के पार पहुँच चुकी है। यह लगातार तीसरा साल और कुल मिलाकर चौथी बार है जब यह बड़ा पड़ाव पार हुआ है, जो बाज़ार की लगातार गहराती मज़बूती को साफ़ दर्शाता है।
जनवरी से अगस्त 2026 के बीच ही 62 मेनबोर्ड आईपीओ आए, जिन्होंने मिलकर करीब 73,673 करोड़ रुपये जुटाए। आने वाले महीनों में खुद नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का करीब 22,568 करोड़ रुपये का विशाल आईपीओ इस पूरे आँकड़े को और भी ऊँचाई पर ले जाने वाला है।
दुनिया में दूसरे नंबर पर भारत

भारत की यह रफ़्तार अब वैश्विक मंच पर भी खूब चमक रही है। मार्च 2026 में दुनिया भर में हुई कुल आईपीओ लिस्टिंग में से करीब 14 प्रतिशत अकेले भारत में हुईं। इस मामले में भारत सिर्फ़ चीन से पीछे, यानी पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर रहा, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
गोल्डमैन सैक्स और जेपी मॉर्गन जैसे बड़े वैश्विक बैंकों का मानना है कि भारत में आईपीओ की यह लहर आगे भी जारी रहेगी। उनका यह भरोसा भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूत बुनियाद और कंपनियों के पूँजी जुटाने की लगातार बढ़ती भूख को ही दर्शाता है।
इस तेज़ी के पीछे कौन
इस पूरे उछाल की एक बड़ी वजह घरेलू निवेशक हैं। पिछले कुछ वर्षों में डीमैट खातों और एसआईपी के ज़रिए करोड़ों आम भारतीय बाज़ार से जुड़े हैं। म्यूचुअल फंड और घरेलू संस्थागत निवेशकों के पास आ रहे इसी पैसे ने नई कंपनियों के लिए पूँजी जुटाना पहले से कहीं ज़्यादा आसान बना दिया है।
कंपनियों के नज़रिए से भी यह सही समय है। ऊँचे मूल्यांकन और निवेशकों के उत्साह का फ़ायदा उठाकर कारोबारी अपने विस्तार, कर्ज़ चुकाने और शुरुआती निवेशकों को बाहर निकलने का मौका देने के लिए बाज़ार का रुख़ कर रहे हैं। यही वजह है कि लगातार इश्यू पर इश्यू आते जा रहे हैं।
हर चमकती चीज़ सोना नहीं
हालाँकि इस चमक का एक दूसरा पहलू भी है। जानकार आगाह करते हैं कि कई आईपीओ बेहद ऊँची कीमतों पर आ रहे हैं, और छोटी तथा एसएमई कंपनियों की लिस्टिंग की रफ़्तार अब कुछ धीमी पड़ी है। बाज़ार के उतार-चढ़ाव के बीच हर इश्यू का मुनाफ़े में आना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है।
इसलिए विशेषज्ञ आम निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे सिर्फ़ लिस्टिंग के दिन होने वाले मुनाफ़े के लालच में न फँसें। किसी भी कंपनी में पैसा लगाने से पहले उसके कारोबार, मुनाफ़े और भविष्य की संभावनाओं को ठीक से परखना कहीं ज़्यादा समझदारी भरा कदम साबित होता है।
बदलती भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर
आईपीओ की यह लहर दरअसल बदलते भारत की एक बड़ी तस्वीर पेश करती है। नई कंपनियाँ, स्टार्टअप और पारंपरिक कारोबार, सभी अब आम जनता की बचत को अपने विकास से जोड़ रहे हैं। यह पूँजी और उद्यम के बीच एक नया और कहीं ज़्यादा मज़बूत रिश्ता बना रहा है।
बीते वर्षों में जहाँ बाज़ार कुछ बड़े और शहरी निवेशकों तक सीमित माना जाता था, वहीं अब छोटे शहरों और कस्बों तक इसकी पहुँच लगातार बढ़ी है। रिकॉर्ड आईपीओ संग्रह इसी व्यापक भागीदारी और भारतीय पूँजी बाज़ार पर बढ़ते जनविश्वास का ही सबूत है।
आगे की राह
आने वाला समय ही बताएगा कि यह रफ़्तार कहाँ तक टिकती है। अगर अर्थव्यवस्था की गति और घरेलू निवेश का प्रवाह इसी तरह बना रहा, तो भारत का प्राथमिक बाज़ार आने वाले वर्षों में भी दुनिया के सबसे जीवंत बाज़ारों में गिना जाता रहेगा। फ़िलहाल तो यह आँधी थमती हुई नज़र नहीं आ रही।

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