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हर महीने 24 अरब लेनदेन: यूपीआई ने कैसे बदल दी भारत की जेब

इशा मल्होत्रा इशा मल्होत्रा ishamalhotra.avalw.com · 922 reads Respect0 Save Share Read only
READS8live count PUBLISHED18 Sept2026 READING TIME4 min796 words LANGUAGEHindi
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अगस्त 2026 में यूपीआई ने 24.51 अरब लेनदेन का नया रिकॉर्ड बनाया, जिनका मूल्य करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा। एनपीसीआई के आंकड़े बताते हैं कि लगातार दूसरे महीने रिकॉर्ड टूटा, और भारत आज दुनिया के रियल टाइम भुगतान का लगभग आधा हिस्सा अकेले संभाल रहा है।

सब्ज़ी वाले के ठेले से लेकर पान की दुकान तक, आज देश के लगभग हर कोने में एक जैसा दृश्य दिखता है। ग्राहक जेब से पर्स नहीं, बल्कि मोबाइल फोन निकालता है, दुकान पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन करता है और चंद सेकंड में भुगतान पूरा हो जाता है। यह बदलाव इतना सहज लगता है कि हमें उसका आकार अब चौंकाता भी नहीं, जबकि इसके पीछे के आंकड़े वाकई हैरान कर देने वाले हैं।

अगस्त का नया रिकॉर्ड

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में यूपीआई के ज़रिए कुल 24.51 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रहा। यह किसी एक महीने में हुआ अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है और इसने पिछले महीनों के सारे रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं।

खास बात यह रही कि यह लगातार दूसरा महीना था जब यूपीआई ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा। इससे पहले जुलाई में यह आंकड़ा 23.66 अरब लेनदेन तक पहुंचा था, जो उस समय का सबसे ऊंचा स्तर था। हर बीतते महीने के साथ करोड़ों नए लेनदेन इस व्यवस्था में जुड़ते जा रहे हैं और आंकड़ों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है।

रोज़ाना का पैमाना

इन बड़े आंकड़ों को अगर हम रोज़ के हिसाब से देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। इस साल मई के दौरान यूपीआई पर औसतन हर दिन करीब 73.78 करोड़ लेनदेन दर्ज हुए, और एक ही दिन में लेनदेन का औसत मूल्य लगभग 84,423 करोड़ रुपये रहा। यह रफ्तार बताती है कि डिजिटल भुगतान अब किसी खास वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि आम जनजीवन का हिस्सा बन चुका है।

सालभर का पूरा हिसाब

पूरे वित्त वर्ष 2025-26 की बात करें तो यूपीआई पर कुल लेनदेन की संख्या 24,162 करोड़ तक पहुंच गई, जो पिछले साल की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक है। वहीं इन लेनदेन का कुल मूल्य 20.59 प्रतिशत बढ़कर 314 लाख करोड़ रुपये के विशाल आंकड़े तक पहुंच गया, जो देश की समूची अर्थव्यवस्था के आकार का आईना है।

छोटे लेनदेन की बड़ी कहानी

पांच सौ का नोट और कुछ सिक्के। कभी हर जेब की पहचान रही नकदी आज तेज़ी से मोबाइल स्क्रीन पर होते डिजिटल भुगतान को जगह देती जा रही है, खासकर छोटी और रोज़मर्रा की खरीदारी में।
पांच सौ का नोट और कुछ सिक्के। कभी हर जेब की पहचान रही नकदी आज तेज़ी से मोबाइल स्क्रीन पर होते डिजिटल भुगतान को जगह देती जा रही है, खासकर छोटी और रोज़मर्रा की खरीदारी में।

आंकड़ों में एक दिलचस्प रुझान छिपा है। मई के बाद से लेनदेन का कुल मूल्य लगभग 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास एक सीमित दायरे में ठहरा हुआ है, जबकि लेनदेन की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि लोग अब बड़ी रकम से ज़्यादा छोटी छोटी रोज़मर्रा की खरीद के लिए यूपीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं।

यही वह बदलाव है जो इस पूरी कहानी को खास बनाता है। दस रुपये की चाय हो या बीस रुपये का सामान, अब ऐसे मामूली भुगतान भी नकदी के बजाय फोन से हो रहे हैं। कभी जो पर्स और खुले पैसे की समस्या हुआ करती थी, वह अब क्यूआर कोड और चंद टैप में सिमट कर रह गई है, और यही आदत करोड़ों नए लेनदेन को जन्म दे रही है।

दुनिया में सबसे आगे भारत

यह क्रांति सिर्फ भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। तमाम रिपोर्टों के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले रियल टाइम डिजिटल भुगतान का लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत में होता है। इतने बड़े पैमाने पर और इतनी तेज़ी से भुगतान करने वाली व्यवस्था दुनिया के बहुत कम देशों के पास मौजूद है।

क्या रफ्तार थम रही है

हालांकि इस लगातार बढ़ते आंकड़े के बीच एक और संकेत भी है, जिसे समझना ज़रूरी है। अगस्त में लेनदेन की संख्या में सालाना आधार पर करीब 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि ठीक एक साल पहले अगस्त 2025 में यही बढ़ोतरी करीब 34 प्रतिशत थी। यानी वृद्धि की रफ्तार अब पहले जितनी तेज़ नहीं रह गई है।

जानकार इसे किसी कमज़ोरी के बजाय व्यवस्था के परिपक्व होने का संकेत मानते हैं। जब आधार पहले से ही इतना बड़ा हो चुका हो, तो हर नई बढ़ोतरी का प्रतिशत स्वाभाविक रूप से छोटा दिखने लगता है। असल संख्या में तो हर महीने अब भी अरबों लेनदेन जुड़ रहे हैं, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

नकदी से मोबाइल तक का सफर

इस पूरे बदलाव का सबसे गहरा असर आम आदमी और छोटे कारोबारियों पर पड़ा है। रेहड़ी पटरी वाले, छोटे दुकानदार और घरेलू कारीगर अब आसानी से डिजिटल भुगतान स्वीकार कर पा रहे हैं, जिससे उन्हें बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ने और अपने लेनदेन का हिसाब रखने में मदद मिल रही है।

कुछ ही साल पहले तक जहां हर सौदे के लिए खुले पैसे और नकदी की ज़रूरत पड़ती थी, वहीं आज एक साधारण मोबाइल फोन ही पूरा बटुआ बन गया है। इस सहूलियत ने न सिर्फ शहरों बल्कि कस्बों और गांवों तक डिजिटल लेनदेन की आदत को गहराई से पहुंचा दिया है।

आगे की राह

आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि भारत में डिजिटल भुगतान अब पीछे लौटने वाला रास्ता नहीं है। असली चुनौती अब इस विशाल व्यवस्था को सुरक्षित, भरोसेमंद और हर वर्ग के लिए सुलभ बनाए रखने की होगी, ताकि छोटे से छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक हर कोई बिना किसी डर के इस पर भरोसा कर सके और यह रफ्तार बनी रहे।

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इशा मल्होत्रा 2026-09-18 · 4 min read · 8 reads
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