हर नोट पर छपे रुपये के चिन्ह की उम्र बमुश्किल पंद्रह साल है। साल दो हज़ार नौ की राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता, तीन हज़ार से ज़्यादा डिज़ाइन, और डी उदय कुमार का जीतने वाला नमूना, देवनागरी और अंग्रेज़ी के मेल से बने इस प्रतीक की पूरी कहानी, बाज़ारों में आम आदमी की जेब देखने वाली एक पत्रकार की नज़र से।
सब्ज़ी मंडी के दामों में मुझे अक्सर आम आदमी की असली हालत साफ दिखाई देती है। रोज़मर्रा की इसी जद्दोजहद में, हम सबके हाथों से होकर गुज़रने वाला रुपये का नोट, हमारी ज़िंदगी का एक अटूट हिस्सा बन चुका है। पर क्या आपने कभी उस पर छपे रुपये के छोटे से चिन्ह पर गौर किया है?
वह चिन्ह, जिसे हम आज हर नोट, हर दुकान और हर मोबाइल स्क्रीन पर देखते हैं, असल में उतना पुराना नहीं है जितना हम अक्सर समझ बैठते हैं। इसकी उम्र तो अभी बमुश्किल पंद्रह साल ही है। इससे पहले हम भारतीय रुपये के लिए सिर्फ आर एस या रु जैसे अक्षर लिखा करते थे।
एक चिन्ह की ज़रूरत
दरअसल, किसी भी मुद्रा का अपना एक खास चिन्ह, उसे एक अलग और मजबूत वैश्विक पहचान देता है। डॉलर का अपना निशान, पाउंड और यूरो के अपने प्रतीक, ये सब उन देशों की आर्थिक ताकत के प्रतीक भी बन जाते हैं। लेकिन लंबे समय तक भारतीय रुपये के पास ऐसा अपना कोई विशिष्ट चिन्ह नहीं था।
इसी कमी को दूर करने के लिए, साल दो हज़ार नौ में भारत सरकार ने एक बेहद अनोखा फैसला लिया। उसने पूरे देश के आम लोगों को खुला न्योता दिया कि वे खुद अपने रुपये के लिए एक चिन्ह डिज़ाइन करें, और इसके लिए एक बड़ी राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।
तीन हज़ार से ज़्यादा डिज़ाइन

इस प्रतियोगिता को देश भर से वाकई ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली। हर उम्र और हर क्षेत्र के लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, और कुल मिलाकर तीन हज़ार से भी ज़्यादा डिज़ाइन सरकार के पास पहुंचे। इन्हीं में से छांटकर आखिरी पांच बेहतरीन नमूनों को अंतिम दौर के लिए चुना गया।
और इन सबमें जिस एक डिज़ाइन ने आखिरकार बाज़ी मारी, वह था तमिलनाडु के डी उदय कुमार का बनाया हुआ चिन्ह। पेशे से वास्तुकार उदय कुमार उस समय आईआईटी बॉम्बे में शोध छात्र थे, और बाद में वे आईआईटी गुवाहाटी में प्रोफेसर के पद तक भी पहुंचे।
डिज़ाइन में छिपे अर्थ
इस चिन्ह की सबसे खूबसूरत बात है इसके भीतर छिपे हुए गहरे अर्थ। यह असल में देवनागरी लिपि के अक्षर र और अंग्रेज़ी के बड़े अक्षर आर, इन दोनों का एक बेहद सुंदर मेल है। यानी इसमें भारत की गहरी सांस्कृतिक जड़ें और उसकी वैश्विक सोच, दोनों एक साथ बखूबी झलकती हैं।
इसके ऊपर खिंची क्षैतिज रेखा, देवनागरी की उसी शिरोरेखा से आती है जो हमारी लिपि की एक खास पहचान मानी जाती है। साथ ही, इसमें बनी दो समानांतर रेखाएं बराबर के चिन्ह जैसी दिखती हैं, जो आर्थिक संतुलन के साथ-साथ हमारे तिरंगे झंडे का भी सुंदर आभास कराती हैं।
पंद्रह जुलाई दो हज़ार दस
आखिरकार वह ऐतिहासिक दिन आया पंद्रह जुलाई, साल दो हज़ार दस को, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उदय कुमार के बनाए इस चिन्ह पर अपनी आधिकारिक मुहर लगा दी। ठीक इसी दिन भारतीय रुपये को उसकी अपनी बिल्कुल नई और स्थायी पहचान हासिल हो गई।
इस एक अहम फैसले के साथ ही भारत उन गिने-चुने देशों की कतार में शामिल हो गया, जिनकी मुद्रा का अपना एक अलग और विशिष्ट चिन्ह होता है। डॉलर, पाउंड, यूरो और येन की ही तरह, अब भारतीय रुपये का प्रतीक भी दुनिया भर में तुरंत पहचाना जाने लगा।
सिर्फ एक चिन्ह से ज़्यादा
यह चिन्ह सिर्फ एक साधारण निशान भर नहीं है, बल्कि देश की एक तरह की सॉफ्ट पावर यानी सांस्कृतिक ताकत का भी प्रतीक बन गया है। कंप्यूटर के कीबोर्ड से लेकर मोबाइल फोन तक, आज यह हर डिजिटल जगह पर मौजूद है और भारत की लगातार बढ़ती आर्थिक हैसियत को साफ दर्शाता है।
पर सबसे खास बात यह है कि यह चिन्ह किसी दूर की चीज़ नहीं, बल्कि हमारी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा है। जिस नोट को थामे एक मज़दूर अपनी दिन भर की दिहाड़ी गिनता है, या एक गृहिणी घर का महीने भर का बजट बनाती है, उसी नोट पर छपा यह नन्हा सा चिन्ह हमेशा चुपचाप मौजूद रहता है।
आम आदमी की जेब का प्रतीक
मेरे लिए, जो रोज़ अलग-अलग बाज़ारों और मंडियों में आम आदमी की जेब की असली हालत को देखती हूं, यह चिन्ह और भी ज़्यादा मायने रखता है। यह हर उस छोटे-बड़े लेन-देन का खामोश गवाह है, चाहे वह सब्ज़ी वाले को दिए गए दस रुपये हों या फिर किसी बड़ी दुकान का लंबा बिल।
एक छोटा सा चिन्ह, अपने भीतर पूरे देश की पहचान, संस्कृति और करोड़ों लोगों के आर्थिक सपनों को समेटे हुए है। तो अगली बार जब आप किसी नोट पर या अपने फोन की स्क्रीन पर रुपये का यह निशान देखें, तो एक पल रुककर उसके पीछे छिपी इस दिलचस्प कहानी को ज़रूर याद कीजिएगा।
देवनागरी पर बहुत अच्छी कवरेज.
देवनागरी का अच्छा विश्लेषण.
अच्छी बात.
सहमत हूँ.

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