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भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी, फिर भी सेंसेक्स और निफ्टी सुस्त

इशा मल्होत्रा इशा मल्होत्रा ishamalhotra.avalw.com · 922 reads Respect0 Save Share Read only
READS451live count PUBLISHED4 Sept2026 READING TIME4 min709 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8 प्रतिशत बढ़ी, जो रिज़र्व बैंक के अनुमान से बेहतर है। इसके बावजूद वैश्विक दबावों के चलते सेंसेक्स और निफ्टी लगभग सपाट रहे, जबकि जीएसटी संग्रह में मज़बूत उछाल दर्ज हुआ।

भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर अपनी मज़बूती का परिचय दिया है। हाल में जारी आँकड़ों के अनुसार, देश की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर उम्मीद से बेहतर रही, लेकिन इसके बावजूद शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांक लगभग एक ही जगह ठहरे नज़र आए, जिसने कई निवेशकों को हैरान किया है।

तेज़ आर्थिक वृद्धि और सुस्त बाज़ार के बीच का यह अंतर इस समय चर्चा का एक बड़ा विषय बना हुआ है। यहाँ हम आधिकारिक रूप से उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर जीडीपी, शेयर बाज़ार, जीएसटी संग्रह और रुपये की मौजूदा स्थिति को क्रमवार ढंग से समझने की कोशिश करेंगे।

जीडीपी में 7.8 प्रतिशत की मज़बूत बढ़त

भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती ताज़ा आँकड़ों में साफ़ झलक रही है। प्रतीकात्मक तस्वीर।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती ताज़ा आँकड़ों में साफ़ झलक रही है। प्रतीकात्मक तस्वीर।

उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के दौरान भारत की वास्तविक जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। यह वृद्धि दर भारतीय रिज़र्व बैंक के 7 प्रतिशत के अनुमान और अर्थशास्त्रियों की उम्मीदों, दोनों से ही बेहतर रही, जो अर्थव्यवस्था की मज़बूत बुनियाद को दर्शाती है।

इसी अवधि में वास्तविक सकल मूल्य वर्धित यानी जीवीए में 8.2 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। वहीं नाममात्र जीडीपी 10.3 प्रतिशत बढ़कर लगभग 88.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गई। ये आँकड़े बताते हैं कि तमाम वैश्विक चुनौतियों के बीच भी देश की आर्थिक गतिविधियाँ ठोस गति से आगे बढ़ रही हैं।

फिर भी शेयर बाज़ार सुस्त क्यों

इतनी मज़बूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद शेयर बाज़ार में कोई खास उत्साह देखने को नहीं मिला। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, 1 सितंबर 2026 को निफ्टी 50 मामूली गिरावट के साथ 24,055.80 के स्तर पर और बीएसई सेंसेक्स 76,944.28 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि बैंक निफ्टी में तुलनात्मक रूप से कुछ बड़ी गिरावट देखी गई।

जानकारों के मुताबिक, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि घरेलू स्तर पर मज़बूत वृद्धि भी, कम समय में बढ़ती वैश्विक ब्याज दरों के दबाव की भरपाई नहीं कर पाती। यानी अर्थव्यवस्था भले ही तेज़ी से बढ़ रही हो, पर बाज़ार की चाल पर इस समय बाहरी कारकों का असर कहीं अधिक हावी दिखाई दे रहा है।

वैश्विक दबाव हावी

रिपोर्ट के अनुसार, इस समय कई वैश्विक कारक निवेशकों की धारणा पर भारी पड़ रहे हैं। इनमें कच्चे तेल की ऊँची कीमतें प्रमुख हैं, जहाँ ब्रेंट क्रूड करीब 94.33 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। ऊँची तेल कीमतें आयात पर निर्भर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए हमेशा एक अहम चिंता का विषय रहती हैं।

इसके अलावा, अमेरिका में दस वर्षीय सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न करीब 4.8 प्रतिशत तक पहुँच गया है, वहीं जापान में यह दर 1996 के बाद पहली बार 3 प्रतिशत पर आ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, बाज़ार अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दर बढ़ाए जाने की करीब 60 प्रतिशत संभावना भी मान रहे हैं।

जीएसटी संग्रह में उछाल

अर्थव्यवस्था की मज़बूती की एक और झलक जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर के संग्रह में भी दिखाई दी है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, अगस्त 2026 में कुल जीएसटी संग्रह 1,99,853 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में करीब 14.8 प्रतिशत अधिक है, और यह घरेलू खपत की मज़बूती को दर्शाता है।

आँकड़ों के अनुसार, शुद्ध जीएसटी संग्रह भी 8.3 प्रतिशत बढ़कर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये रहा। इस दौरान आयात से मिलने वाले जीएसटी में करीब 29 प्रतिशत की तेज़ बढ़त देखी गई, जबकि घरेलू स्तर पर जीएसटी संग्रह में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो व्यापक आर्थिक गतिविधियों का एक अच्छा संकेत है।

रुपये की चाल

विदेशी मुद्रा बाज़ार में भारतीय रुपये की चाल पर भी सभी की नज़रें टिकी रहीं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, 1 सितंबर 2026 को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 95.2 के स्तर पर रहा। कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक ब्याज दरों का असर आने वाले समय में भी रुपये की चाल पर बना रह सकता है, जिस पर बाज़ार की करीबी नज़र है।

आगे की राह

कुल मिलाकर, मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियादी ताकत मज़बूत बनी हुई है, भले ही शेयर बाज़ार फिलहाल वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतर्क रुख अपनाए हुए हो। तेज़ जीडीपी वृद्धि और बढ़ता जीएसटी संग्रह, दोनों ही घरेलू मांग और उत्पादन की मज़बूती की ओर इशारा करते हैं।

जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक हालात स्थिर होंगे और पूँजी का प्रवाह बेहतर होगा, घरेलू अर्थव्यवस्था की यह मज़बूती धीरे-धीरे बाज़ार की चाल में भी झलकने लगेगी। ऐसे में आने वाले महीनों में आर्थिक आँकड़ों और वैश्विक रुझानों पर निवेशकों की नज़र लगातार बनी रहेगी।

5 responses

जीएसटी: कहीं और से बेहतर बताया.

4

जीएसटी को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.

3

जीएसटी के बारे में बहुत उपयोगी लेख.

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एकदम सही.

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बिल्कुल.

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इशा मल्होत्रा
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इशा मल्होत्रा 2026-09-04 · 4 min read · 451 reads
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