भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखते हुए तटस्थ रुख बनाए रखा है। आरबीआई के मुताबिक आने वाले वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि 6.9 प्रतिशत और महंगाई 4.6 प्रतिशत रह सकती है। जानिए पूरी तस्वीर।
देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई की भूमिका बेहद अहम होती है। ब्याज दरों से लेकर महंगाई पर नजर रखने तक, इसके फैसले आम आदमी की जेब और कारोबार दोनों को प्रभावित करते हैं। इस साल आरबीआई ने अपनी प्रमुख नीतिगत दर को स्थिर रखते हुए संतुलित रुख अपनाया है।
मौद्रिक नीति के ये फैसले अक्सर तकनीकी शब्दों में घिरे रहते हैं, जिससे आम पाठक के लिए उन्हें समझना मुश्किल हो जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए इस लेख में हम आरबीआई के हालिया रुख, विकास दर और महंगाई से जुड़े अनुमानों को आसान भाषा में समझने की कोशिश करेंगे, ताकि पूरी तस्वीर साफ हो सके।
रेपो रेट पर स्थिरता
आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है और अपने तटस्थ रुख को जारी रखा है। रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है। इसमें बदलाव न करने का मतलब है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल महंगाई और वृद्धि के बीच सावधानी से संतुलन बनाकर चलना चाहता है।
रिपोर्टों के अनुसार इसके साथ ही स्थायी जमा सुविधा यानी एसडीएफ दर 5.00 प्रतिशत पर और सीमांत स्थायी सुविधा यानी एमएसएफ दर तथा बैंक दर 5.50 प्रतिशत पर बनी हुई है। तटस्थ रुख का अर्थ है कि आगे दरों में बदलाव पूरी तरह आने वाले आंकड़ों, खासकर महंगाई और आर्थिक वृद्धि की चाल पर निर्भर करेगा।
विकास दर का अनुमान

आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर तस्वीर उत्साहजनक बनी हुई है। आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7.6 प्रतिशत कर दिया है, जो पहले 7.4 प्रतिशत आंका गया था। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि केंद्रीय बैंक को देश की आर्थिक गतिविधियों की मजबूती पर भरोसा है और मांग की स्थिति सकारात्मक बनी हुई है।
अगले वित्त वर्ष के लिए आरबीआई ने जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। तिमाही आधार पर देखें तो पहली तिमाही में यह 6.8 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि यह चालू वर्ष से थोड़ा कम है, फिर भी वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच इसे एक मजबूत रफ्तार ही माना जा रहा है।
महंगाई पर नजर
महंगाई को काबू में रखना हमेशा से आरबीआई की प्राथमिकता रही है। चालू वित्त वर्ष के लिए उम्मीद जताई गई है कि खुदरा महंगाई केंद्रीय बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे बनी रहेगी। यह आम लोगों के लिए राहत की बात है, क्योंकि कीमतों में स्थिरता से घर के बजट पर दबाव कम पड़ता है।
आने वाले वित्त वर्ष के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 4.6 प्रतिशत रखा गया है। तिमाही आधार पर यह पहली तिमाही में 4.0, दूसरी में 4.4, तीसरी में 5.2 और चौथी तिमाही में 4.7 प्रतिशत रह सकती है। तीसरी तिमाही में महंगाई के थोड़ा ऊपर जाने का अनुमान है, जिस पर केंद्रीय बैंक की खास नजर रहेगी।
रुपये और बॉन्ड यील्ड की चुनौती
आरबीआई के सतर्क रुख के पीछे कुछ चुनौतियां भी हैं। रिपोर्टों के अनुसार कमजोर होते रुपये और बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने चिंता बढ़ाई है। इसके साथ ही भू-राजनीतिक तनाव भी वृद्धि और महंगाई दोनों पर असर डाल सकते हैं। ऐसे में दरों को स्थिर रखना एक सोच-समझकर उठाया गया संतुलित कदम माना जा रहा है।
आम आदमी पर असर
रेपो रेट के स्थिर रहने का सीधा असर कर्ज लेने वालों पर पड़ता है। दरों में बदलाव न होने से घर या वाहन के कर्ज की मासिक किस्त यानी ईएमआई में अचानक उछाल की आशंका कम रहती है। वहीं जमाकर्ताओं के लिए भी ब्याज दरें कमोबेश स्थिर बनी रहती हैं, जिससे बचत की योजना बनाना थोड़ा आसान हो जाता है।
स्थिरता का यह माहौल कारोबार जगत के लिए भी मददगार साबित होता है। जब ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता कम होती है, तो कंपनियां निवेश और विस्तार से जुड़े फैसले अधिक भरोसे के साथ ले पाती हैं। इस तरह मौद्रिक नीति का असर सिर्फ बैंकों तक सीमित न रहकर पूरी अर्थव्यवस्था की गतिविधियों तक पहुंचता है।
आगे की राह
कुल मिलाकर आरबीआई ने विकास को सहारा देने और महंगाई पर लगाम रखने के बीच एक सावधान रास्ता चुना है। आने वाले महीनों में इसके फैसले काफी हद तक महंगाई के रुख, वैश्विक हालात और रुपये की चाल पर निर्भर करेंगे। ऐसे में हर नीतिगत समीक्षा पर बाजार और आम लोगों, दोनों की निगाहें टिकी रहेंगी।
आरबीआई पर बहुत अच्छी कवरेज.
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