एक बड़े भारतीय अध्ययन ने चौंकाने वाली बात बताई है, हमारी थाली में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा इतनी ज़्यादा है कि सिर्फ अनाज बदलने से नहीं, बल्कि मात्रा घटाने और प्रोटीन बढ़ाने से ही असली फायदा होगा।
हमारी थाली में क्या परोसा जाता है, यह हमारी सेहत के बारे में बहुत कुछ कह देता है। भारत में मधुमेह और मोटापे के बढ़ते मामलों के बीच, एक बड़े राष्ट्रीय अध्ययन ने आम भारतीय भोजन की आदतों पर गहरी नज़र डाली है। इसके नतीजे कई पुरानी धारणाओं को चुनौती देते हैं और बताते हैं कि सेहतमंद रहने के लिए सिर्फ यह बदलना काफी नहीं कि हम क्या खाते हैं, बल्कि यह भी मायने रखता है कि कितना खाते हैं।
थाली में कार्ब की भरमार
अध्ययन की सबसे बुनियादी बात यह है कि औसतन एक भारतीय अपनी दिनभर की ऊर्जा का करीब 62 प्रतिशत हिस्सा अकेले कार्बोहाइड्रेट से हासिल करता है। चिंता की बात सिर्फ यह मात्रा नहीं, बल्कि इसका स्रोत भी है। यह कार्बोहाइड्रेट ज़्यादातर सफेद चावल, रिफाइंड यानी बारीक पिसे अनाज और मिलाई गई चीनी जैसे कम गुणवत्ता वाले स्रोतों से आता है, जो सेहत के लिहाज़ से कमज़ोर माने जाते हैं।
इसके ठीक उलट, हमारी थाली में प्रोटीन की हिस्सेदारी बहुत कम रह जाती है। अध्ययन के अनुसार, औसतन केवल 12 प्रतिशत ऊर्जा ही प्रोटीन से मिलती है, जबकि सुझाई गई मात्रा करीब 15 प्रतिशत है। इसके साथ ही संतृप्त वसा यानी सैचुरेटेड फैट का स्तर भी ज़रूरत से ज़्यादा पाया गया। यह असंतुलन ही धीरे-धीरे कई गंभीर बीमारियों की नींव तैयार करता है।
सिर्फ अनाज बदलना काफी नहीं

अब तक आम धारणा यही रही है कि सफेद चावल छोड़कर गेहूँ के आटे या मोटे अनाज की रोटी खाने से सेहत अपने आप सुधर जाएगी। लेकिन इस अध्ययन का सबसे अहम और चौंकाने वाला निष्कर्ष इसी सोच को चुनौती देता है। इसके अनुसार, अगर कुल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज़्यादा बनी रहती है, तो केवल सफेद चावल की जगह गेहूँ या बाजरे-ज्वार का आटा ले लेने भर से जोखिम कम नहीं होता।
इसकी वजह भी दिलचस्प है। जब अनाज को बारीक पीसकर आटा बनाया जाता है, चाहे वह गेहूँ हो या मोटा अनाज, तो उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बढ़ जाता है। सरल शब्दों में कहें तो पिसा हुआ आटा खाने पर खून में शर्करा यानी ब्लड शुगर लगभग उतनी ही तेज़ी से बढ़ता है, जितना सफेद चावल खाने पर। यही कारण है कि सिर्फ अनाज का प्रकार बदलना पूरी समस्या का हल नहीं है।
बीमारियों से गहरा नाता
यह असंतुलित आहार सीधे-सीधे गंभीर बीमारियों से जुड़ा हुआ है। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों के भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा सबसे अधिक थी, उनमें टाइप-2 मधुमेह, मधुमेह से पहले की अवस्था यानी प्रीडायबिटीज़, सामान्य मोटापे और खासकर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी का खतरा करीब 15 से 30 प्रतिशत तक अधिक था। यह आँकड़ा अपने आप में एक बड़ी चेतावनी है।
भारत जैसे विशाल देश में खान-पान की आदतें क्षेत्र के हिसाब से बदलती हैं। अध्ययन के अनुसार, दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में सफेद चावल थाली का मुख्य हिस्सा है, जबकि उत्तर और मध्य भारत में गेहूँ की रोटी का चलन ज़्यादा है। स्रोत भले अलग हों, पर दोनों ही जगह कुल कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा एक साझा चुनौती के रूप में सामने आती है।
तो फिर करें क्या
इन नतीजों का संदेश साफ है। असली फायदा तब होगा जब हम कार्बोहाइड्रेट की कुल मात्रा को थोड़ा कम करें और साथ ही अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोटीन को बढ़ाएँ। इसके लिए किसी महँगे विदेशी भोजन की ज़रूरत नहीं है। दालें, चना, राजमा, दूध और दही जैसे पारंपरिक और सुलभ स्रोत प्रोटीन की कमी को बखूबी पूरा कर सकते हैं, बशर्ते इन्हें थाली में उचित जगह मिले।
यहाँ यह समझना भी ज़रूरी है कि कार्बोहाइड्रेट कोई दुश्मन नहीं है। यह शरीर के लिए ऊर्जा का अहम स्रोत है और इसे पूरी तरह छोड़ देना कोई समझदारी नहीं। असली कुंजी संतुलन और मात्रा में है। थाली में चावल या रोटी की मात्रा थोड़ी घटाकर, उसकी जगह हरी सब्ज़ियों, दालों और सलाद को बढ़ा देना ही सबसे व्यावहारिक और टिकाऊ रास्ता है।
यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि मधुमेह और मोटापा अब सिर्फ बुज़ुर्गों की समस्या नहीं रह गए। बदलती जीवनशैली, बाहर के तैयार भोजन पर बढ़ती निर्भरता और शारीरिक श्रम में कमी के चलते ये बीमारियाँ अपेक्षाकृत कम उम्र में भी दस्तक देने लगी हैं। ऐसे में परिवार के स्तर पर संतुलित थाली की आदत डालना, आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ रखने की दिशा में एक ज़रूरी और दूरगामी निवेश साबित हो सकता है।
छोटे बदलाव, बड़ा असर
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चीनी, नमक और अत्यधिक तले-भुने तथा प्रोसेस्ड भोजन को कम करने की सलाह देते आए हैं, और साथ में नियमित शारीरिक गतिविधि पर ज़ोर देते हैं। इस अध्ययन के नतीजे उसी सलाह को और मज़बूती देते हैं। खान-पान में एक झटके में भारी बदलाव करने के बजाय, छोटे-छोटे और टिकाऊ कदम लंबे समय में कहीं बड़ा असर डालते हैं।
कुल मिलाकर, यह अध्ययन हमें अपनी थाली को नए सिरे से देखने का न्योता देता है। सेहत का रास्ता किसी एक अनाज को अच्छा या बुरा ठहराने से नहीं, बल्कि पूरी थाली के संतुलन से होकर गुज़रता है। थोड़ी कम मात्रा, थोड़ा अधिक प्रोटीन और थोड़ी ज़्यादा हरियाली, इतने भर से हम आने वाले वर्षों में अपनी सेहत को कहीं मज़बूत आधार दे सकते हैं।

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