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भारतीय थाली में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता, बड़े अध्ययन में डायबिटीज़ से गहरा नाता

नेहा राव नेहा राव neharao.avalw.com · 149 reads Respect0 Save Share Read only
READS9live count PUBLISHED16 Sept2026 READING TIME4 min755 words LANGUAGEHindi
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आईसीएमआर और एमडीआरएफ के एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि भारतीय आहार में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता डायबिटीज़ का खतरा बढ़ाती है। कुछ हिस्सा प्रोटीन से बदलने पर यह जोखिम काफ़ी घट सकता है।

भारतीय थाली को लेकर एक बड़े अध्ययन ने अहम बात सामने रखी है। हमारे रोज़मर्रा के भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज़रूरत से कहीं अधिक है, और इसका सीधा नाता बढ़ते डायबिटीज़ के खतरे से जुड़ता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर और मद्रास डायबिटीज़ रिसर्च फाउंडेशन के इस अध्ययन ने आहार को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दी है।

क्या कहता है यह अध्ययन

यह कोई छोटा सर्वेक्षण नहीं था। पंद्रह साल तक चले इस अध्ययन में देश के हर हिस्से से कुल 18,090 वयस्कों के आहार का बारीकी से विश्लेषण किया गया। इसके नतीजे प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर मेडिसिन में 3 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित हुए। इतने बड़े और लंबे अध्ययन के कारण इसके निष्कर्षों को बेहद भरोसेमंद माना जा रहा है।

अध्ययन के अनुसार एक औसत भारतीय अपने भोजन से मिलने वाली कुल ऊर्जा का लगभग 62 प्रतिशत हिस्सा कार्बोहाइड्रेट से पाता है, और यह अक्सर परिष्कृत यानी रिफाइंड स्रोतों से आता है। ऐसे उच्च कार्बोहाइड्रेट वाले आहार को टाइप 2 डायबिटीज़ और प्री-डायबिटीज़ के खतरे से जोड़ा गया है, जो 40 प्रतिशत तक अधिक हो सकता है।

ताज़ी सब्ज़ियां और दालें भारतीय थाली को अधिक संतुलित बना सकती हैं। पोषण विशेषज्ञ प्रोटीन और फाइबर बढ़ाने की सलाह देते हैं।
ताज़ी सब्ज़ियां और दालें भारतीय थाली को अधिक संतुलित बना सकती हैं। पोषण विशेषज्ञ प्रोटीन और फाइबर बढ़ाने की सलाह देते हैं।

प्रोटीन की अहम भूमिका

अध्ययन का एक सबसे उत्साहजनक निष्कर्ष प्रोटीन से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि रोज़ की कार्बोहाइड्रेट कैलोरी में से केवल 5 प्रतिशत को पौधों या डेयरी से मिलने वाले प्रोटीन से बदल देने पर डायबिटीज़ का खतरा उल्लेखनीय रूप से कम हो जाता है। यानी बदलाव के लिए बहुत बड़ी छलांग की ज़रूरत नहीं है।

चिंता की बात यह है कि भारतीयों में प्रोटीन की मात्रा अब भी कम है। अध्ययन के मुताबिक यह कुल दैनिक कैलोरी का केवल 12 प्रतिशत के आसपास है, जो पर्याप्त नहीं माना जाता। दाल, फलियां और डेयरी उत्पादों को थाली में थोड़ा और बढ़ाकर इस कमी को दूर किया जा सकता है, और यह कदम सेहत के लिहाज़ से बड़ा फ़र्क ला सकता है।

सिर्फ़ अनाज बदलना काफ़ी नहीं

अध्ययन से जुड़ीं डॉ. आर. एम. अंजना ने एक अहम बात की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार सफेद चावल की जगह केवल गेहूं या बाजरा जैसे मोटे अनाज अपना लेना अपने आप में पर्याप्त नहीं है, जब तक कुल कार्बोहाइड्रेट की मात्रा में कमी न आए। यानी सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि हम कौन सा अनाज खा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि कितना खा रहे हैं।

यह बात एक आम धारणा को चुनौती देती है। अक्सर माना जाता है कि केवल अनाज बदल देने से सेहत सुधर जाएगी, लेकिन अध्ययन बताता है कि मात्रा पर ध्यान दिए बिना यह बदलाव अधूरा रह जाता है। संतुलित थाली का मतलब है कार्बोहाइड्रेट की समझदारी भरी मात्रा के साथ प्रोटीन और फाइबर का सही मेल।

वसा को लेकर भी चेतावनी

आहार में केवल कार्बोहाइड्रेट ही चिंता का विषय नहीं है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि संतृप्त वसा यानी सैचुरेटेड फैट का सेवन चार राज्यों को छोड़कर बाकी सभी जगह अनुशंसित सीमा से अधिक पाया गया। इसका मतलब है कि देश के बड़े हिस्से में लोग ज़रूरत से ज़्यादा संतृप्त वसा खा रहे हैं, जो हृदय और चयापचय संबंधी सेहत के लिए ठीक नहीं है।

बाजरा और मोटे अनाज की भूमिका

मोटे अनाज को लेकर भी उम्मीदें बड़ी हैं। अन्य अध्ययनों के अनुसार ज्वार, रागी और बाजरा जैसे अनाज रक्त शर्करा के स्तर को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं, चाहे वह भोजन के तुरंत बाद का स्तर हो या लंबी अवधि का। फाइबर और खनिजों से भरपूर ये अनाज पोषण की दृष्टि से समृद्ध माने जाते हैं और जलवायु के लिहाज़ से भी टिकाऊ हैं।

हालांकि यहां एक व्यावहारिक अड़चन भी है। अध्ययनों में पाया गया है कि मोटे अनाज के फ़ायदों के प्रति जागरूकता तो अधिक है, लेकिन इनका वास्तविक सेवन कम रहता है। इसकी वजह इन्हें आसानी से न मिल पाना और सही जानकारी का अभाव जैसी बाधाएं हैं। इसलिए मोटे अनाज मदद तो करते हैं, पर कुल कार्बोहाइड्रेट घटाने के साथ ही उनका असली लाभ मिलता है।

नीति और आगे की राह

अध्ययन ने एक नीतिगत सुझाव भी दिया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि सरकार को दाल और फलियों जैसी प्रोटीन युक्त फसलों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य का दायरा बढ़ाना चाहिए। इससे ये फसलें अधिक उपलब्ध और किफ़ायती होंगी, और आम परिवारों के लिए प्रोटीन युक्त भोजन तक पहुंच आसान बन सकेगी। यह एक ढांचागत बदलाव है जो लंबे समय में बड़ा असर डाल सकता है।

व्यक्तिगत स्तर पर संदेश साफ़ है। थाली को संतुलित रखें, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा पर नज़र रखें और प्रोटीन, दाल तथा सब्ज़ियों को अधिक जगह दें। यह अध्ययन भारतीय आहार को लेकर सोच बदलने वाला है, क्योंकि यह सवाल केवल अनाज के चुनाव तक सीमित नहीं रखता। सही नीति और समझदार व्यक्तिगत आदतें, दोनों मिलकर ही देश में बढ़ते डायबिटीज़ की चुनौती से पार पाने में मदद कर सकती हैं।

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नेहा राव 2026-09-16 · 4 min read · 9 reads
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