भारत में AI की बात अक्सर सरकारी इंडियाएआई मिशन या स्वदेशी भाषा मॉडलों तक सिमट जाती है, लेकिन असली बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर मुकेश अंबानी की रिलायंस बड़ा दांव खेल रही है। कंपनी गुजरात के जामनगर में एक गीगावाट क्षमता का विशाल AI डेटा सेंटर बना रही है, जिसकी पहली 120 मेगावाट क्षमता 2026 के अंत तक चाल
जामनगर में बन रहा विशालकाय डेटा सेंटर
रिलायंस अपनी नई इकाई रिलायंस इंटेलिजेंस के जरिए गुजरात के जामनगर में एक विशाल AI डेटा सेंटर खड़ा कर रही है। यह वही जामनगर है जो कंपनी की दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी के लिए मशहूर है, और अब यह भारत के डिजिटल भविष्य का एक बेहद अहम केंद्र बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है।
कंपनी की योजना के मुताबिक, इस केंद्र की पहली 120 मेगावाट क्षमता को साल 2026 के अंत तक चालू कर दिया जाएगा। मगर यह तो महज एक शुरुआत भर है, क्योंकि रिलायंस का असली लक्ष्य इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर पूरे एक गीगावाट, यानी 1000 मेगावाट तक की विशालकाय क्षमता तक ले जाने का है।
एनवीडिया के साथ बड़ी साझेदारी

इस बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना की सबसे बड़ी ताकत है चिप बनाने वाली दिग्गज कंपनी एनवीडिया के साथ हुई साझेदारी। एनवीडिया ने इस एक गीगावाट के डेटा सेंटर के लिए अपने सबसे उन्नत ब्लैकवेल AI प्रोसेसर उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है, जो फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली चिप में गिने जाते हैं।
शुरुआत में यहां एनवीडिया के अत्याधुनिक GB300 GPU का एक बड़ा बेड़ा तैनात किया जा रहा है। इनकी गणना करने की ताकत इतनी जबरदस्त है कि यह AI-इन्फरेंस के आधार पर 75,000 से भी अधिक पुराने H100 चिप के बराबर आंकी जा रही है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी संख्या मानी जाती है।
और यह सिलसिला यहीं आकर नहीं रुकेगा, बल्कि आगे और भी बढ़ेगा। कंपनी का कहना है कि जब यह पूरी 120 मेगावाट की क्षमता चालू हो जाएगी, तब इसकी कुल गणना शक्ति 2,00,000 से भी अधिक H100 चिप के बराबर पहुंच जाएगी, जो किसी भी पैमाने पर एक चौंका देने वाला आंकड़ा है।
अरबों डॉलर का निवेश
इतने विशाल ढांचे को खड़ा करना बेहद खर्चीला काम है, इसमें कोई दो राय नहीं। जामनगर की यह परियोजना रिलायंस की पहले घोषित 110 अरब डॉलर की उस बड़ी AI बुनियादी ढांचा प्रतिबद्धता का हिस्सा है, और अकेले इस एक केंद्र की लागत ही 20 से 30 अरब डॉलर के बीच रहने का अनुमान है।
पैसे के साथ-साथ ऊर्जा की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है, क्योंकि ऐसे डेटा सेंटर भारी मात्रा में बिजली की मांग करते हैं। इस मोर्चे पर रिलायंस ने एक दिलचस्प रास्ता चुना है — यह पूरा केंद्र कच्छ में मौजूद कंपनी के अपने सौर ऊर्जा मंच से मिलने वाली अक्षय ऊर्जा से ही चलाया जाएगा।
22 भाषाओं और वैश्विक साझेदारों का दांव
इस पूरी कवायद का मकसद सिर्फ तकनीकी ताकत दिखाना भर नहीं है, बल्कि इसका एक स्पष्ट भारतीय उद्देश्य भी जुड़ा हुआ है। इस डेटा सेंटर को भारत की 'संप्रभु AI रीढ़' के रूप में देखा जा रहा है, जिसे खास तौर पर देश की 22 भारतीय भाषाओं में AI सेवाएं देने के मकसद से तैयार किया जा रहा है।
इस विशाल सपने को साकार करने के लिए रिलायंस अकेले नहीं चल रही, बल्कि उसने दुनिया के बड़े डिजिटल दिग्गजों से हाथ मिलाया है। कंपनी गूगल और मेटा जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ अपने रिश्तों को और गहरा कर रही है, और गूगल के साथ तो यह सहयोग अब पूरी तरह 'AI-फर्स्ट' रूप ले चुका है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है
आम भारतीय उपयोगकर्ता के नजरिए से देखें तो इसका सीधा मतलब है कि भविष्य में AI सेवाएं और भी तेज, सस्ती और स्थानीय भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो सकती हैं। देश के भीतर ही इतनी बड़ी गणना शक्ति मौजूद होने से भारत की विदेशी सर्वरों पर निर्भरता भी काफी हद तक कम हो सकती है।
कुल मिलाकर, जामनगर की यह परियोजना सिर्फ एक कंपनी की महत्वाकांक्षा भर नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक भी है कि भारत अब AI की वैश्विक दौड़ में सिर्फ एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है। आने वाले साल ही बताएंगे कि यह महा-दांव आखिरकार कितना रंग लाता है।
रिलायंस AI डेटा सेंटर जामनगर का अच्छा विश्लेषण.

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