फरवरी 2026 में लाई गई रेल टेक नीति के तहत भारतीय रेल TRI-Netra, मशीन विजन और ड्रोन जैसी तकनीकों से पटरियों और ट्रेनों की स्मार्ट निगरानी कर रही है, ताकि सुरक्षा और दक्षता दोनों बेहतर हों।
दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक, भारतीय रेल, चुपचाप एक बड़े तकनीकी बदलाव से गुज़र रही है। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल पटरियों, ट्रेनों और सिग्नल प्रणाली की निगरानी के लिए किया जा रहा है, ताकि यात्रा और अधिक सुरक्षित तथा भरोसेमंद बन सके।
इस पूरे अभियान की रीढ़ है नई रेल टेक नीति, जिसे इसी साल की शुरुआत में लागू किया गया। इसका मकसद है नई तकनीकों को तेज़ी से अपनाना और देश भर के नवाचारकर्ताओं को रेलवे की व्यावहारिक समस्याओं का हल तैयार करने के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराना।
रेल टेक नीति
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 26 फरवरी 2026 को रेल टेक नीति की शुरुआत की। यह नीति किफ़ायती, व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर लागू होने योग्य समाधानों के विकास तथा तैनाती को गति देने के लिए एक व्यापक ढाँचा तैयार करती है, जिसमें एआई तथा डेटा आधारित तकनीकें शामिल हैं।
नीति की खास बात इसका खुलापन है। इसमें एक ही चरण में प्रस्ताव देने की सुविधा है, नवाचारकर्ता खुद भी अपनी ओर से चुनौती प्रस्ताव रख सकते हैं, और लागत को रेलवे तथा नवाचारकर्ता के बीच पचास-पचास के अनुपात में बाँटा जाता है, जिससे जोखिम दोनों पक्षों में साझा हो जाता है।
चालकों की तीसरी आँख: ट्राई-नेत्र

सबसे दिलचस्प तकनीकों में से एक है ट्राई-नेत्र, यानी एक उन्नत दृष्टि प्रणाली। यह कोहरे या भारी बारिश जैसी कम दृश्यता वाली परिस्थितियों में लोको पायलट यानी इंजन चालक की मदद करती है और कई तरह के सेंसरों को आपस में मिलाकर एक साथ काम करती है।
यह प्रणाली सिग्नल, पटरी की बनावट और सामने आने वाली बाधाओं को पहचानने में सक्षम है। उत्तर भारत में सर्दियों के घने कोहरे को देखते हुए यह तकनीक चालकों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि यह जोखिम को कम करने में सीधी मदद करती है।
चलती ट्रेनों की जाँच
एक और अहम तकनीक है मशीन विजन इंस्पेक्शन सिस्टम, जो एआई और मशीन लर्निंग की मदद से चलती ट्रेनों में लटकते, ढीले या गायब हुए पुर्ज़ों का पता लगाती है। फ़िलहाल इसकी तीन इकाइयाँ पूर्वोत्तर सीमा रेलवे, दो डीएफसीसीआईएल और एक दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में लगाई गई हैं।
पहियों की सेहत पर नज़र रखने के लिए व्हील इम्पैक्ट लोड डिटेक्टर की चौबीस प्रणालियाँ लगाई गई हैं। इसके अलावा रोलिंग स्टॉक की ऑनलाइन निगरानी करने वाली पच्चीस प्रणालियाँ थर्मल इमेजिंग और कंपन विश्लेषण के ज़रिए बेयरिंग तथा पहियों की स्थिति की जाँच करती हैं।
पटरियों की निगरानी
पटरियों की सेहत भी अब स्मार्ट तरीके से जाँची जा रही है। इंटीग्रेटेड ट्रैक मॉनिटरिंग सिस्टम की तीन इकाइयाँ एआई की मदद से रेल, स्लीपर और फ़ास्टनिंग यानी जोड़ने वाले हिस्सों में आने वाली खामियों का पता लगाती हैं, इससे पहले कि वे कोई बड़ी समस्या बन जाएँ।
आसमान से निगरानी की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए हैं। रायपुर मंडल में ड्रोन आधारित थर्मल मॉनिटरिंग का परीक्षण किया जा रहा है, जिसका मकसद ओवरहेड बिजली की तारों यानी कैटेनरी प्रणाली की जाँच को अधिक तेज़ और सुरक्षित बनाना है।
यह अहम क्यों है
इन सभी प्रणालियों में एक साझा सोच छिपी है। ये रखरखाव को प्रतिक्रियात्मक से बदलकर पूर्वानुमान आधारित बना देती हैं, यानी किसी हिस्से के खराब होने से पहले ही समस्या को पहचान लेना, जिससे देरी और तकनीकी खराबी दोनों को कम किया जा सकता है।
रोज़ाना करोड़ों यात्रियों को ढोने वाले नेटवर्क के लिए सुरक्षा और दक्षता में छोटा सा सुधार भी बहुत बड़ा असर डालता है। यही कारण है कि रेलवे इन तकनीकों को धीरे धीरे पूरे देश के नेटवर्क में फैलाने की तैयारी में जुटी हुई है।
आगे की राह
पचास-पचास लागत साझेदारी वाला मॉडल स्टार्टअप्स और नवाचारकर्ताओं को रेलवे के लिए समाधान बनाने का सीधा न्योता देता है। यह पहल भारत के व्यापक तकनीकी अभियान से भी जुड़ती है, जिसमें स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देने पर लगातार ज़ोर दिया जा रहा है।
कदम दर कदम, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब पटरियों, ट्रेनों और सिग्नलों का हिस्सा बनती जा रही है। इसका अंतिम लक्ष्य साफ़ है, एक ऐसी रेल व्यवस्था जो पहले से कहीं अधिक सुरक्षित, स्मार्ट और भरोसेमंद हो, और जो देश की बढ़ती ज़रूरतों के साथ कदम मिलाकर चल सके।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में बहुत उपयोगी लेख.

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