भारत सरकार ने करीब 10,372 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय मिशन के तहत 38,000 से अधिक जीपीयू सस्ती दर पर उपलब्ध कराए हैं और स्वदेशी भाषा मॉडल तैयार किए जा रहे हैं, जिनका लक्ष्य देश को आत्मनिर्भर बनाना है।
भारत तेजी से उन्नत तकनीक की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। इसी दिशा में सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है, जिसका मकसद देश में आधुनिक कंप्यूटिंग की मजबूत नींव तैयार करना है।
इस पहल के केंद्र में हैं तीन अहम चीजें, यानी सस्ती कंप्यूटिंग शक्ति, नए डेटा केंद्र और भारत में ही विकसित भाषा आधारित मॉडल। इन सबका उद्देश्य देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है।
मिशन का बजट और लक्ष्य

सरकार ने इस राष्ट्रीय मिशन के लिए करीब 10,372 करोड़ रुपये का बजट तय किया है, जो लगभग 1.25 अरब डॉलर के बराबर है। यह रकम देश के भीतर इस पूरे तंत्र को खड़ा करने में लगाई जाएगी।
यह निवेश सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संकेत है। इससे पता चलता है कि सरकार इस तकनीक को भविष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण मानती है और इसे बढ़ावा देने के लिए कितनी गंभीर है।
सस्ते जीपीयू की सुविधा
मिशन का सबसे चर्चित हिस्सा है कंप्यूटिंग शक्ति को सस्ता बनाना। रिपोर्टों के अनुसार, 38,000 से अधिक शक्तिशाली प्रोसेसर, यानी जीपीयू, एक साझा पोर्टल के जरिए स्टार्टअप और शोध संस्थानों को उपलब्ध कराए गए हैं।
इनका किराया केवल 115 से 150 रुपये प्रति घंटा रखा गया है, जो बाजार दर से लगभग 42 प्रतिशत कम है। सरकार का लक्ष्य साल 2026 के अंत तक इनकी संख्या बढ़ाकर एक लाख तक पहुंचाने का है।
देश भर में डेटा लैब
कंप्यूटिंग शक्ति के साथ ही बुनियादी ढांचे पर भी जोर दिया जा रहा है। योजना के तहत पूरे देश में करीब 600 डेटा लैब स्थापित करने की तैयारी है, ताकि छोटे शहरों तक भी इसका लाभ पहुंच सके।
इन प्रयोगशालाओं का मकसद छात्रों, शोधकर्ताओं और युवाओं को व्यावहारिक अनुभव देना है। इससे उम्मीद है कि दूर-दराज के इलाकों में भी नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
स्वदेशी भाषा मॉडल
इस मिशन का एक अहम पहलू है भारत में ही विकसित भाषा आधारित मॉडल तैयार करना। इसके लिए सर्वम नाम की कंपनी को देश का पहला स्वदेशी बड़ा भाषा मॉडल बनाने के लिए चुना गया है।
कंपनी ने 18 फरवरी 2026 को दो ओपन सोर्स मॉडल पेश किए, जिन्हें सर्वम-30बी और सर्वम-105बी नाम दिया गया है। ये मॉडल भारतीय जरूरतों और भाषाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए जा रहे हैं।
आईआईटी बॉम्बे की भूमिका
सरकारी सहयोग सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है। आईआईटी बॉम्बे के नेतृत्व वाले एक समूह को भी इस मिशन के तहत करीब 988.6 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, ताकि एक और बड़ा मॉडल तैयार हो सके।
इस समूह का लक्ष्य ऐसा मॉडल बनाना है जिसमें एक ट्रिलियन तक पैरामीटर हों। इतने बड़े पैमाने का मॉडल तैयार करना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण, लेकिन बेहद महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है।
इसका महत्व
इन प्रयासों का असर सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं रहेगा। सस्ती कंप्यूटिंग और स्वदेशी मॉडल से देश के स्टार्टअप और शोधकर्ता वैश्विक कंपनियों पर निर्भरता कम कर सकेंगे और अपनी शर्तों पर आगे बढ़ सकेंगे।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये योजनाएं जमीन पर कितनी सफल होती हैं। फिलहाल यह साफ है कि भारत इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता और अपनी क्षमता खुद बनाने पर जोर दे रहा है।
विवरण के लिए धन्यवाद.
यहाँ इंडियाएआई मिशन के बारे में काफी कुछ सीखा.
इंडियाएआई मिशन को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.
पूरी तरह सहमत.
मैं भी यही सोचता हूँ.
बहुत सही.
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