दुनिया भर के सर्वेक्षण बताते हैं कि अब लगभग हर पेशेवर डेवलपर कोड लिखने में एआई सहायक इस्तेमाल कर रहा है। जानिए GitHub Copilot, Cursor और Claude Code की होड़, उत्पादकता में उछाल और सुरक्षा की बढ़ती चिंताएँ।
कुछ साल पहले तक किसी सॉफ्टवेयर डेवलपर के लिए कोड की हर पंक्ति खुद टाइप करना बिल्कुल आम बात थी। लेकिन बीते कुछ महीनों में यह पूरी तस्वीर तेज़ी से बदल गई है, और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित सहायक इस पेशे का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
दुनिया भर में हुए ताज़ा सर्वेक्षण एक बेहद साफ़ तस्वीर पेश करते हैं। कोड लिखने में मदद करने वाले ये औज़ार अब किसी प्रयोग की चीज़ नहीं रह गए, बल्कि रोज़मर्रा के काम का ऐसा हिस्सा बन गए हैं जिनके बिना कई डेवलपर अपने काम की कल्पना भी नहीं कर पाते।
लगभग हर डेवलपर की आदत
इस बदलाव के आँकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं। स्टैक ओवरफ़्लो के 2025 के सर्वेक्षण के अनुसार करीब 84 प्रतिशत डेवलपर या तो ये औज़ार इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर जल्द इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं, यानी यह चलन अब पूरी तरह मुख्यधारा बन चुका है।
दूसरे अध्ययन भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं। डोरा की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 90 प्रतिशत पेशेवरों ने अपने काम में ये औज़ार अपना लिए हैं, जबकि डीएक्स के एक सर्वेक्षण में यह आँकड़ा 85 हज़ार से अधिक डेवलपर के बीच 91 प्रतिशत तक जा पहुँचा।
रोज़ का इस्तेमाल
बात सिर्फ़ अपनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस्तेमाल की तीव्रता भी लगातार बढ़ी है। स्टैक ओवरफ़्लो के अनुसार करीब 51 प्रतिशत पेशेवर डेवलपर अब हर दिन इन औज़ारों का सहारा लेते हैं, जो इनकी बेहद गहरी पैठ को साफ़ तौर पर दर्शाता है।
कुछ रिपोर्टें तो इससे भी आगे जाती हैं। डोरा के अध्ययन में सामने आया कि एक औसत डेवलपर अपने दिन का लगभग दो घंटे कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से होने वाले काम पर बिताता है, जो इस तकनीक पर बढ़ती निर्भरता का बड़ा सबूत माना जा रहा है।
औज़ारों की जंग

इस नए और तेज़ी से बढ़ते बाज़ार में कई बड़े नाम आमने सामने खड़े हैं। जेटब्रेन्स के जनवरी 2026 के सर्वेक्षण के अनुसार गिटहब कोपायलट करीब 29 प्रतिशत कामकाजी इस्तेमाल के साथ आगे है, और बड़ी कंपनियों में तो यह हिस्सेदारी 40 प्रतिशत तक पहुँच जाती है।
लेकिन इस बाज़ार में मुकाबला बेहद कड़ा है। इसी सर्वेक्षण में कर्सर और क्लॉड कोड जैसे औज़ार करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तेज़ी से उभरे हैं, और अमेरिका तथा कनाडा जैसे बाज़ारों में क्लॉड कोड की पकड़ और भी मज़बूत बताई गई है।
उत्पादकता में उछाल
इन औज़ारों की बढ़ती लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह इनसे मिलने वाला ठोस फ़ायदा है। डीएक्स की 2025 की चौथी तिमाही रिपोर्ट के अनुसार रोज़ इनका इस्तेमाल करने वाले डेवलपर हर हफ़्ते औसतन 2.3 पुल रिक्वेस्ट पूरी करते हैं, जबकि इन्हें न इस्तेमाल करने वालों का आँकड़ा सिर्फ़ 1.4 रहता है।
समय की बचत का पहलू भी बेहद उल्लेखनीय है। उसी रिपोर्ट के मुताबिक ये औज़ार एक औसत डेवलपर के हर हफ़्ते करीब 3.6 घंटे बचाते हैं, और जो लोग रोज़ाना इनका इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए यह बचत बढ़कर लगभग 4.1 घंटे तक पहुँच जाती है।
सुरक्षा की चिंता
हालाँकि यह पूरी तस्वीर उतनी गुलाबी नहीं है जितनी दिखती है। रफ़्तार और सुविधा के साथ कई नए जोखिम भी सामने आए हैं, और विशेषज्ञ बार बार आगाह कर रहे हैं कि मशीन से लिखे गए कोड पर आँख मूँदकर भरोसा करना ठीक नहीं होता।
मौजूद आँकड़े इस चिंता को और गंभीर बना देते हैं। वेराकोड के 2025 के एक अध्ययन के अनुसार सौ से अधिक भाषा मॉडलों की जाँच में पाया गया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बने करीब 45 प्रतिशत कोड में कोई न कोई सुरक्षा खामी मौजूद थी।
भारत के लिए इसका मतलब
भारत के लिए यह बदलाव ख़ास अहमियत रखता है, क्योंकि यहाँ दुनिया के सबसे बड़े डेवलपर समुदायों में से एक मौजूद है। लाखों इंजीनियरों वाले इस देश की विशाल आईटी इंडस्ट्री के लिए ये औज़ार अवसर और चुनौती, दोनों एक साथ लेकर आए हैं।
आने वाले वर्षों में असली सवाल यह नहीं होगा कि ये औज़ार इस्तेमाल हों या नहीं, बल्कि यह होगा कि इन्हें कितनी समझदारी और सतर्कता से अपनाया जाए। रफ़्तार और सुरक्षा के बीच सही संतुलन ही तय करेगा कि यह क्रांति वरदान बनती है या नई मुसीबत।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में अच्छा संदर्भ.
सच.
एकदम सही.

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