पोषण से भरपूर और पचने में आसान, मोटे अनाज यानी श्री अन्न 2026 में सेहत के प्रति जागरूक भारतीयों की थाली में तेजी से लौट रहे हैं।
सेहत का असली खजाना
मोटे अनाजों की सबसे बड़ी ताकत इनका पोषण है। ये आयरन, कैल्शियम, फाइबर और प्रोटीन से भरपूर होते हैं, और स्वाभाविक रूप से ग्लूटेन मुक्त भी होते हैं। इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होने के कारण ये रक्त शर्करा को धीरे धीरे बढ़ाते हैं, जिससे ये मधुमेह और सीलिएक रोग से जूझ रहे लोगों के लिए खासतौर पर उपयुक्त माने जाते हैं।
इनका महत्व केवल व्यक्तिगत सेहत तक सीमित नहीं है। आयरन और कैल्शियम की भरपूर मात्रा के कारण मोटे अनाज कुपोषण और खून की कमी से लड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं, खासकर महिलाओं और बच्चों में। यही वजह है कि पोषण विशेषज्ञ इन्हें एक सुलभ और किफायती सुपरफूड के रूप में देखने लगे हैं।
घटती खपत की चुनौती
हालांकि इस वापसी की कहानी में एक चिंताजनक पहलू भी है। आंकड़े बताते हैं कि प्रति व्यक्ति मोटे अनाजों की खपत बीते दशकों में नाटकीय रूप से गिरी है। साठ के दशक में जहां यह सालाना करीब बत्तीस किलोग्राम प्रति व्यक्ति थी, वहीं आज घटकर लगभग चार किलोग्राम रह गई है। यह गिरावट बदलती खानपान की आदतों को दर्शाती है।
इसी गिरावट को पलटने की कोशिश अब जोर पकड़ रही है। शहरी और संपन्न उपभोक्ताओं के बीच सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता एक बड़ी प्रेरक शक्ति बन गई है। बाजार में मोटे अनाजों को अब एक आधुनिक सुपरफूड के रूप में पेश किया जा रहा है, और यही नई सोच इनकी मांग को धीरे धीरे वापस ऊपर की ओर ले जा रही है।
दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक

उत्पादन के मामले में भारत की स्थिति बेहद मजबूत है। देश दुनिया का सबसे बड़ा मोटे अनाज उत्पादक है, और एक अनुमान के अनुसार वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब अड़तीस दशमलव चार प्रतिशत है। वर्ष 2024 से 2025 की अवधि में देश का कुल उत्पादन लगभग एक सौ अस्सी दशमलव एक पांच लाख टन तक पहुंच गया।
यह उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में करीब चार दशमलव चार तीन लाख टन अधिक रहा, जो एक सकारात्मक संकेत है। उत्पादन का बड़ा हिस्सा राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से आता है, जो मिलकर देश के कुल उत्पादन का अस्सी प्रतिशत से अधिक हिस्सा संभालते हैं।
निर्यात के मोर्चे पर भी भारत सक्रिय है। वर्ष 2022 से 2023 के दौरान देश ने लगभग अठारह लाख टन मोटे अनाजों का निर्यात किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल और सऊदी अरब जैसे प्रमुख गंतव्य शामिल रहे। यह दर्शाता है कि इन अनाजों की मांग सीमाओं के पार भी बढ़ रही है।
नीतिगत प्रोत्साहन
इस पूरे बदलाव को संस्थागत समर्थन भी मिल रहा है। वर्ष 2023 में शुरू किया गया श्री अन्न मिशन एक छह वर्षीय पहल है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच को मजबूत करना है। इसके अलावा मोटे अनाजों को मध्याह्न भोजन, समेकित बाल विकास योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं में भी शामिल किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन अनाजों को पहचान मिली है। भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया था। इस कदम ने न केवल श्री अन्न की पोषण संबंधी खूबियों को दुनिया के सामने रखा, बल्कि इन्हें एक वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी मदद की।
पर्यावरण के लिए भी बेहतर
मोटे अनाजों की एक और बड़ी खूबी इनकी पर्यावरणीय अनुकूलता है। ये चावल की तुलना में करीब सत्तर प्रतिशत कम पानी में उग सकते हैं और सूखे की स्थिति को भी सहन कर लेते हैं। यही कारण है कि बदलते मौसम और घटते जल संसाधनों के इस दौर में इन्हें एक टिकाऊ और भरोसेमंद विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
क्यों मायने रखता है
श्री अन्न की यह वापसी केवल एक खानपान का चलन नहीं है, बल्कि सेहत, खेती और पर्यावरण को जोड़ने वाली एक बड़ी कहानी है। एक ओर यह लोगों को बेहतर पोषण का विकल्प देती है, तो दूसरी ओर किसानों को कम संसाधनों में टिकाऊ फसल का रास्ता दिखाती है। यही संतुलन इसे आज के समय में इतना प्रासंगिक बनाता है।
कुल मिलाकर, 2026 में मोटे अनाज एक बार फिर भारतीय थाली के केंद्र में लौटते दिख रहे हैं। बीते वर्षों में खोई जमीन को दोबारा हासिल करने की राह लंबी जरूर है, लेकिन पोषण, नीति और जागरूकता के मेल से बनी यह गति उम्मीद जगाती है कि पुराने अनाज एक नए रूप में लंबे समय तक टिके रहेंगे।
