एक लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग आधे वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय हैं, और 2030 तक यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। जानिए इसके कारण, मन और शरीर पर असर, और समाधान की राह।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हम बहुत व्यस्त और सक्रिय रहते हैं। लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है, क्योंकि व्यस्त होना और शारीरिक रूप से सक्रिय होना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। और हाल के आंकड़े इस मामले में भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी लेकर आए हैं, जिन्हें समझना बेहद ज़रूरी है।
दिनभर कुर्सी पर बैठकर काम करना, गाड़ी से आना-जाना और खाली समय में स्क्रीन के सामने वक्त बिताना, यह हमारी नई सामान्य दिनचर्या बन चुकी है। इस लेख में हम आराम से समझेंगे कि शारीरिक निष्क्रियता आखिर है क्या, भारत में इसकी स्थिति कितनी चिंताजनक है, और सबसे ज़रूरी बात यह कि हम इससे कैसे निपट सकते हैं।
आंकड़े जो चौंका देते हैं
सबसे पहले उन आंकड़ों पर नज़र डालते हैं जो इस समस्या की असली तस्वीर हमारे सामने रखते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक लैंसेट रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में लगभग 49.4 प्रतिशत वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय हैं, यानी वे सेहत के लिए ज़रूरी न्यूनतम शारीरिक गतिविधि भी नहीं कर पाते।
यह आंकड़ा अपने आप में जितना चिंताजनक है, उसका भविष्य उससे भी कहीं अधिक डराने वाला है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यदि मौजूदा रुझान इसी तरह जारी रहा, तो साल 2030 तक भारत में शारीरिक रूप से निष्क्रिय वयस्कों का यह अनुपात बढ़कर करीब 59.9 प्रतिशत तक पहुँच सकता है, जो वाकई एक बहुत बड़ी छलांग होगी।
पुरुषों और महिलाओं में अंतर
यह समस्या सभी को एक समान रूप से प्रभावित नहीं करती, बल्कि इसमें एक दिलचस्प अंतर भी देखने को मिलता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2022 के दिशानिर्देशों के आधार पर, भारत में करीब 38.4 प्रतिशत वयस्क पुरुष शारीरिक रूप से निष्क्रिय पाए गए हैं।
वहीं दूसरी ओर, महिलाओं से जुड़े आंकड़े इस मामले में और भी अधिक ध्यान खींचते हैं और सोचने पर मजबूर करते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत में लगभग 52.6 प्रतिशत वयस्क महिलाएं शारीरिक रूप से निष्क्रिय पाई गई हैं, जो दर्शाता है कि यह समस्या महिलाओं में पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर रूप ले रही है।
सिर्फ शरीर नहीं, मन भी
अक्सर हम शारीरिक निष्क्रियता को सिर्फ मोटापे या शरीर से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका असर इससे कहीं अधिक गहरा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत में हुए कई अध्ययनों में गतिहीन जीवनशैली और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक मज़बूत संबंध पाया गया है, जिसे यूं ही नज़रअंदाज़ कर देना बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा।
यह संबंध हमारे रोज़मर्रा के जीवन को बहुत सीधे तौर पर प्रभावित करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जो लोग दिनभर बहुत कम शारीरिक गतिविधि करते हैं और अधिकतर समय बैठे ही रहते हैं, उनमें चिंता और अवसाद यानी डिप्रेशन के लक्षण उभरने का जोखिम अपेक्षाकृत काफ़ी अधिक देखा गया है।
सक्रियता के अनगिनत फायदे
अब जब समस्या इतनी बड़ी है, तो अच्छी खबर यह है कि इसका समाधान भी काफ़ी हद तक हमारे अपने हाथ में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नियमित शारीरिक गतिविधि बढ़ाने के फायदे बहुत अच्छी तरह से प्रमाणित हैं, और ये फायदे हमारे पूरे शरीर और मन, दोनों पर एक साथ सकारात्मक असर डालते हैं।
इन फायदों की पूरी सूची वाकई बहुत प्रभावशाली है और हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नियमित सक्रियता से हृदय रोग, मधुमेह, मोटापे और कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम कम होता है, साथ ही मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी और मज़बूत बनती है।
आखिर क्यों बढ़ रही है निष्क्रियता
यह सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है कि जब फायदे इतने स्पष्ट हैं, तो फिर हम लगातार कम सक्रिय क्यों होते जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विशेषज्ञ इस बढ़ती हुई निष्क्रियता के पीछे कई कारण बताते हैं, जो हमारी आधुनिक जीवनशैली और तेज़ी से बदलते माहौल से गहराई से जुड़े हुए हैं।
इन कारणों को ठीक से समझना ही समाधान की दिशा में पहला ज़रूरी कदम है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिनभर बैठकर किए जाने वाले काम, ऐसे शहरी माहौल जहाँ पैदल चलना या साइकिल चलाना कठिन हो गया है, और खाली समय में स्क्रीन आधारित मनोरंजन का बढ़ता चलन, ये सब मिलकर इस समस्या को और अधिक बढ़ा रहे हैं।
छोटे कदम, बड़ा बदलाव

इन तमाम आंकड़ों और चिंताओं के बीच यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि किसी भी बदलाव की शुरुआत बड़े नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, थोड़ी सी भी नियमित शारीरिक गतिविधि, जैसे रोज़ थोड़ी देर टहलना, हमारी सेहत पर एक बड़ा और सकारात्मक फर्क डाल सकती है।
अंततः, शारीरिक निष्क्रियता एक ऐसी चुनौती है जिसका सामना हम सब मिलकर और व्यक्तिगत स्तर पर भी बखूबी कर सकते हैं। यह पूरी तरह हमारे अपने हाथ में है कि हम कुर्सी से उठें, थोड़ा हिलें-डुलें और अपनी दिनचर्या में गति को वापस लाएं। क्योंकि एक स्वस्थ शरीर और खुशहाल मन की असली कुंजी, अक्सर हमारे अगले कदम में ही छिपी होती है।
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