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भारतीय थाली का सच: बहुत ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट, बहुत कम प्रोटीन

Priya Menon Priya Menon priyamenon.avalw.com · 447 reads Respect0 Save Share Read only
READS773live count PUBLISHED1 Sept2026 READING TIME4 min843 words LANGUAGEHindi
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एक बड़े राष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि भारतीय आहार में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुत अधिक और प्रोटीन की मात्रा बहुत कम है, जो मधुमेह और मोटापे का बड़ा कारण बन रहा है। मोटे अनाज इसका एक बेहतरीन समाधान हो सकते हैं।

भारतीय खान-पान अपनी विविधता, रंगत और अनोखे स्वाद के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। लेकिन हाल ही में हुए एक बड़े और व्यापक अध्ययन ने हमारी पारंपरिक थाली को लेकर कुछ ऐसे तथ्य सामने रखे हैं, जो हर किसी को एक बार ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देते हैं। यह अध्ययन साफ़ बताता है कि हमारा रोज़ का भोजन उतना संतुलित नहीं है, जितना हम अक्सर मान बैठते हैं।

दरअसल, बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों के चलते भारत में मधुमेह और मोटापे जैसी बीमारियां तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं। ऐसे समय में यह जानना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हमारी रोज़मर्रा की थाली में आखिर किस चीज़ की कमी है और उसे किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है, ताकि हम आने वाले वर्षों में भी एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकें।

एक बड़ा राष्ट्रीय अध्ययन

इन तमाम सवालों के जवाब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद, जिसे आमतौर पर आईसीएमआर के नाम से जाना जाता है, के एक विस्तृत अध्ययन से मिलते हैं। इस महत्वपूर्ण अध्ययन के अहम नतीजे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं, जिसने भारतीय आहार से जुड़ी कई गहरी और अनदेखी बातों को बड़ी बारीकी से उजागर किया है।

इस अध्ययन का दायरा भी काफ़ी बड़ा था, जो इसके निष्कर्षों को और अधिक विश्वसनीय तथा भरोसेमंद बनाता है। जानकारी के अनुसार, इस सर्वेक्षण में देश के तीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अठारह हज़ार से भी अधिक वयस्कों को शामिल किया गया था, जिसकी बदौलत पूरे भारत की खान-पान की आदतों की एक बेहद स्पष्ट और सटीक तस्वीर सामने आ सकी।

थाली में कार्बोहाइड्रेट का बोलबाला

इस अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष कार्बोहाइड्रेट यानी कार्बोज़ से जुड़ा हुआ है। इसके मुताबिक, एक औसत भारतीय अपनी दैनिक कैलोरी का लगभग बासठ प्रतिशत हिस्सा केवल कार्बोहाइड्रेट से ही प्राप्त कर लेता है। यह मात्रा किसी भी संतुलित और स्वस्थ आहार के लिहाज़ से बेहद अधिक मानी जाती है और यही सबसे बड़ी चिंता का विषय भी है।

यह कार्बोहाइड्रेट मुख्य रूप से सफ़ेद चावल, गेहूं और चीनी जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों से आता है। दिलचस्प बात यह भी है कि यह प्रवृत्ति देश के अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार बदलती रहती है। जहां दक्षिण, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में सफ़ेद चावल की खपत कहीं ज़्यादा है, वहीं उत्तर और मध्य भारत में गेहूं के आटे से बनी चीज़ों का इस्तेमाल कहीं अधिक होता है।

प्रोटीन की भारी कमी

जहां एक ओर हमारी थाली में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है, वहीं दूसरी ओर प्रोटीन की बेहद चिंताजनक कमी देखने को मिलती है। अध्ययन के मुताबिक, एक औसत भारतीय अपनी कुल दैनिक कैलोरी का महज़ बारह प्रतिशत हिस्सा ही प्रोटीन से हासिल कर पाता है, जो कि एक स्वस्थ और मज़बूत शरीर की ज़रूरतों के हिसाब से बिल्कुल पर्याप्त नहीं है।

इसके अलावा, प्रोटीन का जो थोड़ा-बहुत हिस्सा हमें मिल भी पाता है, वह अधिकतर पौधों पर आधारित स्रोतों से ही आता है। अध्ययन साफ़ बताता है कि दूध, दही और पशु-आधारित प्रोटीन का योगदान भारतीय आहार में बहुत ही कम रह जाता है, जिसके चलते हमारे शरीर को उच्च गुणवत्ता वाला संपूर्ण प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है।

बीमारियों से जुड़ा सीधा खतरा

बहुत अधिक कार्बोहाइड्रेट और बहुत कम प्रोटीन वाले इस असंतुलित आहार का सीधा और गहरा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। अध्ययन बिल्कुल स्पष्ट रूप से बताता है कि यही खान-पान की शैली देश में मधुमेह, मधुमेह-पूर्व की स्थिति और मोटापे के लगातार बढ़ते मामलों के पीछे एक बड़ा और अहम कारण बनकर उभर रही है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

एक छोटा बदलाव, बड़ा असर

अच्छी बात यह है कि इस बड़ी समस्या का समाधान भी अध्ययन में सुझाया गया है, और वह सुनने में जितना आसान है उतना ही असरदार भी। विश्लेषण के अनुसार, यदि हम अपनी कार्बोहाइड्रेट से मिलने वाली कैलोरी का महज़ पांच प्रतिशत हिस्सा भी पौधों या दूध से बने प्रोटीन से बदल दें, तो मधुमेह और मोटापे का खतरा काफ़ी हद तक कम हो सकता है।

मोटे अनाज का कमाल

बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज भारतीय थाली को अधिक संतुलित और पौष्टिक बनाने में मदद कर सकते हैं।
बाजरा और ज्वार जैसे मोटे अनाज भारतीय थाली को अधिक संतुलित और पौष्टिक बनाने में मदद कर सकते हैं।

इसी दिशा में एक और बेहद बेहतरीन विकल्प के रूप में मोटे अनाज, यानी बाजरा और ज्वार जैसी पारंपरिक चीज़ों का नाम बड़ी मज़बूती से सामने आता है। कई अध्ययनों से यह पता चला है कि इन्हें अपने रोज़ के भोजन में शामिल करने से शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल यानी एचडीएल की मात्रा में करीब छह प्रतिशत तक की सकारात्मक वृद्धि देखी गई है।

इतना ही नहीं, मोटे अनाज पर आधारित भोजन के कई अन्य ज़बरदस्त फ़ायदे भी सामने आए हैं। शोध बताते हैं कि इनके नियमित सेवन से रक्तचाप में लगभग चार से पांच प्रतिशत तक की कमी आई, जबकि शरीर के वज़न यानी बीएमआई में भी करीब सात प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई, जो कि सेहत के लिहाज़ से एक बहुत ही सकारात्मक और उत्साहजनक संकेत है।

संतुलन ही असली समाधान

कुल मिलाकर, यह पूरा अध्ययन हमें एक बेहद ज़रूरी और समय पर मिलने वाला संदेश देता है। हमारी थाली का असली स्वास्थ्य केवल उसके स्वाद में नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे संतुलन में बसता है। थोड़ी सी जागरूकता और समझदारी के साथ, कार्बोहाइड्रेट को थोड़ा कम करके और प्रोटीन तथा मोटे अनाज को अपनाकर, हम न सिर्फ़ अपनी मौजूदा सेहत सुधार सकते हैं, बल्कि आने वाली कई बीमारियों से भी खुद को बचा सकते हैं।

2 responses

आहार के बारे में बहुत उपयोगी लेख.

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सच.

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Priya Menon 2026-09-01 · 4 min read · 773 reads
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