भारत में काम की थकान और मानसिक तनाव अब चुपचाप एक बड़ी सेहत चुनौती बनते जा रहे हैं। हम विभिन्न सर्वेक्षणों के आंकड़ों के आधार पर शांति से समझते हैं कि बर्नआउट कितना फैल चुका है, किन पर सबसे ज़्यादा असर है और इसके पीछे क्या कारण बताए जा रहे हैं।
सेहत की बात होती है तो अक्सर हमारा ध्यान खान-पान और शरीर की तरफ जाता है, लेकिन एक अनदेखी चुनौती चुपचाप बढ़ती जा रही है। यह है काम की जगह पर होने वाली थकान और मानसिक तनाव, जिसे आमतौर पर बर्नआउट कहा जाता है। ताज़ा सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में यह समस्या अब चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है।
इस लेख में हम केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सर्वेक्षणों के आंकड़ों पर बात करेंगे, अपनी ओर से कोई अनुमान जोड़े बिना। मकसद यह शांति से समझना है कि यह थकान कितने लोगों तक पहुंच चुकी है, किन क्षेत्रों और किन लोगों पर इसका असर सबसे गहरा है, और विशेषज्ञ इसके पीछे किन कारणों की ओर इशारा कर रहे हैं।
बर्नआउट की बढ़ती लहर
सबसे पहले आंकड़ों की गंभीरता को समझते हैं। इनडीड इंडिया के एक सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 72 प्रतिशत भारतीय कर्मचारियों ने माना कि उन्होंने अपनी मौजूदा भूमिका में कभी न कभी बर्नआउट महसूस किया है। यह 2022 के 58 प्रतिशत से बढ़कर आया है, यानी तीन साल में करीब 14 प्रतिशत अंक की वृद्धि।
बताया गया है कि यह उछाल किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था में दर्ज की गई सबसे तेज़ वृद्धि है, जो अपने आप में एक गंभीर संकेत है। इसके अलावा एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार करीब 57 प्रतिशत भारतीय कर्मचारी इस समय बर्नआउट महसूस कर रहे हैं, और शोध यह भी बताते हैं कि लगभग 40 प्रतिशत लोग अक्सर इस थकान से जूझते हैं।
सिर्फ थकान नहीं, तनाव भी

बर्नआउट अकेले नहीं आता, बल्कि उसके साथ मानसिक तनाव का बोझ भी चलता है। सिग्ना के एक वेल-बीइंग सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में करीब 89 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खुद को तनावग्रस्त महसूस करने की बात कही। यह आंकड़ा वैश्विक औसत से ऊंचा है, जो लगभग 84 प्रतिशत के आसपास बताया गया है।
इसका मतलब यह है कि भारतीय कर्मचारी दुनिया के औसत की तुलना में अधिक तनाव में जी रहे हैं। जब लगभग हर दस में से नौ लोग किसी न किसी रूप में तनाव महसूस करें, तो यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे कार्य वातावरण से जुड़ी एक व्यापक समस्या बन जाती है, जिस पर ध्यान देना ज़रूरी है।
महिलाओं पर अलग असर
आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि इस दबाव का असर सब पर एक जैसा नहीं है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 37 प्रतिशत महिला कर्मचारियों ने खराब कार्य जीवन संतुलन को नौकरी छोड़ने की इच्छा का सबसे बड़ा कारण बताया। पुरुष सहकर्मियों में यही आंकड़ा तुलनात्मक रूप से कम, यानी करीब 28 प्रतिशत रहा।
यह अंतर बताता है कि घर और दफ़्तर के बीच संतुलन बनाने की चुनौती महिलाओं पर अक्सर अधिक भारी पड़ती है। कई बार जिम्मेदारियों का दोहरा बोझ उन्हें ऐसे मोड़ पर ले आता है जहां नौकरी छोड़ना ही एकमात्र राहत का रास्ता लगने लगता है, जो कार्यस्थलों के लिए एक अहम चेतावनी है।
नौकरी छोड़ने तक की नौबत
यह दबाव सिर्फ मन की स्थिति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों के करियर के फैसलों को भी प्रभावित करता है। डेलॉइट के एक सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अपनी मानसिक सेहत को संभालने के लिए पहले ही नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था। यह दिखाता है कि समस्या किस हद तक गंभीर हो चुकी है।
जब लोग अपनी सेहत बचाने के लिए आमदनी का ज़रिया तक छोड़ने को तैयार हो जाएं, तो यह किसी भी संगठन के लिए एक बड़ा संकेत है। इससे न केवल कर्मचारियों का नुकसान होता है, बल्कि कंपनियों को भी अनुभवी लोगों को खोने और बार-बार नई भर्ती करने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है।
आईटी और बीपीओ सबसे आगे
कुछ क्षेत्रों में यह थकान बाकियों से कहीं अधिक गहरी है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत में आईटी और बीपीओ क्षेत्र में बर्नआउट का स्तर करीब 75 प्रतिशत तक बताया गया है। इसके पीछे बहुत लंबे काम के घंटे, अक्सर 60 से 70 घंटे के सप्ताह, और पश्चिमी समय के हिसाब से रात की पालियां प्रमुख कारण मानी जाती हैं।
इसके साथ ही तेज़ी से बढ़ते काम के मुकाबले पर्याप्त कर्मचारियों की भर्ती न होना भी दबाव बढ़ाता है। जब गिने-चुने लोगों पर लगातार बढ़ता बोझ डाला जाता है, तो थकान का जमा होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि ये क्षेत्र इस समस्या के केंद्र में नज़र आते हैं और इन्हें विशेष ध्यान की ज़रूरत है।
यह क्यों मायने रखता है
इन सभी आंकड़ों को एक साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। बर्नआउट अब किसी की निजी कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक व्यापक सेहत और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। यह न केवल व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक सेहत को प्रभावित करता है, बल्कि उसकी कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर डालता है।
इसका समाधान भी सिर्फ एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है, बल्कि इसमें कार्यस्थलों की भूमिका उतनी ही अहम है। संतुलित काम के घंटे, वास्तविक आराम का समय और खुलकर बात करने का माहौल, ये सब मिलकर ही इस थकान को कम कर सकते हैं। इसे नज़रअंदाज़ करना लंबे समय में सबके लिए महंगा साबित हो सकता है।
आगे का रास्ता
कुल मिलाकर, ये आंकड़े हमें रुककर सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम काम और जीवन के बीच संतुलन को कितनी गंभीरता से लेते हैं। बर्नआउट को समय रहते पहचानना और उस पर बात करना ही इसका पहला इलाज है, क्योंकि जिस समस्या को स्वीकार ही न किया जाए, उसका हल निकालना कठिन हो जाता है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कंपनियां और कर्मचारी मिलकर इस चुनौती से कैसे निपटते हैं। हम इन आंकड़ों और रुझानों पर आगे भी शांत और तथ्यपरक नज़र बनाए रखेंगे, ताकि सेहत के इस अक्सर अनदेखे पहलू को उतनी ही गंभीरता से देखा जाए, जितनी गंभीरता से हम शरीर की सेहत को देखते हैं।
यहाँ तनाव के बारे में काफी कुछ सीखा.
तनाव का अच्छा विश्लेषण.
तनाव के बारे में अच्छा संदर्भ.
बहुत सही.