एनपीसीआई के आंकड़ों के अनुसार, यूपीआई ने साल 2025 में 228 अरब से अधिक लेनदेन संभाले, जिनका कुल मूल्य लगभग 300 लाख करोड़ रुपये रहा। अकेले दिसंबर में 21.63 अरब लेनदेन के साथ हर महीने का रिकॉर्ड टूटता गया।
सब्जी वाले के ठेले से लेकर बड़े शोरूम तक, आज भारत में भुगतान का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। नकदी की जगह अब एक छोटे से क्यूआर कोड और मोबाइल फोन ने ले ली है, और इसी बदलाव की सबसे बड़ी वाहक बनी है यूपीआई नाम की भुगतान प्रणाली, जिसने बीते साल कामयाबी के तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।
दिसंबर में बना नया रिकॉर्ड
साल का अंत यूपीआई के लिए किसी जश्न से कम नहीं रहा। एनपीसीआई के आंकड़ों के अनुसार, अकेले दिसंबर महीने में इस प्रणाली के जरिए तकरीबन 21.63 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य करीब 27.97 लाख करोड़ रुपये रहा, और यह इसकी शुरुआत से अब तक का सबसे मजबूत मासिक प्रदर्शन साबित हुआ।
यह बढ़त सालाना आधार पर भी बेहद प्रभावशाली रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिसंबर में लेनदेन की संख्या पिछले साल के मुकाबले करीब 29 प्रतिशत बढ़ी, जबकि उनके कुल मूल्य में भी लगभग 20 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया, जो इस प्रणाली की लगातार बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।
पूरे साल का रिकॉर्ड

अगर पूरे साल को एक साथ देखें, तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले नजर आते हैं। एनपीसीआई के अनुसार, यूपीआई ने साल 2025 के दौरान कुल मिलाकर 228 अरब से भी अधिक लेनदेन संभाले, जिनका सम्मिलित मूल्य लगभग 300 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया, जो अपने आप में एक अभूतपूर्व उपलब्धि है।
इस विशाल आंकड़े को बीते वर्षों से तुलना करने पर तस्वीर और साफ हो जाती है। जानकारी के अनुसार, साल 2024 में यह संख्या करीब 172.2 अरब लेनदेन थी, जबकि 2023 में यह लगभग 117.6 अरब रही थी; यानी महज दो वर्षों में इस प्रणाली का इस्तेमाल लगभग दोगुना हो गया है।
महीने दर महीने बढ़ती रफ्तार
यह वृद्धि अचानक नहीं आई, बल्कि पूरे साल लगातार बनी रही। आंकड़ों के अनुसार, साल की पहली छमाही यानी जनवरी से जून के बीच ही यूपीआई पर करीब 106.36 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य लगभग 143.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, और यह रफ्तार आगे भी थमी नहीं।
बीच के महीनों में भी नए कीर्तिमान बनते रहे। जानकारी के अनुसार, जुलाई महीने में यूपीआई ने करीब 19.47 अरब लेनदेन के साथ उस समय का सर्वकालिक रिकॉर्ड बनाया, जो जून के लगभग 18.40 अरब लेनदेन की तुलना में करीब 5.8 प्रतिशत अधिक था, और यह सिलसिला यहीं नहीं रुका।
दुनिया का सबसे बड़ा मंच
यूपीआई की यह कामयाबी अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रह गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह प्रणाली आज दुनिया का सबसे बड़ा रियल टाइम भुगतान मंच बन चुकी है और वैश्विक स्तर पर होने वाले ऐसे तात्कालिक लेनदेन के करीब आधे हिस्से के लिए अकेले जिम्मेदार मानी जाती है।
सफलता के पीछे के कारण
आखिर इस अभूतपूर्व सफलता की वजह क्या है? जानकारों के अनुसार, इसके पीछे सस्ते स्मार्टफोन, बेहद किफायती इंटरनेट डेटा और सबसे बढ़कर इसकी अपनी सहज सरलता है, जिसने बड़े दुकानदारों से लेकर छोटे रेहड़ी वालों तक, हर किसी के लिए डिजिटल भुगतान को आसान और सुलभ बना दिया।
इसका एक बड़ा योगदान वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में भी रहा है। छोटी से छोटी राशि का भुगतान भी चंद सेकंड में संभव हो जाने के कारण, अब वे लोग भी औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन पाए हैं, जो पहले पूरी तरह नकदी पर ही निर्भर रहा करते थे।
आगे की राह
इस मंच की महत्वाकांक्षाएं अब देश की सीमाओं से भी आगे बढ़ रही हैं। जानकारी के अनुसार, कई अन्य देशों में भी इस भारतीय प्रणाली को स्वीकार किए जाने की दिशा में काम चल रहा है, जिससे विदेश यात्रा या सीमा पार भुगतान भी आने वाले समय में और अधिक आसान हो सकते हैं।
हालांकि इस राह में कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। विशेषज्ञ अक्सर याद दिलाते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर लगभग निशुल्क चलने वाली इस प्रणाली को दीर्घकाल में आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखना और इसकी सुरक्षा को लगातार मजबूत करते रहना, दोनों ही बेहद अहम पहलू साबित होंगे।
बहरहाल, कुल मिलाकर तस्वीर बेहद उत्साहजनक है। महज कुछ वर्षों में करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुकी यूपीआई ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक किस तरह किसी देश के भुगतान के तौर तरीकों को पूरी तरह बदल सकती है, और इसकी यह कहानी अभी और आगे बढ़ती दिखाई देती है।

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