इस साल सोने के दामों ने एक के बाद एक नए कीर्तिमान बनाए हैं, जिससे आम खरीदार की पहुंच से यह धातु दूर होती जा रही है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ऊंची कीमतों के बावजूद सोने पर होने वाला कुल खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जो भारतीयों के इस धातु से गहरे लगाव को दर्शाता है।
भारत में सोने और लोगों के बीच का रिश्ता सदियों पुराना और बेहद भावनात्मक है, जो केवल निवेश तक सीमित नहीं है। लेकिन इस साल यह प्यारा रिश्ता एक कड़ी परीक्षा से गुज़र रहा है, क्योंकि सोने की कीमतें आसमान छूती जा रही हैं और एक के बाद एक नए रिकॉर्ड बनाकर आम आदमी की जेब पर भारी दबाव डाल रही हैं।
रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा सोना
इस साल की शुरुआत से ही सोने के दामों में जबरदस्त तेज़ी देखने को मिली है। एक समय तो घरेलू बाज़ार में दस ग्राम सोने की कीमत करीब एक लाख सत्तर हज़ार रुपये के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गई थी, जो कुछ साल पहले तक किसी के लिए भी कल्पना करना बेहद मुश्किल रहा होगा। यह उछाल वाकई असाधारण रहा।
अगर सालाना आधार पर तुलना करें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। एक तिमाही के दौरान घरेलू बाज़ार में सोने की कीमत पिछले साल की तुलना में करीब साठ प्रतिशत तक ऊंची दर्ज की गई। इस भारी बढ़ोतरी ने खरीदारों के उत्साह और उनकी जेब, दोनों पर एक साथ गहरा असर डालने का काम किया है।
खर्च रिकॉर्ड, लेकिन मात्रा कम

इन ऊंची कीमतों का एक बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी असर देखने को मिला है। एक तिमाही में सोने की कुल मांग घटकर लगभग एक सौ इकतीस टन रह गई, यानी लोगों ने मात्रा के हिसाब से कम सोना खरीदा। इसके बावजूद, सोने पर होने वाला कुल खर्च बढ़कर करीब दो लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा।
यह आंकड़ा अपने आप में एक बड़ी कहानी कहता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि भले ही लोग पहले से कम वज़न का सोना खरीद रहे हों, लेकिन आसमान छूती कीमतों के कारण उन्हें उसी थोड़ी सी मात्रा के लिए कहीं ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे कुल खर्च का आंकड़ा नई ऊंचाई पर पहुंच गया है।
गहनों की बदलती पसंद
ऊंची कीमतों ने लोगों के आभूषण खरीदने के तौर तरीकों को भी काफी हद तक बदल दिया है और यह बदलाव साफ नज़र आ रहा है। अब ग्राहक भारी भरकम गहनों के बजाय हल्के वज़न वाले, कम कैरेट वाले और नग जड़े हुए आभूषणों की ओर तेज़ी से रुख कर रहे हैं ताकि उनका बजट किसी भी तरह संतुलित बना रह सके।
एक और चलन जो तेज़ी से बढ़ा है, वह है पुराने सोने को बदलकर नए गहने बनवाना। कुछ दुकानों पर तो कुल बिक्री का सत्तर प्रतिशत तक हिस्सा ऐसी ही अदला-बदली वाली योजनाओं से आ रहा है, जिसमें लोग अपने पुराने आभूषण देकर बदले में नए डिज़ाइन के गहने ले जाते हैं और नकद खर्च से बचते हैं।
निवेश के रूप में सोना
आभूषणों से हटकर अगर निवेश की बात करें, तो वहां भी सोने का आकर्षण बरकरार है। सिक्कों, बिस्कुट और सोने में निवेश करने वाले विशेष फंडों के ज़रिए होने वाली खरीदारी थोड़ी कम ज़रूर हुई है, लेकिन यह अब भी अपने कई वर्षों के औसत स्तर से ऊपर बनी हुई है, जो निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।
जानकार मानते हैं कि अनिश्चितता के दौर में सोना हमेशा से एक सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। जब दुनिया भर के बाज़ारों में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, तो निवेशक अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए सोने का रुख करते हैं, और यही प्रवृत्ति इसकी कीमतों को लगातार सहारा देने का काम करती है।
क्यों चढ़ रहे हैं दाम
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर सोने के दाम इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रहे हैं। इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं, जिनमें वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितता के चलते सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ता रुझान और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की ऊंची कीमतें सबसे प्रमुख मानी जा रही हैं।
इसके अलावा, भारतीय खरीदारों के लिए एक और बड़ा कारण रुपये की कमज़ोरी है। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की कीमत बढ़ने का असर घरेलू दामों पर और भी ज़्यादा तीव्र हो जाता है, जिससे देश में सोना खरीदना पहले से कहीं अधिक महंगा हो जाता है।
त्योहारों का मौसम और आगे की राह
अब सबकी निगाहें आने वाले त्योहारी मौसम पर टिकी हुई हैं, जो परंपरागत रूप से सोने की खरीदारी के लिहाज़ से साल का सबसे अहम समय होता है। धनतेरस और दिवाली जैसे मौकों पर सोना खरीदना बेहद शुभ माना जाता है, और इसी दौरान देश में सबसे ज़्यादा सोने की बिक्री होती है।
कुछ विशेषज्ञों का तो यहां तक अनुमान है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो साल के अंत तक दस ग्राम सोने की कीमत दो लाख रुपये के स्तर को भी छू सकती है। हालांकि कमज़ोर मानसून जैसे कारण ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकते हैं, फिर भी सोने के प्रति भारतीयों का लगाव इसे लगातार सहारा देता रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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