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चिप की ओर भारत की बड़ी छलांग सेमीकंडक्टर मिशन और आत्मनिर्भरता का सपना

सान्या सिंह सान्या सिंह sanyasingh.avalw.com · 103 reads Respect0 Save Share Read only
READS0live count PUBLISHED15 Sept2026 READING TIME5 min1,057 words LANGUAGEHindi
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भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दिसंबर 2025 तक दस परियोजनाओं को करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ मंजूरी मिली। तीन संयंत्र उत्पादन में हैं और धोलेरा में देश का पहला फैब आकार ले रहा है।

हमारे हाथ में मौजूद फोन से लेकर रसोई के उपकरण, कार, एटीएम और अंतरिक्ष में घूमते उपग्रह तक, हर आधुनिक चीज़ के भीतर एक नन्ही सी चीज़ धड़कती है, जिसे हम सेमीकंडक्टर चिप कहते हैं। यह दिखती नहीं, पर इसके बिना आज की दुनिया एक पल भी नहीं चल सकती। लंबे समय तक भारत इन चिपों के लिए पूरी तरह दूसरे देशों पर निर्भर रहा है। लेकिन अब तस्वीर तेज़ी से बदल रही है, और यही बदलाव आज की कहानी है।

हर उपकरण का दिल

सेमीकंडक्टर दरअसल सिलिकॉन से बनी वे नन्ही चिप हैं, जो किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का दिमाग होती हैं। ये गणना करती हैं, याददाश्त संभालती हैं और संकेतों को नियंत्रित करती हैं। मोबाइल हो या लैपटॉप, बिजली की कार हो या मिसाइल, आधुनिक चिकित्सा उपकरण हों या कृत्रिम बुद्धि के विशाल सर्वर, हर जगह इन्हीं चिपों की ज़रूरत पड़ती है। यही वजह है कि आज इन्हें इक्कीसवीं सदी का नया तेल कहा जाने लगा है, जिस पर पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है।

पिचानबे फीसदी आयात की मजबूरी

भारत के लिए यह निर्भरता एक बड़ी चिंता रही है। रिपोर्टों के अनुसार, देश अपनी सेमीकंडक्टर ज़रूरत का करीब पिचानबे प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है। एक अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 के बाद से इस आयात पर करीब 150 अरब डॉलर बाहर जा चुके हैं, और अगर हालात न बदले तो साल 2035 तक यह नुकसान 240 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इतनी बड़ी रकम और रणनीतिक निर्भरता किसी भी देश के लिए कमज़ोरी बन जाती है।

भारत का सेमीकंडक्टर मिशन

इसी चुनौती से निपटने के लिए साल 2021 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन यानी आईएसएम की शुरुआत हुई। इसके तहत निर्माताओं के लिए कई योजनाएं लाई गईं, जिनमें चिप बनाने वाली फैब्रिकेशन इकाइयों को कुल लागत का पचास प्रतिशत तक की आर्थिक मदद देने का प्रावधान है। मकसद साफ है, विदेशी कंपनियों और भारतीय समूहों को यहां संयंत्र लगाने के लिए आकर्षित करना, ताकि चिप निर्माण की पूरी श्रृंखला धीरे-धीरे भारतीय ज़मीन पर खड़ी हो सके।

दस परियोजनाएं और डेढ़ लाख करोड़

एक सर्किट बोर्ड की बारीक बुनावट। ऐसी ही छोटी सी चिप और बोर्ड आज हर फोन, कार और उपकरण के भीतर धड़कते हैं, और भारत अब इन्हें अपनी धरती पर बनाने की राह पर है।
एक सर्किट बोर्ड की बारीक बुनावट। ऐसी ही छोटी सी चिप और बोर्ड आज हर फोन, कार और उपकरण के भीतर धड़कते हैं, और भारत अब इन्हें अपनी धरती पर बनाने की राह पर है।

इस मिशन ने बीते कुछ वर्षों में ठोस रफ्तार पकड़ी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दिसंबर 2025 तक आईएसएम के तहत दस परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी थी, जिनमें कुल मिलाकर करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये के निवेश का खाका है। बताया जाता है कि इन परियोजनाओं में इक्कीस अरब डॉलर से अधिक का स्वीकृत निवेश आ चुका है। यह आंकड़ा दिखाता है कि चिप निर्माण अब सिर्फ कागज़ी सपना नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरती एक बड़ी हकीकत बनता जा रहा है।

उत्पादन शुरू करने वाले संयंत्र

सबसे उत्साहजनक बात यह है कि कुछ संयंत्रों ने व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू कर दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक तीन इकाइयां अब चालू हैं, जिनमें गुजरात के साणंद में माइक्रोन की असेंबली और पैकेजिंग इकाई शामिल है, जिसमें करीब तेरह हज़ार करोड़ रुपये का निवेश हुआ और जिसका औपचारिक उद्घाटन फरवरी 2026 में हुआ। इसके साथ सीजी सेमी और केनेस की इकाइयां भी उत्पादन की कतार में जुड़ चुकी हैं। यह भारत के लिए एक शुरुआती पर अहम पड़ाव है।

फैब और पैकेजिंग का फर्क

यहां एक ज़रूरी अंतर समझना चाहिए। चिप निर्माण की दुनिया में फैब यानी फैब्रिकेशन संयंत्र वह होता है जहां सिलिकॉन की गोल प्लेट यानी वेफर पर असली चिप गढ़ी जाती है। वहीं असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग वाली इकाइयां बनी हुई चिपों को जांचने, जोड़ने और उपयोग लायक रूप देने का काम करती हैं। अब तक भारत में जो इकाइयां चालू हुई हैं, उनमें से ज़्यादातर पैकेजिंग से जुड़ी हैं, जबकि असली चुनौती और गौरव पूर्ण फैब लगाने में है।

धोलेरा में देश का पहला फैब

इसी दिशा में सबसे बड़ी परियोजना गुजरात के धोलेरा में आकार ले रही है, जहां टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ताइवान की पावरचिप के साथ मिलकर देश का पहला व्यावसायिक फैब बना रही है। रिपोर्टों के अनुसार इसमें करीब 91,526 करोड़ रुपये का निवेश है, जो गुजरात के इतिहास में निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा औद्योगिक निवेश बताया जाता है। यहां तीन सौ मिलीमीटर के वेफर बनेंगे और हर महीने पचास हज़ार वेफर तैयार करने की क्षमता की योजना है, जिससे पहली भारतीय चिप की उम्मीद जगी है।

पानी और बिजली की चुनौती

चिप का फैब लगाना सिर्फ मशीनें बिठाने जितना आसान नहीं होता। इन संयंत्रों को बेहद शुद्ध पानी और भरोसेमंद बिजली की भारी मात्रा में ज़रूरत पड़ती है, और ज़रा सी धूल भी उत्पादन बिगाड़ सकती है। यही वजह है कि धोलेरा की योजना में पांच गीगावॉट का सौर पार्क और रोज़ाना पचास लाख लीटर पानी साफ करने वाला संयंत्र तक शामिल बताया गया है। इस तरह का ढांचा खड़ा करना अपने आप में एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है, जिसे पार करना ज़रूरी है।

असम से गुजरात तक

यह मिशन किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। गुजरात के साणंद और धोलेरा के साथ-साथ असम में भी टाटा की एक इकाई सेमीकंडक्टर पैकेजिंग का काम करने जा रही है। इस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में चिप से जुड़ा एक पूरा तंत्र धीरे-धीरे खड़ा हो रहा है। इससे न केवल हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलने की उम्मीद है, बल्कि आपूर्तिकर्ताओं, शोध संस्थानों और कुशल कारीगरों का एक ऐसा ताना-बाना भी बुनता जाएगा, जो लंबे समय तक देश को फायदा पहुंचाएगा।

मिशन 2.0 और आगे की राह

सरकार अब इस मुहिम को अगले चरण में ले जाने की तैयारी में है। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2026-27 के बजट में सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 को मंजूरी दी गई, जिसमें करीब एक हज़ार करोड़ रुपये का शुरुआती प्रावधान रखा गया है। इस बार ज़ोर सिर्फ कारखाने लगाने पर नहीं, बल्कि अनुसंधान और प्रशिक्षण पर भी है। यानी भारत अब केवल चिप जोड़ने या बनाने ही नहीं, बल्कि उन्हें डिज़ाइन करने और नई तकनीक गढ़ने की गहरी क्षमता भी विकसित करना चाहता है।

चुनौतियां भी कम नहीं

उत्साह के इस माहौल में चुनौतियों को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं होगा। सेमीकंडक्टर उद्योग बेहद जटिल, महंगा और सब्र मांगने वाला है। ताइवान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका जैसे देश दशकों की मेहनत के बाद इस मुकाम पर पहुंचे हैं। भारत को कुशल इंजीनियरों की बड़ी फौज तैयार करनी होगी, पानी और ऊर्जा का इंतज़ाम पक्का करना होगा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहना होगा। पहली चिप बनने से लेकर पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने तक का सफर अभी लंबा है।

आत्मनिर्भरता की ओर

फिर भी, जो नींव पड़ चुकी है, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। कुछ ही साल पहले तक भारत में चिप बनाना एक दूर का सपना लगता था, और आज संयंत्र उत्पादन शुरू कर चुके हैं तथा पहला फैब आकार ले रहा है। यह सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और रणनीतिक सुरक्षा की भी कहानी है। अगर यह रफ्तार बनी रही, तो आने वाले वर्षों में मेड इन इंडिया लिखी चिप दुनिया भर के उपकरणों में धड़केगी, और यह हर भारतीय के लिए गर्व की बात होगी।

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सान्या सिंह 2026-09-15 · 5 min read · 0 reads
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