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कीट-जगत के महाशिकारी: व्याध पतंग और मैंटिस की अद्भुत आँखें और शिकार-कला SCIENCE · IN

कीट-जगत के महाशिकारी: व्याध पतंग और मैंटिस की अद्भुत आँखें और शिकार-कला

सान्या सिंह सान्या सिंह sanyasingh.avalw.com · 898 reads Respect0 Save Share Read only
READS31live count PUBLISHED17 Sept2026 READING TIME4 min731 words LANGUAGEHindi
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व्याध पतंग की आँखों में तीस हज़ार खाने और लगभग तीन सौ साठ डिग्री दृष्टि, पंचानबे प्रतिशत सफल शिकार, और भारत से अफ्रीका तक महासागर पार करती एक नन्ही प्रजाति। साथ में मैंटिस, इकलौता कीट जिसके पास त्रिआयामी दृष्टि है। कीट-जगत के महाशिकारियों की अनोखी दुनिया।

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किसी तालाब के किनारे बैठिए और थोड़ा धैर्य रखिए। अचानक हवा में एक नीली चमक कौंधती है, तेज़ी से मुड़ती है और पलक झपकते ही एक मच्छर को हवा में ही पकड़ लेती है। यह है व्याध पतंग, यानी ड्रैगनफ्लाई, कीट-जगत का एक ऐसा नन्हा शिकारी जिसकी क्षमताएँ किसी अजूबे से कम नहीं।

आँखें जो लगभग सब कुछ देखती हैं

व्याध पतंग और उसके नाज़ुक चचेरे भाई सुई कीट, दोनों की सबसे बड़ी ताकत उनकी आँखों में छिपी है। इनका सिर लगभग पूरी तरह दो विशाल संयुक्त आँखों से बना होता है, जिनमें मिलाकर करीब तीस हज़ार छोटे-छोटे षट्कोणीय खाने होते हैं। ये आँखें सिर के पीछे तक फैली रहती हैं, जिससे कीट को अपने चारों ओर लगभग तीन सौ साठ डिग्री का नज़ारा मिलता है।

इसका मतलब है कि व्याध पतंग को अपना सिर घुमाए बिना ही ऊपर, नीचे, आगे और पीछे सब कुछ दिखाई देता है। शिकार हो या ख़तरा, कोई भी उसकी नज़र से बचकर उस तक चुपके से नहीं पहुँच सकता। यही तीक्ष्ण दृष्टि उसे हवा का बेजोड़ शिकारी बनाती है।

आसमान का सबसे सफल शिकारी

आँकड़े हैरान करने वाले हैं। शिकार पर निकली व्याध पतंग लगभग पंचानबे प्रतिशत बार सफल होती है, जो उसे धरती के सबसे कुशल शिकारियों में से एक बनाता है। इसके चारों पंख अलग-अलग चलते हैं, जिससे वह हवा में स्थिर रुक सकती है, पीछे की ओर उड़ सकती है और बिजली सी तेज़ी से दिशा बदल सकती है।

और भी कमाल की बात यह है कि वह शिकार का बस पीछा नहीं करती। उसका मस्तिष्क शिकार की अगली चाल का अंदाज़ा लगाकर ठीक उसी जगह पहुँच जाता है, जहाँ वह अगले पल होगा। जीवन की शुरुआत में तो यही कीट पानी के भीतर रहता है, जहाँ एक भूखा शिकारी बनकर महीनों बिताता है।

प्राचीन वंश, डायनासोर से भी पुराना

इन कीटों की कहानी बेहद पुरानी है। व्याध पतंग के पूर्वज करीब तीस करोड़ साल पहले, यानी डायनासोर के भी बहुत पहले, आसमान में उड़ रहे थे। उस दौर में हवा में ऑक्सीजन अधिक थी और कुछ प्रजातियों के पंखों का फैलाव लगभग सत्तर सेंटीमीटर तक पहुँच जाता था, जो आज की तुलना में विशालकाय था।

समुद्र पार करने वाला नन्हा यात्री

भारत के लिए इसमें एक ख़ास कहानी छिपी है। यहाँ पाई जाने वाली पैंटाला फ्लेवेसेंस नाम की व्याध पतंग शायद किसी भी कीट की सबसे लंबी लगातार यात्रा करती है। माना जाता है कि यह शरद ऋतु में भारत से उड़कर, हिंद महासागर पार करके, सुदूर पूर्वी अफ्रीका तक पहुँच जाती है।

सोचिए, महज कुछ सेंटीमीटर की यह नन्ही जान एक पूरा महासागर लाँघ जाती है। इसके लिए वह ऊँचाई पर बहने वाली तेज़ हवाओं और मानसून का सहारा लेती है, और अगली पीढ़ी अगले बसंत में वापस भारत की ओर लौट आती है। यह प्रकृति की सबसे अविश्वसनीय यात्राओं में से एक है।

घात लगाने का उस्ताद: मैंटिस

घात लगाकर बैठा एक मैंटिस। अपनी अनोखी त्रिआयामी दृष्टि और काँटेदार टाँगों से यह कीट शिकार को पलभर में दबोच लेता है।
घात लगाकर बैठा एक मैंटिस। अपनी अनोखी त्रिआयामी दृष्टि और काँटेदार टाँगों से यह कीट शिकार को पलभर में दबोच लेता है।

आसमान के इस शिकारी के मुक़ाबले, ज़मीन और पत्तियों पर एक और उस्ताद घात लगाकर बैठा रहता है, मैंटिस या प्रार्थना कीट। यह अब तक ज्ञात इकलौता ऐसा कीट है, जिसके पास इंसानों जैसी त्रिआयामी दृष्टि साबित हुई है, यानी वह दोनों आँखों से गहराई को ठीक-ठीक भाँप सकता है।

अपनी काँटेदार अगली टाँगों को प्रार्थना की मुद्रा में मोड़े यह कीट बिल्कुल शांत बैठा रहता है, फिर पलभर में बिजली की गति से झपटकर शिकार दबोच लेता है। यह अपना सिर लगभग एक सौ अस्सी डिग्री तक घुमा सकता है, और इसकी अनोखी दृष्टि पर तो अब रोबोट बनाने वाले वैज्ञानिक भी शोध कर रहे हैं।

छोटे शिकारी, बड़ा फायदा

ये नन्हे शिकारी हमारे लिए बेहद उपयोगी हैं। व्याध पतंग और मैंटिस दोनों बड़ी संख्या में मच्छर और खेतों के हानिकारक कीड़े खा जाते हैं, और इस तरह बिना किसी दवा के प्राकृतिक कीटनाशक की भूमिका निभाते हैं। किसान और बग़ीचे इनकी मौजूदगी से चुपचाप लाभ उठाते हैं।

इसके अलावा व्याध पतंग साफ़ पानी और स्वस्थ आर्द्रभूमि की निशानी भी है, क्योंकि इसके बच्चे साफ़ जलाशयों में ही पलते हैं। जहाँ इनकी भरमार हो, वहाँ समझ लीजिए कि वहाँ का पानी और पर्यावरण अभी भी जीवन से भरपूर है।

जब हम रुककर देखते हैं

अफ़सोस की बात यह है कि आर्द्रभूमियों का सूखना, प्रदूषण और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल इन अद्भुत जीवों के लिए ख़तरा बनता जा रहा है। जिन तालाबों और खेतों में कभी ये हवा में नाचते थे, वहाँ अब इनकी संख्या धीरे-धीरे घटती जा रही है।

मुझे विज्ञान की हर नई खोज बच्चों जैसी उत्सुकता से भर देती है, और ये नन्हे शिकारी उसी उत्सुकता को हवा देते हैं। अगली बार किसी तालाब के किनारे रुककर देखिए, क्योंकि उस छोटी सी नीली चमक में प्रकृति की करोड़ों साल पुरानी इंजीनियरिंग का पूरा चमत्कार छिपा है।

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सान्या सिंह 2026-09-17 · 4 min read · 31 reads
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