अल नीनो के प्रभाव और जलवायु परिवर्तन के चलते कश्मीर में अक्टूबर में असामान्य गर्मी दर्ज की गई है, जिससे स्थानीय समुदायों में कम बर्फबारी और आर्थिक नुकसान के खतरे की चिंता बढ़ गई है।
श्रीनगर के तापमापी ने 4 अक्टूबर को 31.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया, जो अक्टूबर के लिए असाधारण है। यह तापमान 2008 के 31.1 डिग्री के रिकॉर्ड को तोड़कर नया बेंचमार्क स्थापित करता है।
इस गर्मी के पीछे अल नीनो का असर माना जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल इसी कारक को दोषी ठहराना जल्दबाजी होगी। समुद्री और वायुमंडलीय अन्य कारक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
स्थानीय लोगों की मुख्य चिंता कम बर्फबारी से जुड़ी है। पिछले सात सालों से कश्मीर में सर्दियों की बर्फबारी सामान्य से कम रही है, जिससे पर्यटन और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
मौसम का असामान्य रुख
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, 2026 में अल नीनो जून में कमजोर था और जुलाई में मध्यम स्तर तक पहुंचा। अक्टूबर से दिसंबर तक इसके और मजबूत होने की संभावना है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत पर इसका प्रभाव केवल अल नीनो से नहीं, बल्कि अन्य जलवायु कारकों से भी तय होता है। इसका मतलब है कि मौसम का इस साल अनिश्चित और उतारचढ़ाव भरा रहना संभव है।
कश्मीर में यह गर्मी स्थानीय जीवनशैली को सीधे प्रभावित कर रही है। लोगों को सामान्य से अधिक गर्मियों जैसी स्थितियों से निपटना पड़ रहा है, जो उनके लिए नई चुनौती है।

बर्फबारी का गहरा प्रभाव
2019-20 से 2025-26 तक कश्मीर की हर सर्दी सामान्य से कम वर्षा वाली रही है। 2025-26 में वर्षा में करीब 65 प्रतिशत कमी दर्ज की गई, जो एक चिंताजनक ट्रेंड है।
फरवरी 2026 में सामान्य 130.4 मिमी वर्षा के मुकाबले सिर्फ 14.2 मिमी वर्षा हुई, यानी 89 प्रतिशत कमी। श्रीनगर में पूरे सर्दी मौसम में वर्षा 236.5 मिमी के सामान्य के मुकाबले सिर्फ 84.2 मिमी रही।
यह आंकड़े दर्शाते हैं कि कश्मीर में लगातार कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण बर्फबारी कम या अनियमित हो रही है। यह स्थिति स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।

आर्थिक और सामाजिक असर
कश्मीरियों का मानना है कि अगर बर्फ कम गिरी, तो बर्फ में तलाश में आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हो जाएगी। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।
पर्यटन कश्मीर की आर्थिक रीढ़ की हड्डी है। कम बर्फबारी से पर्यटक आकर्षण कम हो सकता है, जिससे स्थानीय कारोबार और रोजगार प्रभावित होंगे।
प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह कम बर्फबारी की स्थिति के साथ-साथ अचानक भारी बर्फबारी वाले परिदृश्य के लिए भी तैयारी रखे। यह संतुलन बनाना कठिन है, लेकिन आवश्यक भी।

भविष्य की चिंताएं
अभी कोई अंतिम पूर्वानुमान सामने नहीं आया है, जिससे कश्मीरी असमंजस में हैं। यह अनिश्चितता स्थानीय लोगों के लिए और भी चिंताजनक है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गर्मी असामान्य है, लेकिन कम बर्फबारी और पूरी सर्दी सामान्य से गर्म रहने का दावा अभी पूर्वानुमान है, तथ्य नहीं।
अगले कुछ महीनों में मौसम की स्थिति का पता चलने पर ही स्थानीय समुदाय और प्रशासन उचित कदम उठा सकेंगे। तब तक चिंता और अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Keep subscribing to सान्या सिंहHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Subscribe
