रेगिस्तान का नाम सुनते ही तपती रेत और झुलसाने वाली गर्मी का खयाल आता है। लेकिन रेगिस्तान में रात बिताने वाले जानते हैं कि वही रेत रात होते-होते बर्फ जैसी ठंडी हो जाती है। दिन और रात के इस भारी तापमान अंतर के पीछे छिपे विज्ञान को समझते हैं।
रेगिस्तान का जिक्र आते ही हमारे मन में तपती रेत, चटकती धूप और झुलसाने वाली गर्मी की तस्वीर उभरती है। दिन के समय यहां का तापमान इतना ऊंचा चढ़ जाता है कि खुले में खड़ा रहना तक मुश्किल हो जाता है। मगर हैरानी की बात यह है कि यही तपता हुआ रेगिस्तान रात होते ही बेहद ठंडा हो जाता है।
दिन और रात का अनोखा फर्क
रेगिस्तान में दिन और रात के तापमान का अंतर सामान्य इलाकों की तुलना में कहीं अधिक होता है। एक गर्म रेगिस्तान में दिन के समय पारा अक्सर अड़तीस डिग्री सेल्सियस या उससे भी ऊपर पहुंच जाता है, जबकि रात में यह गिरकर शून्य के आसपास तक आ सकता है।
इसका मतलब है कि केवल कुछ घंटों के भीतर तापमान में करीब चालीस डिग्री तक का भारी बदलाव आ जाता है। जो जगह दिन में भट्ठी की तरह तपती है, वही रात में कंपकंपा देने वाली ठंड में बदल जाती है, और इसके पीछे कुछ बहुत ही रोचक वैज्ञानिक कारण छिपे हुए हैं।
हवा में नमी की कमी

इस पहेली का सबसे बड़ा कारण रेगिस्तान की बेहद सूखी हवा है। आमतौर पर हवा में मौजूद जलवाष्प एक कंबल की तरह काम करती है, जो दिन भर में जमा हुई गर्मी को धरती के पास रोककर रखती है और रात में उसे तेजी से बाहर नहीं जाने देती।
रेगिस्तान में यह जलवाष्प बहुत कम होती है, इसलिए यहां वह गरमाहट रोकने वाला कंबल लगभग गायब रहता है। नतीजा यह होता है कि सूरज ढलते ही दिन भर की सारी गर्मी बिना किसी रुकावट के सीधे आसमान की ओर विकिरित होकर अंतरिक्ष में लौट जाती है।
बादलों का न होना
गर्मी के इस तेजी से निकल जाने में बादलों की कमी भी बड़ी भूमिका निभाती है। बादल भी एक ढाल की तरह काम करते हैं, जो जमीन से उठने वाली गर्मी को वापस नीचे की ओर परावर्तित कर देते हैं और इस तरह रात में तापमान को अधिक गिरने से रोकते हैं।
रेगिस्तान के ऊपर आसमान अक्सर बिल्कुल साफ रहता है और बादल न के बराबर होते हैं। ऐसे खुले और साफ आसमान के नीचे गर्मी को रोकने वाला कोई परदा नहीं होता, इसलिए ऊष्मा और भी आसानी से ऊपर उठकर बाहर निकल जाती है और रातें बहुत ठंडी हो जाती हैं।
रेत की खास प्रकृति
इस पूरी प्रक्रिया में रेत का अपना खास स्वभाव भी शामिल है। रेत में गर्मी को सहेजकर रखने की क्षमता बहुत कम होती है, इसलिए यह दिन में सूरज की रोशनी पड़ते ही बहुत जल्दी गरम हो जाती है, मानो कुछ ही देर में आग की तरह तपने लगती हो।
लेकिन जिस तेजी से रेत गरम होती है, उतनी ही तेजी से वह ठंडी भी हो जाती है। पानी या नम मिट्टी की तरह रेत गर्मी को देर तक अपने भीतर नहीं रोक पाती, इसलिए सूरज डूबते ही वह अपनी सारी संचित ऊष्मा जल्दी छोड़ देती है और जमीन तेजी से ठंडी पड़ने लगती है।
जीवन के लिए चुनौती
तापमान का यह भारी उलटफेर रेगिस्तान में रहने वाले जीव-जंतुओं और पौधों के लिए एक कड़ी परीक्षा है। उन्हें एक ही दिन में झुलसाने वाली गर्मी और हड्डियां कंपा देने वाली ठंड, दोनों का सामना करना पड़ता है, जो किसी भी शरीर के लिए आसान नहीं होता।
यही कारण है कि रेगिस्तान के कई जीव दिन के सबसे गर्म घंटों में बिलों और छाया में छिपे रहते हैं और रात के ठंडे समय में सक्रिय होते हैं। प्रकृति ने इन जीवों को इस चरम वातावरण में जीने के लिए अनेक अनोखी तरकीबों से लैस किया है।
एक ही रेगिस्तान, दो दुनिया
इस तरह एक ही रेगिस्तान दिन और रात में मानो दो बिल्कुल अलग दुनियाओं में बदल जाता है। दिन का तपता हुआ मैदान रात में एक ठंडे, शांत और तारों भरे विस्तार में बदल जाता है, और यह बदलाव हर बार उतना ही नाटकीय होता है।
भारत के थार जैसे रेगिस्तानों में भी यही खेल हर रोज दोहराया जाता है। दिन और रात के इस अंतर को समझना हमें याद दिलाता है कि हवा, नमी और जमीन के बीच का नाजुक संतुलन ही हमारे आसपास के मौसम को इतने अद्भुत रूप देता है।

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