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जंगल का छिपा इंटरनेट: पेड़ ज़मीन के नीचे आपस में कैसे बात करते हैं SCIENCE · IN

जंगल का छिपा इंटरनेट: पेड़ ज़मीन के नीचे आपस में कैसे बात करते हैं

सान्या सिंह सान्या सिंह sanyasingh.avalw.com · 898 reads Respect0 Save Share Read only
READS35live count PUBLISHED20 Sept2026 READING TIME3 min653 words LANGUAGEHindi
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एक जंगल हमें अलग-अलग खड़े पेड़ों का समूह लगता है, लेकिन ज़मीन के नीचे ये सभी पेड़ फफूंद के महीन धागों के एक विशाल जाल से जुड़े होते हैं। वैज्ञानिक इसे जंगल का इंटरनेट कहते हैं। जानिए कैसे पेड़ इसके ज़रिए भोजन बाँटते हैं और खतरे की चेतावनी भेजते हैं।

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जब हम किसी घने जंगल में जाते हैं, तो हमें अलग-अलग खड़े हुए अनगिनत पेड़ दिखाई देते हैं। लेकिन हाल के वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यह पूरी सच्चाई नहीं है। असल में, ज़मीन के नीचे ये सारे पेड़ एक विशाल और छिपे हुए जाल के ज़रिए आपस में जुड़े रहते हैं, जिसे वैज्ञानिक प्यार से जंगल का इंटरनेट भी कहते हैं।

ज़मीन के नीचे का जाल

इस अनोखे जाल की खोज कनाडा की वन-पारिस्थितिकी विशेषज्ञ सुज़ैन सिमर्ड ने की थी। उन्होंने दिखाया कि जंगल की मिट्टी में फफूंद के असंख्य महीन धागे फैले होते हैं, जो एक पेड़ की जड़ों को दूसरे पेड़ की जड़ों से जोड़ देते हैं। यही धागे पूरे जंगल को एक जीवित नेटवर्क में बदल देते हैं।

इन धागों का जाल इतना घना होता है कि जंगल में उठाया गया हर कदम मिट्टी के नीचे सैकड़ों किलोमीटर लंबे फफूंद-तंतुओं के ऊपर से गुज़रता है। वैज्ञानिक इन्हें जंगल के इंटरनेट की ऑप्टिकल फाइबर केबल तक कह देते हैं, क्योंकि इनके ज़रिए संदेश और पोषण दोनों बहते रहते हैं।

पेड़ और फफूंद की दोस्ती

जो पेड़ ज़मीन के ऊपर अलग-अलग खड़े दिखाई देते हैं, वे असल में अपनी जड़ों और फफूंद के महीन धागों के ज़रिए नीचे एक-दूसरे से गहराई तक जुड़े होते हैं।
जो पेड़ ज़मीन के ऊपर अलग-अलग खड़े दिखाई देते हैं, वे असल में अपनी जड़ों और फफूंद के महीन धागों के ज़रिए नीचे एक-दूसरे से गहराई तक जुड़े होते हैं।

यह पूरा नेटवर्क पेड़ों और फफूंद के बीच एक गहरी दोस्ती पर टिका है, जिससे दोनों को बराबर फायदा होता है। पेड़ सूरज की रोशनी से प्रकाश-संश्लेषण करके शर्करा यानी शुगर बनाते हैं और उसका एक हिस्सा मिट्टी के नीचे रहने वाली इन फफूंदों को दे देते हैं।

बदले में, ये फफूंद अपने बारीक धागों से मिट्टी में दूर-दूर तक फैलकर पानी और नाइट्रोजन तथा फास्फोरस जैसे ज़रूरी पोषक तत्व इकट्ठा करती हैं, जिन तक किसी पेड़ की जड़ें अकेले नहीं पहुँच पातीं। फिर यही कीमती पोषण वे पेड़ों को लौटा देती हैं।

एक-दूसरे को भोजन बाँटना

इस भूमिगत नेटवर्क का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि पेड़ इसके ज़रिए आपस में अपना भोजन तक बाँटते हैं। एक प्रसिद्ध अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि किसी पेड़ की महीन जड़ों में मौजूद कार्बन का चालीस प्रतिशत तक हिस्सा दूसरे पड़ोसी पेड़ों से आ सकता है।

उदाहरण के लिए, जब सर्दियों में बर्च के पेड़ की पत्तियाँ झड़ जाती हैं और वह भोजन नहीं बना पाता, तब पास खड़े सदाबहार पेड़ उसे कार्बन भेजते हैं। और गर्मियों में जब बर्च हरा-भरा होता है, तो वह छाँव में खड़े कमज़ोर पेड़ों की मदद कर देता है।

जंगल की माँ

सुज़ैन सिमर्ड ने अपने शोध में एक और अनोखी बात देखी, जिसे उन्होंने माँ-पेड़ यानी मदर ट्री का नाम दिया। ये आमतौर पर जंगल के सबसे बड़े और सबसे पुराने पेड़ होते हैं, जो इस पूरे भूमिगत नेटवर्क के मुख्य केंद्र की तरह काम करते हैं और उसे संभालते हैं।

ये विशाल माँ-पेड़ अपने आसपास उग रहे छोटे और नाज़ुक पौधों को इसी नेटवर्क से जोड़ लेते हैं और उन्हें बढ़ने के लिए ज़रूरी पोषण भेजते रहते हैं। इस तरह जंगल की अगली पीढ़ी को संभालने और पालने में इन बुज़ुर्ग पेड़ों की भूमिका बेहद अहम होती है।

खतरे की चेतावनी

यह छिपा हुआ जाल केवल भोजन बाँटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी प्रणाली की तरह भी काम करता है। जब किसी पेड़ पर हानिकारक कीड़ों का हमला होता है, तो वह इस नेटवर्क के ज़रिए अपने पड़ोसी पेड़ों तक रासायनिक संकेत भेज सकता है।

ये संकेत मिलते ही आसपास के पेड़ पहले से सतर्क हो जाते हैं और अपने बचाव के लिए विशेष रक्षात्मक रसायन बनाना शुरू कर देते हैं। इस तरह एक पेड़ की तकलीफ पूरे जंगल को समय रहते खतरे से बचने का एक कीमती मौका दे देती है।

जंगल एक जीवित समुदाय

इन खोजों ने जंगलों के प्रति हमारी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। पहले माना जाता था कि जंगल में हर पेड़ केवल रोशनी और जगह के लिए दूसरों से मुकाबला करता है, लेकिन अब हम जानते हैं कि इसके नीचे सहयोग और साझेदारी की एक पूरी दुनिया छिपी होती है।

इसलिए किसी जंगल को केवल अलग-अलग पेड़ों का समूह मान लेना ठीक नहीं है। असल में वह एक जीवित और आपस में गहराई से जुड़ा हुआ समुदाय है। इस अनमोल नेटवर्क को समझना और उसकी रक्षा करना आज पर्यावरण संरक्षण की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारियों में से एक बन चुका है।

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सान्या सिंह 2026-09-20 · 3 min read · 35 reads
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