रात के आसमान में जगमगाते तारे भले ही शाश्वत लगें, पर उनका भी जन्म, यौवन और मृत्यु का एक लंबा चक्र होता है। गैस के बादलों में जन्म से लेकर सुपरनोवा और ब्लैक होल तक, तारों की इस कहानी को आसान भाषा में समझते हैं।
किसी साफ़ और अंधेरी रात में जब हम आसमान की ओर नज़र उठाते हैं, तो झिलमिलाते असंख्य तारे हमें हमेशा से वहीं मौजूद और शाश्वत जान पड़ते हैं। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक रोमांचक है, क्योंकि इन तारों का भी इंसानों और पेड़-पौधों की तरह जन्म, भरा-पूरा यौवन और अंत में मृत्यु का एक बेहद लंबा चक्र होता है।
नीहारिका के बादलों में जन्म
हर तारे का जन्म अंतरिक्ष में तैरते गैस और धूल के विशालकाय बादलों के भीतर होता है, जिन्हें विज्ञान की भाषा में नीहारिका या नेबुला कहा जाता है। समय के साथ इन बादलों का कोई हिस्सा अपने ही गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे सिमटने और सिकुड़ने लगता है।
जैसे-जैसे यह गैस सिकुड़ती जाती है, उसका केंद्र लगातार और अधिक गर्म तथा सघन होता चला जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वहाँ तापमान इतना अधिक हो जाता है कि नाभिकीय संलयन नामक प्रक्रिया शुरू हो जाती है, और ठीक उसी पल एक नया तारा जगमगाकर अपने जीवन की शुरुआत करता है।
जगमगाता भरा-पूरा यौवन

अपने जीवन के सबसे लंबे और स्थिर दौर में, तारा अपने केंद्र में मौजूद हाइड्रोजन को हीलियम में बदलता रहता है और इसी प्रक्रिया से लगातार भरपूर ऊर्जा एवं प्रकाश पैदा करता है। खगोलविद इस लंबे और शांत चरण को तारे का मुख्य अनुक्रम कहते हैं, जो अरबों वर्षों तक बना रह सकता है।
यहाँ यह जान लेना बेहद दिलचस्प है कि जिस सूरज को हम हर रोज़ देखते हैं, वह भी असल में ऐसा ही एक साधारण, मध्यम आकार का तारा है। वह भी इसी मुख्य अनुक्रम के दौर से गुज़र रहा है और लगभग साढ़े चार अरब वर्षों से हमारी पृथ्वी को अनवरत प्रकाश तथा ऊष्मा देता आ रहा है।
रंग जो उनकी उम्र बताते हैं
आसमान में दिखने वाले सभी तारे एक जैसे नहीं होते, बल्कि उनके रंग में भी सूक्ष्म अंतर छिपा रहता है। नीले और सफ़ेद रंग के तारे आमतौर पर सबसे अधिक गर्म होते हैं, जबकि लाल और नारंगी रंग वाले तारे तुलना में कुछ ठंडे माने जाते हैं। इन्हीं रंगों से वैज्ञानिक किसी तारे के तापमान और उसकी अवस्था का अंदाज़ा लगा लेते हैं।
बुढ़ापा और लाल दानव
अरबों वर्षों तक जलते रहने के बाद, एक समय ऐसा आता है जब तारे के केंद्र में मौजूद हाइड्रोजन ईंधन धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। इसके बाद तारा फूलकर बेहद विशालकाय हो जाता है और उसकी बाहरी सतह कुछ ठंडी पड़कर लाल दिखाई देने लगती है। इसी विराट अवस्था को खगोल विज्ञान में लाल दानव कहा जाता है।
दो बिल्कुल अलग अंत
इसके आगे तारे का अंत उसके अपने आकार पर निर्भर करता है। हमारे सूरज जैसे मध्यम आकार के तारे अपनी बाहरी परतों को धीरे-धीरे अंतरिक्ष में बिखेर देते हैं, और पीछे बचा उनका सिकुड़ा हुआ गर्म केंद्र एक छोटे लेकिन बेहद सघन सफ़ेद बौने में बदल जाता है, जो लंबे समय तक धीमे-धीमे ठंडा होता रहता है।
वहीं दूसरी ओर, सूरज से कई गुना बड़े और भारी तारों का अंत कहीं अधिक नाटकीय और भव्य होता है। ऐसे तारे अपने जीवन के आखिर में सुपरनोवा नामक एक ज़बरदस्त विस्फोट के साथ फट पड़ते हैं, और पीछे बचा उनका केंद्र या तो एक न्यूट्रॉन तारा बन जाता है या फिर बेहद रहस्यमय ब्लैक होल में तब्दील हो जाता है।
हम तारों की धूल से बने हैं
इन सुपरनोवा विस्फोटों की एक और बेहद खूबसूरत भूमिका है। इन्हीं महाविस्फोटों के भीतर लोहे और सोने जैसे कई भारी तत्व बनते हैं, जो फटने के बाद पूरे अंतरिक्ष में दूर-दूर तक बिखर जाते हैं और आगे चलकर नए तारों, ग्रहों और यहाँ तक कि जीवन के लिए कच्चे माल का काम करते हैं।
इसका सीधा और हैरान कर देने वाला अर्थ यह है कि हमारे अपने शरीर को बनाने वाले बहुत से परमाणु भी कभी किसी तारे के भीतर ही गढ़े गए थे। एक तरह से देखा जाए तो हम सब सचमुच तारों की धूल से बने हैं, और तारों की मृत्यु से ही ब्रह्मांड में बार-बार नई सृष्टि का जन्म होता रहता है।
इसलिए अगली बार जब आप किसी खुले आसमान के नीचे तारों को निहारें, तो याद रखिएगा कि उनमें से हर एक तारा अपने आप में एक पूरी जीवन-कथा है। इतना ही नहीं, आपकी आँखों तक पहुँच रहा उनका वह प्रकाश असल में लाखों-करोड़ों वर्ष पुराने अतीत से चलकर आ रहा एक संदेश है।
तारे को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.
तारे का अच्छा विश्लेषण.
तारे के बारे में बहुत उपयोगी लेख.
अच्छी बात.
सहमति है.

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