avalw
⚲
नन्ही परागणकर्ता का बड़ा काम: मधुमक्खियाँ, परागण और उनकी अनोखी भाषा SCIENCE · IN

नन्ही परागणकर्ता का बड़ा काम: मधुमक्खियाँ, परागण और उनकी अनोखी भाषा

सान्या सिंह सान्या सिंह sanyasingh.avalw.com · 898 reads Respect0 Save Share Read only
READS32live count PUBLISHED16 Sept2026 READING TIME4 min759 words LANGUAGEHindi
AI CITATIONS? Gathering data

मधुमक्खी छोटी है पर हमारी थाली के लिए बहुत बड़ी। परागण कैसे होता है, वैगल डांस की भाषा, छत्ते का समाज और भारत की मधुमक्खियों तथा उन पर मँडराते खतरों की कहानी।

ALSO ON THE CREATOR SITERead this on sanyasingh.avalw.comOpen

मधुमक्खी आकार में भले ही छोटी हो, लेकिन हमारी थाली और खेतों के लिए उसका महत्व बहुत बड़ा है। फूल से फूल तक उड़ते हुए वह जो परागण करती है, उसी पर बहुत सारी फसलों की पैदावार टिकी होती है। यही छोटा सा कीट प्रकृति के एक बड़े चक्र को चुपचाप चलाता रहता है और अक्सर हमारा ध्यान उस पर जाता ही नहीं।

परागण क्या है

परागण वह प्रक्रिया है जिसमें फूल के नर भाग से पराग, मादा भाग तक पहुँचता है और उसके बाद ही बीज तथा फल बन पाते हैं। कुछ पौधे हवा के सहारे यह काम करते हैं, लेकिन बहुत से फूलों को इसके लिए कीड़ों की मदद चाहिए। यहीं पर मधुमक्खी जैसी परागणकर्ता की भूमिका सबसे अहम हो जाती है।

मधुमक्खी जब मीठे रस यानी नेक्टर की तलाश में फूल पर बैठती है, तो उसके रोएँदार शरीर पर पराग के कण चिपक जाते हैं। अगले फूल पर पहुँचते ही इनमें से कुछ कण वहाँ झड़ जाते हैं और परागण पूरा हो जाता है। अपने पिछले पैरों की एक विशेष टोकरी में वह पराग इकट्ठा करके छत्ते तक भी ले जाती है।

भोजन और परागण

सिंहपर्णी के फूल पर पराग से लदी एक मधुमक्खी। हर उड़ान के साथ वह परागकण एक फूल से दूसरे तक पहुँचाती है।
सिंहपर्णी के फूल पर पराग से लदी एक मधुमक्खी। हर उड़ान के साथ वह परागकण एक फूल से दूसरे तक पहुँचाती है।

परागण का महत्व आँकड़ों में और साफ दिखता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार दुनिया की पचहत्तर प्रतिशत से अधिक खाद्य फसलें किसी न किसी हद तक परागण पर निर्भर करती हैं। हालाँकि वैश्विक उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा ही इस पर टिका है, क्योंकि गेहूँ, चावल और मक्का जैसी मुख्य फसलों को मधुमक्खियों की ज़रूरत नहीं पड़ती।

भारत के संदर्भ में यह तस्वीर और भी अहम है। अनुमान बताते हैं कि देश की लगभग इक्यावन प्रतिशत प्रमुख फसलें कीट परागण पर निर्भर करती हैं, जिसका सालाना योगदान करीब एक लाख बारह हज़ार करोड़ रुपये आँका गया है। सरसों, आम और कपास जैसी फसलों में मधुमक्खियों के परागण से पैदावार बीस से दो सौ प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

मधुमक्खी की भाषा: वैगल डांस

मधुमक्खियों की सबसे हैरान करने वाली बात उनकी आपसी भाषा है। ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिक कार्ल फॉन फ्रिश ने खोजा कि मधुमक्खियाँ एक खास नृत्य के ज़रिए साथी मक्खियों को भोजन का पता बताती हैं। इस अनोखी खोज के लिए उन्हें अपने साथियों के साथ उन्नीस सौ तिहत्तर में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

इस नृत्य को वैगल डांस कहते हैं, जिसमें मधुमक्खी छत्ते की सीधी दीवार पर आठ के अंक जैसा घुमावदार रास्ता बनाती है। वह जिस कोण पर हिलती है, वह सूरज की दिशा के सापेक्ष फूलों की दिशा बताता है, और हिलने की अवधि से दूरी का अंदाज़ा मिलता है। इतनी छोटी सी जान का इतना सटीक संदेश देना सचमुच अचंभित कर देता है।

छत्ते का समाज

एक मधुमक्खी का छत्ता अपने आप में एक पूरा संगठित समाज होता है। इसमें एक रानी होती है जो अंडे देती है, हज़ारों श्रमिक मक्खियाँ होती हैं जो सारा काम सँभालती हैं, और कुछ नर मक्खियाँ यानी ड्रोन होते हैं। हर सदस्य की भूमिका तय होती है और पूरा छत्ता एक इकाई की तरह मिलकर काम करता है।

श्रमिक मक्खियाँ ही फूलों से रस और पराग लाती हैं, छत्ता बनाती हैं, बच्चों को पालती हैं और छत्ते की रक्षा भी करती हैं। भोजन की तलाश में एक अकेली मक्खी दिन भर में सैकड़ों फूलों तक पहुँचती है। यही निरंतर उड़ानें मिलकर खेतों और बगीचों में परागण का विशाल काम पूरा करती हैं।

भारत की मधुमक्खियाँ

भारत में मधुमक्खियों की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें भारतीय मौन यानी एपिस सेराना और यूरोपीय मधुमक्खी एपिस मेलिफेरा को पालतू बनाकर मधुमक्खी पालन में इस्तेमाल किया जाता है। इनके अलावा जंगली रूप में विशाल आकार की रॉक बी एपिस डोरसाटा और छोटी एपिस फ्लोरिया भी हमारे यहाँ मौजूद हैं।

जंगली एपिस डोरसाटा ऊँचे पेड़ों और चट्टानों पर बड़े खुले छत्ते बनाती है और जंगलों में परागण के साथ शहद तथा मोम का बड़ा स्रोत मानी जाती है। वहीं एपिस सेराना और मेलिफेरा को पेटियों में पालकर किसान शहद के साथ अपनी फसलों की पैदावार भी बढ़ाते हैं। इस तरह जंगली और पालतू, दोनों तरह की प्रजातियाँ अपने अपने ढंग से बेहद उपयोगी हैं।

खतरे और उम्मीद

इतने महत्व के बावजूद मधुमक्खियाँ आज कई खतरों का सामना कर रही हैं। खेतों में कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, प्राकृतिक आवासों का सिमटना और फूलों वाले पौधों की कमी परागणकर्ताओं के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। दुनिया भर के वैज्ञानिक परागणकर्ताओं की घटती संख्या को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं।

मधुमक्खियों को बचाना असल में हमारी अपनी थाली को बचाना है, क्योंकि उनके बिना बहुत सी फसलें अधूरी रह जाएँगी। खेतों के किनारे फूलों वाले पौधे लगाना और कीटनाशकों का संभलकर उपयोग करना छोटे लेकिन ज़रूरी कदम हैं। इस नन्ही परागणकर्ता की उड़ान में सचमुच बच्चों जैसी जिज्ञासा और प्रकृति का पूरा भविष्य, दोनों छिपे हुए हैं।

0 responses
No responses yet. Be the first to add one.
सान्या सिंह
Follow this desk
सान्या सिंह
Create a free account to follow सान्या सिंह. New stories land in your feed, and you can save any of them to your own reading lists.
Your library & lists →
सान्या सिंह
WRITTEN BY THE AUTHOR
सान्या सिंह 2026-09-16 · 4 min read · 32 reads
View profile →
VERIFY THIS STORY
ASK AI
सान्या सिंह Keep subscribing to सान्या सिंहHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Up next
More
Statistics Search Become a creator Alliances About Terms Privacy