अंधेरी रात में चमकती एक लकीर, आखिर वह धूमकेतु है या टूटता तारा? बर्फ के गंदे गोले जैसे धूमकेतु से लेकर हर छिहत्तर साल में लौटते हैली और धूमकेतु की धूल से बनने वाली उल्का वर्षाओं तक, अंतरिक्ष को बच्चों जैसी उत्सुकता से देखने वाली एक पत्रकार की नज़र से यह पूरी कहानी।
अंतरिक्ष की नई खोजें मुझे आज भी बच्चों जैसी उत्सुकता से भर देती हैं। किसी अंधेरी रात में, शहर की रोशनी से दूर, जब हम आसमान की ओर नज़र उठाते हैं और अचानक एक चमकती लकीर उसे चीरती हुई गुज़रती है, तो मन एकदम रोमांच से भर उठता है। पर आखिर वह चीज़ असल में होती क्या है?
आसमान के इन दो सबसे खूबसूरत अजूबों को अक्सर लोग एक ही समझ बैठते हैं, जबकि ये आपस में बिल्कुल अलग हैं। एक है धूमकेतु, जिसे हिंदी में पुच्छल तारा भी कहा जाता है, और दूसरी है उल्का, यानी वह जिसे हम आम बोलचाल में टूटता तारा कहकर पुकारते हैं। आइए इन दोनों के फर्क को थोड़ा करीब से समझें।
धूमकेतु क्या है
धूमकेतु दरअसल कोई तारा नहीं, बल्कि बर्फ, धूल और चट्टानी मलबे से बनी एक विशाल गेंद जैसी संरचना है। इसे अक्सर गंदा बर्फ का गोला भी कहा जाता है। ज़्यादातर समय ये सूरज से बहुत दूर, अंतरिक्ष के ठंडे और गहरे अंधेरे में चुपचाप घूमते रहते हैं और हमें बिल्कुल दिखाई नहीं देते।
लेकिन जैसे ही कोई धूमकेतु अपनी लंबी अंडाकार कक्षा में घूमते हुए सूरज के पास पहुंचता है, उसकी तेज़ गर्मी से इसकी बर्फ पिघलकर वाष्प बनने लगती है। इसी से धूल और गैस की एक चमकदार लंबी पूंछ बन जाती है, जो हमेशा सूरज से ठीक विपरीत दिशा में फैली रहती है। यही उसकी असली पहचान है।
हैली, सबसे मशहूर मेहमान
सभी धूमकेतुओं में सबसे मशहूर है हैली धूमकेतु, जो लगभग हर छिहत्तर साल में केवल एक बार धरती के आसमान में नज़र आता है। इसे आखिरी बार साल उन्नीस सौ छियासी में देखा गया था, और अब यह अगली बार साल दो हज़ार इकसठ में ही लौटकर हमारे आसमान में दिखाई देगा।
यानी अधिकतर लोगों के लिए यह जीवन में केवल एक बार दिखने वाला दुर्लभ नज़ारा होता है। यही वजह है कि सदियों से इंसान इसे गहरे कौतूहल और कभी-कभी डर के साथ देखता आया है, और इसका ज़िक्र दुनिया भर के पुराने इतिहास और अभिलेखों में बार-बार मिलता रहा है।
आसमान से गिरती लकीरें

अब बात करते हैं उल्का की, यानी उस टूटते तारे की जिसे देखकर हम अक्सर मन ही मन कोई मन्नत मांग बैठते हैं। पर सच यह है कि यहां कोई तारा टूटता ही नहीं है। दरअसल ये धूल या छोटे-छोटे पत्थर के कण होते हैं, जो बहुत तेज़ रफ्तार से हमारे वायुमंडल में घुसते ही जलकर पल भर के लिए चमक उठते हैं।
जब आसमान के किसी हिस्से से एक ही रात में ऐसी कई लकीरें एक साथ गिरती हुई दिखें, तो उसे उल्का वर्षा कहा जाता है। यह तब होती है जब हमारी धरती, सूरज की परिक्रमा करते हुए, किसी धूमकेतु के पीछे छूटे हुए धूल के मलबे के विशाल बादल में से होकर गुज़रती है।
धूमकेतु की धूल का तोहफा
यहीं पर धूमकेतु और उल्का का असली रिश्ता जुड़ता है। दरअसल, अधिकतर उल्का वर्षाएं किसी न किसी धूमकेतु की छोड़ी हुई धूल से ही बनती हैं। मिसाल के तौर पर, हर साल अगस्त में दिखने वाली मशहूर पर्सिड उल्का वर्षा, स्विफ्ट टटल नाम के एक धूमकेतु के मलबे से पैदा होती है।
इसी तरह, अक्टूबर में दिखने वाली ओरायोनिड और मई की एटा एक्वैरिड, ये दोनों उल्का वर्षाएं उसी हैली धूमकेतु के पीछे छूटे मलबे से बनती हैं। यानी हैली भले ही छिहत्तर साल में एक बार आता हो, उसकी धूल का यह तोहफा हमें हर साल दो बार आसमान में देखने को मिल जाता है।
एक अनोखा अपवाद
हालांकि हर उल्का वर्षा किसी धूमकेतु से ही आती हो, ऐसा भी नहीं है। दिसंबर में दिखने वाली जेमिनिड उल्का वर्षा इसका एक बेहद दिलचस्प अपवाद है। इसकी जननी कोई धूमकेतु नहीं, बल्कि फेथन नाम का एक अजीब सा क्षुद्रग्रह है, जिसे वैज्ञानिक कभी-कभी चट्टानी धूमकेतु भी कह देते हैं।
यही जेमिनिड, पूरे साल की सबसे चमकीली और शानदार उल्का वर्षाओं में गिनी जाती है। आसमान का यह खज़ाना हमें याद दिलाता है कि इस विशाल ब्रह्मांड में तयशुदा नियमों के साथ-साथ अनगिनत हैरान कर देने वाले अपवाद भी छिपे हुए हैं, जिन्हें समझना अपने आप में एक रोमांच है।
बस आसमान की ओर देखिए
इन खूबसूरत नज़ारों को देखने के लिए किसी महंगी दूरबीन की ज़रूरत बिल्कुल नहीं होती। बस शहर की चकाचौंध से थोड़ा दूर, किसी खुली और अंधेरी जगह पर जाइए, आसमान के अंधेरे का अभ्यस्त होने के लिए अपनी आंखों को कुछ मिनट का समय दीजिए, और फिर धैर्य के साथ ऊपर की ओर देखते रहिए।
मेरे लिए तो हर टूटता तारा और हर धूमकेतु, इस अनंत ब्रह्मांड से जुड़ने का एक नन्हा सा पुल है। जब भी मैं रात के आसमान की ओर देखती हूं, वही बचपन वाली उत्सुकता एक बार फिर लौट आती है, और मुझे लगता है कि यही उत्सुकता शायद विज्ञान की सबसे बड़ी ताकत है।
पर्सिड को फॉलो करता हूँ और यह मददगार है.

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