मच्छर को हम सिर्फ एक परेशानी समझते हैं, पर इसके पीछे एक हैरान करने वाला जीव-विज्ञान छिपा है। केवल मादा क्यों काटती है, यह हमें कैसे ढूँढ लेती है, और वैज्ञानिक अब बैक्टीरिया की मदद से इसे कैसे मात दे रहे हैं, आइए इस छोटे से जीव की बड़ी कहानी जानें।
गर्मी की शामों में कान के पास गूँजने वाली वह पतली सी आवाज़ हम सबको चिढ़ाती है, और मच्छर को हम बस एक परेशानी मान कर भूल जाते हैं। लेकिन इस नन्हे से जीव के भीतर एक ऐसा हैरान करने वाला विज्ञान छिपा है, जिसे समझे बिना हम न इसकी ताक़त जान सकते हैं और न ही इससे बचने के तरीके ठीक से खोज सकते हैं।
सिर्फ मादा ही काटती है
बहुत कम लोग जानते हैं कि इंसानों को केवल मादा मच्छर ही काटती है, नर मच्छर कभी खून नहीं पीता। इसका कारण भूख नहीं बल्कि प्रजनन है, क्योंकि अपने अंडों को विकसित करने के लिए मादा को खून में मौजूद प्रोटीन की सख़्त ज़रूरत होती है। नर मच्छर तो शांति से फूलों का रस पीकर ही अपना पेट भर लेते हैं।
और भी हैरानी की बात यह है कि मादा मच्छर हमें ढूँढती कैसे है। उसके शरीर में ऐसे विशेष संवेदक होते हैं जो हमारी साँस में छोड़ी गई कार्बन डाइऑक्साइड, हमारे शरीर की गर्मी और पसीने की गंध को दूर से ही पहचान लेते हैं। इन्हीं संकेतों के सहारे वह अंधेरे में भी सीधे अपने शिकार तक पहुँच जाती है।
पानी में पलता जीवन
मच्छर का जीवन चार अवस्थाओं से होकर गुज़रता है, जिसमें अंडा, लार्वा, प्यूपा और फिर वयस्क मच्छर शामिल हैं। इसकी शुरुआती तीनों अवस्थाएँ रुके हुए पानी में ही बीतती हैं, और यही वजह है कि घर के आसपास जमा पानी हटा देना इनकी संख्या रोकने का सबसे आसान और असरदार तरीका माना जाता है।
दुनिया भर में मच्छरों की लगभग साढ़े तीन हज़ार से भी अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, पर इनमें से कुछ ही इंसानों को काटती हैं। एनोफ़िलीज़, एडीज़ और क्यूलेक्स जैसे अलग अलग समूह अलग बीमारियों से जुड़े होते हैं, और एक वयस्क मादा आमतौर पर दो से चार हफ़्ते जीती है और हर कुछ दिनों में खून की तलाश करती है।
प्रकृति में इनकी भूमिका

भले ही हम इन्हें दुश्मन मानते हों, पर मच्छर प्रकृति के जाल का एक हिस्सा भी हैं। इनके लार्वा पानी में मछलियों और दूसरे छोटे जीवों का भोजन बनते हैं, जबकि वयस्क मच्छर फूलों का रस पीते हुए कुछ पौधों के परागण में भी मदद कर देते हैं। इस तरह यह नन्हा जीव खाद्य श्रृंखला की एक कड़ी बना रहता है।
इसीलिए वैज्ञानिकों के सामने चुनौती दोहरी है, उन्हें बीमारियाँ फैलाने वाले मच्छरों पर काबू पाना है, पर इस तरह कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुक़सान न पहुँचे। यही संतुलन आधुनिक शोध को इतना पेचीदा और साथ ही इतना दिलचस्प बना देता है, क्योंकि हर समाधान के अपने असर होते हैं।
विज्ञान का नया हथियार
मच्छरों को इतनी गंभीरता से समझने की सबसे बड़ी वजह यह है कि कुछ प्रजातियाँ डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियाँ फैलाती हैं, जो भारत समेत कई देशों के लिए बड़ी स्वास्थ्य चुनौती हैं। यही कारण है कि दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में इस छोटे जीव पर लगातार गहरा शोध किया जा रहा है।
इसी शोध से एक अनोखा हथियार सामने आया है, जिसका नाम है वोल्बाकिया नाम का एक प्राकृतिक बैक्टीरिया। यह बैक्टीरिया दुनिया की लगभग आधी कीट प्रजातियों में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है, और जब इसे एडीज़ मच्छर के भीतर पहुँचाया जाता है तो यह उनमें वायरस फैलाने की क्षमता को काफ़ी हद तक रोक देता है।
इस खोज पर आधारित एक तकनीक को इनकम्पैटिबल इंसेक्ट तकनीक कहा जाता है। इसमें वोल्बाकिया वाले नर मच्छर छोड़े जाते हैं, और जब ये जंगली मादाओं से मिलते हैं तो उनके अंडे ही नहीं फूटते। सिंगापुर, थाईलैंड, मैक्सिको और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इस तरीके को सफलतापूर्वक आज़माया है।
सिंगापुर का चमत्कारी नतीजा
सिंगापुर के नानयांग इलाक़े में हुए एक अध्ययन के नतीजे वाकई चौंकाने वाले रहे। वहाँ वैज्ञानिकों ने वोल्बाकिया वाले नर मच्छरों को हल्की एक्स-रे किरणों से बंध्य बनाकर छोड़ा, और इस मिली-जुली तकनीक से एडीज़ मच्छरों की आबादी में अट्ठानबे प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।
इतना ही नहीं, इसी प्रयोग में डेंगू के मामलों में भी अठासी प्रतिशत तक की कमी देखी गई, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। नर मच्छरों को बंध्य बनाकर छोड़ने की यह पूरी सोच, रसायनों और कीटनाशकों के मुक़ाबले पर्यावरण के लिए कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प मानी जाती है।
छोटे दुश्मन से बड़ी सीख
भारत जैसे देश के लिए, जहाँ हर साल मानसून के बाद मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है, ऐसी तकनीकें उम्मीद की एक नई किरण हैं। इनके ज़रिए बीमारियों को फैलने से रोका जा सकता है, वह भी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ किए बिना और आसपास के दूसरे जीवों को कम से कम नुक़सान पहुँचाकर।
आख़िरकार, कान के पास भिनभिनाने वाला यह नन्हा जीव हमें एक बड़ी बात सिखाता है। किसी समस्या को सचमुच हराने के लिए पहले उसे गहराई से समझना ज़रूरी होता है, और मच्छर का विज्ञान इसका बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ धैर्य और जिज्ञासा मिलकर लाखों जानों की रक्षा कर सकते हैं।

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