हर साल दक्षिण भारत के आसमान में लाखों तितलियाँ एक साथ प्रवास करती हैं। नीले बाघ और कौवे तितलियों के ये झुंड मानसून की लय पर पश्चिमी घाट और पूर्वी मैदानों के बीच सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं। जानिए इस जीवंत तमाशे का विज्ञान।
कल्पना कीजिए कि आसमान में हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों तितलियाँ एक साथ एक ही दिशा में उड़ रही हों, मानो हवा में रंगों की कोई जीवित नदी बह रही हो। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि हर साल दक्षिण भारत में घटित होने वाला एक सच्चा और विस्मयकारी प्राकृतिक तमाशा है, जिसे तितलियों का प्रवास कहते हैं।
लाखों पंखों का सैलाब
यह प्रवास साल में दो बार होता है और इसमें भाग लेने वाली तितलियों की संख्या कल्पना से परे है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन झुंडों में एक साथ कई लाख, और कभी-कभी तो करोड़ों तितलियाँ तक शामिल होती हैं, जो मिलकर आकाश को एक चलते-फिरते, फड़फड़ाते हुए परदे में बदल देती हैं।
इनका रास्ता मौसम के साथ बदलता रहता है। मानसून से ठीक पहले ये पूर्वी घाट और आसपास के मैदानों की ओर बढ़ती हैं, और बारिश के बाद फिर से पश्चिमी घाट यानी सह्याद्रि की ओर लौट आती हैं। इस दौरान वे तीन सौ से पाँच सौ किलोमीटर तक की दूरी आराम से तय कर लेती हैं।
बाघ और कौवे तितलियाँ

इस विशाल सैलाब का बड़ा हिस्सा कुछ ही प्रजातियों की तितलियों से बनता है, जिन्हें आम भाषा में बाघ और कौवे कहा जाता है। ये सभी आक तितलियों यानी मिल्कवीड परिवार की सदस्य हैं, जो आक और उससे मिलते-जुलते पौधों पर पलती हैं और इसी कारण इनका जीवन बेहद ख़ास बन जाता है।
नीले बाघ अपने भूरे पंखों पर हल्के नीले धब्बों और धारियों के कारण पहचाने जाते हैं, जबकि कौवे तितलियाँ गहरे भूरे या लगभग काले रंग की होती हैं, जिन पर सफ़ेद बिंदुओं की कतार सजी रहती है। उड़ान में ये सब मिलकर एक अद्भुत रंगों का ताना-बाना बुन देती हैं।
मानसून की धुन पर
इन तितलियों की पूरी जीवनशैली मानसून की लय से बँधी हुई है। ये दक्षिणी सह्याद्रि को दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने से ठीक पहले छोड़ देती हैं और बारिश के थमते ही वापस लौट आती हैं। पश्चिमी घाट की ओर उनका यह प्रवास आमतौर पर अक्टूबर के मध्य से दिसंबर की शुरुआत तक चलता है।
यह यात्रा किसी एक तितली की नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ियों की साझी कहानी है। पहाड़ों में पहुँचकर ये अंडे देती हैं और प्रजनन करती हैं, और अगले साल अप्रैल से जुलाई के बीच इनकी अगली पीढ़ी फिर से पूर्वी मैदानों की ओर उड़ान भरती है। इस तरह यह चक्र बिना रुके चलता रहता है।
ज़हर का कवच
इन तितलियों की सबसे दिलचस्प बात उनका छिपा हुआ बचाव है। कैटरपिलर के रूप में ये आक जैसे पौधे खाती हैं, जिनमें मौजूद विषैले रसायन इनके शरीर में जमा हो जाते हैं। इससे ये पक्षियों के लिए बेस्वाद और ज़हरीली बन जाती हैं, इसलिए अधिकतर शिकारी इन्हें छूने से भी कतराते हैं।
विज्ञान के लिए पहेली
इतनी नन्ही जान इतनी लंबी और सटीक यात्रा कैसे कर लेती है, यह आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक रोचक पहेली बनी हुई है। बिना किसी नक्शे या अनुभव के, केवल एक भीतरी दिशा-बोध के सहारे ये तितलियाँ हर साल लगभग एक ही समय पर, एक ही राह पकड़ लेती हैं, जो अपने आप में हैरान करने वाला है।
चिंता की बात यह है कि बदलता मौसम और मानसून का लड़खड़ाता मिज़ाज इस नाज़ुक समय-चक्र को बिगाड़ सकता है। अगर बारिश समय से पहले या बहुत देर से आए, तो तितलियों और उन फूलों के बीच का तालमेल टूट सकता है जिन पर वे रास्ते भर अपनी ऊर्जा के लिए निर्भर रहती हैं।
एक जीवंत तमाशा
इस प्रवास को बचाए रखने के लिए ज़रूरी है कि उनके रास्ते में पड़ने वाले जंगल, घास के मैदान और फूलों से भरे कोने सुरक्षित रहें। यही वे विश्रामगृह और भोजनालय हैं, जिनके बिना यह हज़ारों किलोमीटर लंबी यात्रा संभव ही नहीं हो सकती। इन्हें बचाना पूरी यात्रा को बचाना है।
अंतरिक्ष और विज्ञान की खोजों की तरह ही, तितलियों का यह सैलाब भी मुझे बच्चों जैसी उत्सुकता से भर देता है। यह याद दिलाता है कि सबसे बड़े चमत्कार हमेशा दूर आकाश में नहीं होते, कुछ तो हमारे अपने आँगन के ऊपर, इन नन्हे पंखों पर सवार होकर हर साल चुपचाप गुज़र जाते हैं।

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