सुंदरबन से पश्चिमी घाट तक फैले जंगलों में भारत की छठी बाघ जनगणना चल रही है। हज़ारों कैमरे, तीन चरणों की पद्धति और धारियों की पहचान से हो रही यह गिनती जंगल की सेहत का आईना है।
इस समय भारत के जंगलों में एक ऐसी कवायद चल रही है, जिसका पैमाना पूरी दुनिया में सबसे बड़ा है। सुंदरबन के दलदली वनों से लेकर पश्चिमी घाट की हरी पहाड़ियों तक, हज़ारों वनकर्मी और विशेषज्ञ एक-एक बाघ की गिनती में जुटे हैं। यह सिर्फ जानवरों को गिनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह जानने की कोशिश है कि हमारे जंगल कितने स्वस्थ हैं और उनका भविष्य किस दिशा में जा रहा है।
दुनिया का सबसे बड़ा सर्वे
यह अखिल भारतीय बाघ आकलन का छठा चक्र है, जिसे राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान मिलकर करा रहे हैं। जानकारी के अनुसार, इसका मैदानी सर्वेक्षण जनवरी 2026 में शुरू हुआ और अंतिम राष्ट्रीय रिपोर्ट 2027 तक आने की उम्मीद है। अपने विशाल दायरे के कारण इसे क्षेत्रफल और भागीदारी के लिहाज़ से गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड भी हासिल है।
इस सर्वेक्षण का फैलाव समझना आसान नहीं है। यह देश के उनतीस राज्यों में, लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र में एक साथ चलाया जा रहा है। इतने बड़े इलाके को समेटने के लिए हज़ारों की संख्या में प्रशिक्षित वनकर्मी, स्वयंसेवक और वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं। यही विशाल पैमाना इस गिनती को महज़ एक सरकारी प्रक्रिया से कहीं बढ़कर एक ऐतिहासिक अभियान बना देता है।
तीन चरणों की पद्धति

यह जनगणना अंदाज़े पर नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है, जो तीन चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में मैदानी टीमें जंगल में घूमकर बाघों की मौजूदगी के अप्रत्यक्ष संकेत, जैसे पगचिह्न और मल, दर्ज करती हैं। इसके लिए एम-स्ट्राइप्स नामक मोबाइल ऐप का इस्तेमाल होता है, जो हर जानकारी को उसके सटीक जीपीएस स्थान के साथ सहेज लेता है।
दूसरे चरण में असली कमाल कैमरा ट्रैप का होता है। जंगल में चुने हुए स्थानों पर गति भाँपने वाले कैमरे लगभग चालीस से साठ दिनों तक लगाए जाते हैं, जो पास से गुज़रने वाले हर जानवर की तस्वीर अपने आप खींच लेते हैं। तीसरे और अंतिम चरण में बाघों के मल के डीएनए नमूनों की जाँच की जाती है, जिससे पहले दो चरणों में मिले नतीजों की पुष्टि हो सके।
अब सवाल उठता है कि हज़ारों तस्वीरों में एक ही बाघ को दोबारा गिनने से कैसे बचा जाता है। इसका जवाब खुद बाघ के शरीर पर लिखा है। हर बाघ की धारियों का नमूना बिल्कुल अनोखा होता है, ठीक इंसान की उँगलियों के निशान की तरह। विशेष सॉफ्टवेयर इन्हीं धारियों को मिलाकर हर बाघ को एक अलग पहचान देता है, जिससे गिनती बेहद सटीक हो पाती है।
आँकड़ों की कहानी
इस पूरी मेहनत के पीछे एक उम्मीद भरी कहानी है। साल 2006 में देश में बाघों की संख्या घटकर केवल 1,411 रह गई थी, जो एक गंभीर चेतावनी थी। लेकिन लगातार संरक्षण प्रयासों के बाद, 2022 की जनगणना में यह आँकड़ा बढ़कर 3,682 तक पहुँच गया। यह संख्या दुनिया के जंगली बाघों की करीब तीन-चौथाई आबादी के बराबर है, जो भारत को इनका सबसे बड़ा घर बनाती है।
इस बार के शुरुआती संकेत भी उत्साहजनक बताए जा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, तेलंगाना के अमराबाद बाघ अभयारण्य में कैमरा ट्रैप के ज़रिए 42 अलग-अलग बाघों की पहचान हुई, जबकि पहले यहाँ इनकी संख्या 36 थी। यह करीब सोलह प्रतिशत की बढ़ोतरी है, जो दिखाती है कि सही देखभाल मिलने पर बाघों की आबादी फिर से पनप सकती है।
सिर्फ बाघ नहीं, पूरा जंगल
यह जनगणना केवल बाघों तक सीमित नहीं है। इसके दौरान तेंदुए, जंगली कुत्ते और लकड़बग्घे जैसे अन्य शिकारियों के साथ-साथ गौर, सांभर और चीतल जैसे शाकाहारी जानवरों की भी गिनती होती है। इससे पूरे जंगल की सेहत और अलग-अलग हिस्सों के आपसी जुड़ाव का अंदाज़ा मिलता है। बाघ दरअसल एक छतरी की तरह हैं, जिनकी रक्षा से पूरा पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहता है।
बाघों के फलने-फूलने के लिए जंगलों का आपस में जुड़ा रहना बेहद ज़रूरी है, ताकि वे एक इलाके से दूसरे इलाके तक स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें। इसी सोच के तहत बुनियादी ढाँचे में भी बदलाव दिख रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के नीचे बना बारह किलोमीटर लंबा वन्यजीव अंडरपास इसी दिशा में एक कदम है, जिसका इस्तेमाल तेंदुए, हाथी और हिरण करते देखे गए हैं।
आगे की राह
बेशक चुनौतियाँ अब भी बड़ी हैं। बढ़ती आबादी और विकास के बीच जंगलों का सिकुड़ना, आवासों का टुकड़ों में बँटना और इंसान तथा वन्यजीव के बीच बढ़ता आमना-सामना, ये सब चिंता के विषय बने हुए हैं। ऐसे में हर जनगणना केवल आँकड़े नहीं देती, बल्कि यह भी बताती है कि किन जंगलों को अधिक ध्यान और सुरक्षा की ज़रूरत है, ताकि सही जगह पर सही कदम उठाए जा सकें।
जब 2027 में इस विशाल कवायद की अंतिम रिपोर्ट सामने आएगी, तो वह सिर्फ बाघों का एक आँकड़ा नहीं होगी। वह इस बात का प्रमाण होगी कि एक देश ने अपनी प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए कितनी गंभीरता से प्रयास किया। जंगल में चल रही यह खामोश गिनती दरअसल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत और समृद्ध प्रकृति सौंपने का वादा भी है।

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