भारत में बाघों की छठी अखिल भारतीय गणना जारी है, जो दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण है। बाघों की आबादी 2006 के मुक़ाबले दोगुनी हो चुकी है, पर आवास और गलियारे बड़ी चुनौती हैं।
भारत में बाघों के संरक्षण की कहानी आज दुनिया भर के लिए एक बड़ी मिसाल बन चुकी है। इस समय देश में बाघों की छठी अखिल भारतीय गणना चल रही है, जो अपने पैमाने के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण मानी जाती है। बीते दो दशकों में बाघों की आबादी में हुई ज़बरदस्त वृद्धि, संरक्षण के प्रयासों की सफलता को साफ़ दर्शाती है।
छठी अखिल भारतीय बाघ गणना
बाघों की यह गणना हर चार साल में एक बार, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान के द्वारा की जाती है। साल 2026 इसका छठा चरण है, जिसकी शुरुआत जनवरी में हुई थी। इस विशाल सर्वेक्षण को, सबसे व्यापक वन्यजीव गणना होने के लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड भी हासिल है, जो इसकी विशालता को दर्शाता है।
इस गणना में केवल बाघों की ही गिनती नहीं होती। इसके साथ तेंदुए, जंगली कुत्ते और लकड़बग्घे जैसे अन्य शिकारी जानवरों पर भी नज़र रखी जाती है, और उनके शिकार यानी दूसरे वन्यजीवों की आबादी को भी दर्ज किया जाता है। इससे पूरे जंगल के स्वास्थ्य की एक व्यापक तस्वीर सामने आती है।
आबादी दोगुनी से भी अधिक

बाघों की आबादी में हुई वृद्धि वाकई उल्लेखनीय है। साल 2022 की गणना के अनुसार, भारत में लगभग तीन हज़ार छह सौ बयासी बाघ मौजूद हैं। यह संख्या 2006 के सबसे निचले स्तर, यानी केवल एक हज़ार चार सौ ग्यारह बाघों की तुलना में, दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है, जो एक बड़ी उपलब्धि है।
आज भारत में दुनिया के लगभग पचहत्तर प्रतिशत जंगली बाघ रहते हैं, जो इसे बाघ संरक्षण के मामले में पूरी दुनिया में सबसे आगे रखता है। एक समय जब इनकी संख्या तेज़ी से घट रही थी, तब से लेकर अब तक का यह पूरा सफ़र, लगातार किए गए संरक्षण प्रयासों का ही नतीजा है।
प्रोजेक्ट टाइगर की विरासत
बाघों को बचाने की इस बड़ी मुहिम की नींव प्रोजेक्ट टाइगर ने रखी थी, जिसे साल 1973 में शुरू किया गया था। उस समय देश में करीब एक हज़ार आठ सौ बाघ हुआ करते थे, लेकिन बाद में यह संख्या लगातार घटती चली गई और 2006 तक एक बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुँच गई थी।
इसके बाद संरक्षण की रणनीतियों को और मज़बूत किया गया, जिसका असर आने वाले वर्षों में साफ़ दिखाई देने लगा। आज देश में अट्ठावन बाघ अभयारण्य हैं, जो इन शानदार जानवरों को सुरक्षित आवास और प्रजनन के लिए एक अनुकूल माहौल प्रदान करते हैं।
पहली बार गलियारों के बाहर गणना
इस साल की गणना एक और ख़ास वजह से महत्वपूर्ण है। पहली बार, बाघों की गिनती वन्यजीव अभयारण्यों के गलियारों के बाहर भी की जा रही है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर किन इलाक़ों में फैल रहे हैं और वहाँ पर उनकी वास्तविक स्थिति कैसी है।
गणना के शुरुआती नतीजे भी काफ़ी उत्साहजनक रहे हैं। तेलंगाना के अमराबाद बाघ अभयारण्य में बयालीस बाघों की पहचान की गई, जो पहले के छत्तीस बाघों की तुलना में लगभग सोलह दशमलव छह प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। यह स्थानीय संरक्षण प्रयासों की सफलता का प्रमाण है।
आगे की चुनौतियाँ
हालाँकि, इस बड़ी सफलता के साथ कुछ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बाघों की बढ़ती हुई आबादी के लिए पर्याप्त जगह और आपस में जुड़े प्राकृतिक गलियारे बेहद ज़रूरी हैं, ताकि वे एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में सुरक्षित रूप से आवाजाही कर सकें और उनकी नस्ल स्वस्थ बनी रहे।
जगह की कमी के कारण, कुछ इलाक़ों में मनुष्यों और बाघों के बीच टकराव की घटनाएँ भी बढ़ी हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि बाघ कितने हैं, बल्कि यह है कि वे स्वतंत्र रूप से कहाँ और कैसे विचरण कर सकते हैं और सुरक्षित रह सकते हैं।
संरक्षण की मिसाल
भारत की बाघ गणना 2026 यह दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर किए गए प्रयासों से, लुप्तप्राय प्रजातियों को भी संकट से बचाया जा सकता है। अब सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि इन जंगलों और उनके प्राकृतिक गलियारों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन शानदार बाघों को देख सकें।
प्रोजेक्ट टाइगर: साफ और अच्छे से समझाया.
अच्छी बात.

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