भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इस साल मॉनसून सामान्य से कमज़ोर रहा है और सितंबर में भी देश भर में कम बारिश का अनुमान है। अल नीनो के प्रभाव, तापमान और खेती पर असर को समझने की एक कोशिश।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मॉनसून केवल मौसम का एक हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। हर साल जून से सितंबर तक चलने वाली इस बारिश पर खेती, पीने का पानी और बिजली उत्पादन तक बहुत कुछ निर्भर करता है, इसलिए इसकी हर हलचल पर सबकी नज़र रहती है।
इस साल यानी 2026 में मॉनसून का बर्ताव थोड़ा निराश करने वाला रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़े बता रहे हैं कि बारिश कुल मिलाकर सामान्य से कम रही है। इस लेख में हम समझेंगे कि सितंबर का पूर्वानुमान क्या कहता है, इसके पीछे कौन से कारण हैं, और इसका असर किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
सितंबर का पूर्वानुमान
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने सितंबर 2026 के लिए देश भर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। विभाग की परिभाषा के अनुसार, इसका मतलब है कि बारिश दीर्घावधि औसत यानी एलपीए के 91 प्रतिशत से भी कम रह सकती है, जो मॉनसून के आखिरी दौर के लिए एक अहम संकेत माना जा रहा है।
आंकड़ों के लिहाज़ से देखें तो सितंबर महीने का दीर्घावधि औसत करीब 167.9 मिलीमीटर आँका गया है। हालांकि पूरे देश में स्थिति एक जैसी नहीं रहेगी, और उत्तर पश्चिम, पूर्वोत्तर, पूर्वी तथा दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में सामान्य या उससे कुछ अधिक बारिश की संभावना भी बनी हुई है।
पूरे मौसम की तस्वीर
केवल सितंबर ही नहीं, बल्कि पूरे मॉनसून सीज़न की तस्वीर भी कुछ कमज़ोर ही रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से अगस्त की शुरुआत तक देश में कुल बारिश दीर्घावधि औसत से करीब 11 प्रतिशत कम दर्ज की गई, जिसे सामान्य से नीचे की श्रेणी में रखा गया है।
यह कमी इसलिए भी मायने रखती है क्योंकि मॉनसून की बारिश साल भर के लिए बांधों और भूजल को भरने का सबसे बड़ा ज़रिया होती है। जब यह बारिश उम्मीद से कम होती है, तो उसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता पर भी दिखाई देता है।
अल नीनो की भूमिका
इस कमज़ोर मॉनसून के पीछे मौसम विभाग एक बड़ी वजह अल नीनो को मानता है। यह प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के गर्म होने से जुड़ी एक स्थिति है, जो इस समय काफी प्रबल बनी हुई है और जिसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है।
इतिहास गवाह है कि अल नीनो के वर्षों में भारतीय मॉनसून अक्सर कमज़ोर रहा है। विश्व मौसम संगठन का अनुमान है कि यह स्थिति आने वाले महीनों में और मज़बूत हो सकती है। वहीं हिंद महासागर द्विध्रुव फिलहाल तटस्थ बना हुआ है, हालांकि महीने के अंत तक इसके सकारात्मक होने की संभावना जताई जा रही है।
तापमान भी सामान्य से ऊपर
कम बारिश के साथ साथ इस बार तापमान को लेकर भी मौसम विभाग का अनुमान चिंता बढ़ाने वाला है। सितंबर में देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है, और ज़्यादातर इलाकों में रात का न्यूनतम तापमान भी सामान्य से अधिक बना रह सकता है।
कम बारिश और अधिक गर्मी का यह मेल खेती के लिए दोहरी चुनौती खड़ी कर सकता है। नमी की कमी और बढ़ते तापमान से मिट्टी जल्दी सूखती है, जिससे फसलों को अधिक सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है और किसानों की लागत तथा मेहनत दोनों बढ़ जाती है।
खेती और पानी पर असर

इन हालात को देखते हुए मौसम विभाग ने पहले से ही सतर्क रहने की सलाह दी है। विभाग ने समय रहते पानी के संरक्षण, संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल और खेती के लिए वैकल्पिक योजनाएँ तैयार रखने पर ज़ोर दिया है, ताकि कम बारिश की मार को यथासंभव कम किया जा सके।
किसानों के लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि वे मौसम विभाग की सलाह और स्थानीय पूर्वानुमानों पर नज़र रखें, और उसी के अनुसार फसल तथा सिंचाई की योजना बनाएँ। सही समय पर उठाए गए छोटे छोटे कदम भी कमज़ोर मॉनसून के असर को काफी हद तक संभालने में मदद कर सकते हैं।
आगे की राह
मॉनसून का यह मौसम एक बार फिर याद दिलाता है कि हमारी ज़िंदगी और खेती, प्रकृति के मिज़ाज पर कितनी निर्भर हैं। बदलते वैश्विक मौसम और अल नीनो जैसी घटनाओं के बीच, हर बूँद पानी की अहमियत को समझना पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।
फिलहाल सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सितंबर के बाकी दिनों में मौसम किस करवट बैठता है। साथ ही, यह पूरा घटनाक्रम जल संरक्षण और जलवायु के अनुकूल खेती की दिशा में लंबी अवधि की तैयारी को और गंभीरता से लेने का एक अवसर भी है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग पर बहुत अच्छी कवरेज.
यहाँ भारत मौसम विज्ञान विभाग के बारे में काफी कुछ सीखा.

Keep subscribing to इशा रावHer next filing reaches you the moment it publishes, on her own subdomain.
Subscribe
