अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर आर्द्रभूमि का दर्जा मिला है। पूर्वी हिमालय की इस झील की खूबियों और साथ आई धूमिल तेंदुआ संरक्षण योजना के बारे में विस्तार से जानते हैं।
पानी से भरी आर्द्रभूमि यानी वेटलैंड को अक्सर धरती के गुर्दे कहा जाता है, क्योंकि ये कुदरत के संतुलन को बनाए रखने में चुपचाप बड़ी भूमिका निभाती हैं। हाल ही में भारत ने अपनी ऐसी ही एक अनमोल धरोहर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। पूर्वोत्तर के एक शांत कोने में बसी एक झील अब दुनिया के नक़्शे पर ख़ास दर्जा पा चुकी है। इस लेख में हम इसी उपलब्धि और उससे जुड़ी संरक्षण की कोशिशों को इत्मीनान से समझने की कोशिश करेंगे।
रामसर साइट क्या है
रामसर साइट उन आर्द्रभूमियों को कहा जाता है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष महत्व का माना जाता है। यह दर्जा एक वैश्विक संधि के तहत दिया जाता है, जिसका मकसद ऐसी नमी वाली जगहों की रक्षा करना और उनका समझदारी से उपयोग सुनिश्चित करना है। झीलें, दलदल, तालाब और नदियों के किनारे जैसी जगहें असंख्य जीव-जंतुओं और पौधों को जीवन देती हैं। इसीलिए इन्हें बचाना पूरी पारिस्थितिकी के लिए बेहद ज़रूरी माना जाता है।
ग्लॉ झील की खासियत
जिस झील को यह सम्मान मिला है, वह अरुणाचल प्रदेश में पूर्वी हिमालय की गोद में बसी ग्लॉ झील है। यह एक मीठे पानी की झील है, जिसे पहाड़ों से बहकर आने वाली सदानीरा धाराएँ लगातार भरती रहती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस झील और इसके जलग्रहण क्षेत्र में डेढ़ सौ से भी ज़्यादा प्रकार के वृक्ष और लगभग उनचास किस्म के ऑर्किड यानी दुर्लभ फूलों की प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं। यह समृद्धि इसे वाक़ई अनोखा बनाती है।
101वाँ पड़ाव
ग्लॉ झील के साथ ही भारत में रामसर साइटों की कुल संख्या बढ़कर एक सौ एक हो गई है। यह आँकड़ा अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि साल दो हज़ार चौदह में देश में ऐसी साइटों की संख्या महज़ छब्बीस थी। यानी बीते वर्षों में यह संख्या कई गुना बढ़ी है। यह लगातार बढ़ता आँकड़ा पर्यावरण और जैव विविधता के संरक्षण के प्रति देश की गंभीरता और निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।
कमलांग बाघ अभयारण्य

यह झील कमलांग बाघ अभयारण्य और वन्यजीव विहार की सीमा के भीतर स्थित है, जो इसे और भी ख़ास बना देता है। कमलांग को देश का पचासवाँ बाघ अभयारण्य घोषित किया गया था, और इसकी अधिसूचना दो हज़ार सत्रह में जारी हुई थी। इसका मुख्य क्षेत्र करीब छह सौ छियानवे वर्ग किलोमीटर और बफ़र यानी बाहरी सुरक्षा क्षेत्र लगभग सत्तासी वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसके दक्षिण में मशहूर नामदफा बाघ अभयारण्य भी मौजूद है।
दुर्लभ जीवों का घर
यह पूरा इलाक़ा दुर्लभ और संकटग्रस्त वन्यजीवों का एक समृद्ध ठिकाना है। रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ मलायन सन बियर यानी एक ख़ास किस्म का भालू, हूलॉक गिबन नाम का वानर, सफ़ेद पेट वाला बगुला और टोपीधारी लंगूर जैसे संकटग्रस्त प्राणी रहते हैं। इनके साथ ही बाघ, धूमिल तेंदुआ, ढोल यानी जंगली कुत्ता और तेंदुआ बिल्ली जैसे शिकारी जीव भी इस जंगल की जान हैं। इतनी विविधता किसी एक जगह पर मिलना अपने-आप में विरल है।
धूमिल तेंदुए की योजना
इसी झील की घोषणा के आसपास एक और अहम कदम उठाया गया है, और वह है धूमिल तेंदुए के संरक्षण के लिए एक विशेष कार्ययोजना की शुरुआत। यह ख़ूबसूरत मगर शर्मीला वन्यजीव घने जंगलों में रहता है और इसे देख पाना बेहद मुश्किल होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस योजना को कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से तैयार किया गया है, ताकि इस दुर्लभ प्राणी और उसके प्राकृतिक आवास को व्यवस्थित तरीके से बचाया जा सके।
14 प्राथमिकता क्षेत्र
इस कार्ययोजना के तहत पूर्वोत्तर भारत में चौदह प्राथमिकता वाले भूदृश्यों यानी विशेष क्षेत्रों को चुना गया है, जहाँ संरक्षण के प्रयासों पर ख़ास ध्यान दिया जाएगा। इन इलाक़ों में धूमिल तेंदुए की मौजूदगी और उसके रहने के तौर-तरीक़ों को नज़दीक से समझा जाएगा। किसी प्रजाति को बचाने के लिए सबसे पहले यह जानना ज़रूरी होता है कि वह कहाँ और कैसे रहती है, और यही सोच इस योजना की नींव में है।
आधुनिक निगरानी
इस पूरे काम में आधुनिक तरीक़ों का सहारा लिया जा रहा है। रिपोर्ट बताती है कि जंगल में लगाए गए स्वचालित कैमरे, इलाक़े का सर्वेक्षण, जीवों के नमूनों की जाँच और पानी-मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जैविक निशानों का अध्ययन जैसी विधियाँ अपनाई जा रही हैं। इसके अलावा वनकर्मियों को शिकार रोकने में मदद करने वाले एक विशेष मोबाइल उपकरण का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि निगरानी और चौकसी और मज़बूत हो सके।
समुदाय की भागीदारी
संरक्षण की कोई भी कोशिश तब तक अधूरी रहती है, जब तक उसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी न हो। इसी को ध्यान में रखते हुए, इस योजना में आसपास रहने वाले लोगों की आजीविका को सहारा देने पर भी ज़ोर दिया गया है। साथ ही, चूँकि वन्यजीव सीमाओं को नहीं जानते, इसलिए पड़ोसी क्षेत्रों के बीच आपसी सहयोग को भी अहम माना गया है। जब जंगल और इंसान साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं, तभी संरक्षण टिकाऊ बन पाता है।
आर्द्रभूमि क्यों ज़रूरी
आर्द्रभूमियाँ केवल जीव-जंतुओं का घर ही नहीं होतीं, बल्कि वे पानी को साफ़ करने, बाढ़ का असर कम करने और वातावरण को संतुलित रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के इस दौर में इनका महत्व और भी बढ़ जाता है। ग्लॉ झील जैसी जगहों को संरक्षित करना केवल एक झील को बचाना नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे जीवन-चक्र और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करना है।
कुल मिलाकर, ग्लॉ झील को मिली यह पहचान और धूमिल तेंदुए के लिए बनी योजना, दोनों मिलकर एक सुखद संकेत देती हैं कि प्रकृति के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी की भावना गहरी हो रही है। ऐसी हर पहल हमें याद दिलाती है कि इस धरती के जंगल, झीलें और जीव हमारी साझा विरासत हैं। इन्हें सहेजना हम सबका कर्तव्य है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस समृद्ध और जीवंत प्रकृति का आनंद ले सकें।

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