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कानहा में वापसी: सौ साल की खामोशी के बाद जंगल में फिर गूंजे मछेरों के सींग

इशा राव इशा राव isharao.avalw.com · 307 reads Respect0 Save Share Read only
READS6live count PUBLISHED12 Oct2026 READING TIME4 min840 words LANGUAGEHindi
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मध्य प्रदेश के कानहा टाइगर रिज़र्व में असम की कज़िरंगा से लाए गए 8 जंगली मछेरों को रिहा किया गया। यह सौ साल बाद राज्य में इस प्रजाति की वापसी है और सरकार की तीन साल में 50 मछेरे बसाने की योजना का पहला कदम।

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कानहा की ज़मीन पर फिर गूंजी मछेरों की आवाज़

सुबह की पहली किरणें सुपखर रेंज की घास पर पड़ी थीं, जब वन विभाग के कर्मचारी ने भारी लोहे के गेट को खोला। मुख्यमंत्री मोहन यादव वहीं खड़े थे। आठ विशाल मछेरे बाहर निकले और जंगल की गंध को सूंघने लगे। यह कोई रियालिटी शो का दृश्य नहीं था, बल्कि मध्य प्रदेश के वन इतिहास में एक मौन पन्ना का पलटन था, जहाँ सौ साल की गैरहाज़िरी के बाद यह प्रजाति फिर से अपनी ज़मीन पर कब्जा करने आई है।

ये जानवर लगभग 2,200 किलोमीटर का सफर तय करके यहाँ पहुँचे हैं, जो असम की कज़िरंगा राष्ट्रीय उद्यान से शुरू हुआ। इस प्रक्रिया में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी जगह छह मादा और दो नर मछेरों को एक हेक्टेयर के क्वांटिटन शेल्टर में रखा गया था, जहाँ उनका स्वास्थ्य और व्यवहार का परख लगाई गई, ताकि वे मध्य प्रदेश की जलवायु और भोजन शृंखला से जुड़ सकें।

अब इन्हें 17 हेक्टेयर के बड़े कंजर्वेशन इन्क्लोजर में छोड़ा गया है। यहाँ का माहौल प्राकृतिक जंगल जैसा ही है, जिससे इन्हें अपने नए घर को स्वीकार करने का समय मिलेगा। यादव का मानना है कि मानसून के बाद इनकी आदतें पूरी तरह बदल जाएँगी और तभी उन्हें खुले आवास में छोड़ा जाएगा। यह धीमे और सोच-समझे हुए कदम पर आधारित है, क्योंकि प्रकृति को वापस बुलाने में जल्दबाजी बजाय रणनीति और धैर्य की ज़रूरत होती है।

एक सदी की खामोशी का अंत

मध्य प्रदेश के जंगलों में मछेरों की आवाज़ लगभग एक सदी पहले ही गायब हो गई थी। वन विभाग ने सुपखर रेंज को चुना है क्योंकि वहाँ के भूगोल और वनस्पति में ऐतिहासिक सबूत मिलते हैं कि यह इलाका कभी मछेरों का प्राकृतिक आवास था। यह केवल जानवरों को वापस लाने की कोशिश नहीं, बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकीय शृंखला को फिर से जोड़ने का प्रयास है, जो वन्यजीव समुदाय की संतुलन को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सरकार ने तीन साल के भीतर 50 जंगली मछेरों को बसाने का लक्ष्य रखा है। यह संख्या अभी छोटी लग सकती है, लेकिन सौ साल की खामोशी के बाद यह एक नया अध्याय लिख रहा है। यह योजना केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि गुणवत्ता पर भी केंद्रित है, जिसमें प्रत्येक मछेरे के स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है।

मछेरे जंगल के वास्तविक इंजीनियरों में गिने जाते हैं। वे जमीन को उखाड़ते हैं, नई घास को जगह देते हैं और अन्य वन्यजीवों के लिए रास्ते बनाते हैं। इसलिए उनकी वापसी का असर कानहा के हर कोने में महसूस होगा। यह केवल एक प्रजाति की वापसी नहीं, बल्कि पूरे जंगल के स्वास्थ्य को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कानहा के जंगलों में वापसी के बाद मछेरों का एक विशाल और शक्तिशाली रूप।
कानहा के जंगलों में वापसी के बाद मछेरों का एक विशाल और शक्तिशाली रूप।

बाघ और चिंकारे के लिए नई उम्मीदें

यह परियोजना केवल मछेरों तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 7 अक्टूबर को घोषित की गई एक और बड़ी योजना का ज़िक्र किया। नौरादेही में बाघों के लिए एक तीसरे आवास को रानी दुर्गावती का नाम देकर विकसित किया जाएगा। यह कदम बताता है कि राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण को एक समग्र दृष्टि के साथ देख रही है, जहाँ हर प्रजाति की आवश्यकताओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

जंगली मछेरों की उपस्थिति बाघों और चिंकारों जैसे शिकारी जानवरों के लिए भी लाभदायक हो सकती है, क्योंकि यह जंगल में एक संतुलित पारिस्थितिकीय संतुलन कायम रखने में मदद करती है। मछेरे घास को काटकर नई वनस्पति के विकास को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे हिरण जैसे शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ती है, और इस प्रकार शिकारी-शिकार संतुलन बना रहता है।

यादव का दावा है कि नक्सलवाद को समाप्त करने से इन क्षेत्रों में विकास और संरक्षण के नए रास्ते खुल गए हैं। यह एक ऐसा समय है जब सशस्त्र संघर्ष की जगह अब जंगल की संरक्षण और प्रकृति के साथ मिलकर रहने की कला को महत्व दिया जा रहा है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था ने वन्यजीव संरक्षण को एक नया आयाम दे दिया है।

कानहा टाइगर रिज़र्व के सुपखर रेंज में बना 17 हेक्टेयर का सुरक्षित आवास, जहाँ मछेरों को स्थानांतरित किया गया है।
कानहा टाइगर रिज़र्व के सुपखर रेंज में बना 17 हेक्टेयर का सुरक्षित आवास, जहाँ मछेरों को स्थानांतरित किया गया है।

प्रकृति का पुनर्जन्म: एक चुनौती और अवसर

जंगली मछेरे को वापस लाना एक आसान काम नहीं है। इनके पास अपनी अलग व्यवस्था होती है, और उन्हें नए माहौल में जीवित रहने के लिए समय चाहिए। असम के कज़िरंगा से लेकर मध्य प्रदेश के कानहा तक का यह सफर दर्शाता है कि प्रकृति की सीमाएँ अब केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक भी हो सकती हैं। इस प्रक्रिया में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे कि बीमारियों से बचाव और स्थानीय वन्यजीवों के साथ अंतर्व्यवस्था।

जब दो अलग अलग राज्यों के बीच सहयोग होता है, तो वन्यजीव संरक्षण एक राष्ट्रीय पहल बन जाता है। यह मध्य प्रदेश के लिए एक गर्व का विषय है कि वह अपनी जंगलों में इतिहास को फिर से जीवंत कर रहा है। इस सहयोग से न केवल वन्यजीवों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि वैज्ञानिक ज्ञान और संरक्षण प्रबंधन की तकनीकें भी सुधरेंगी।

अगले तीन सालों में यह देखा जाएगा कि क्या ये 50 मछेरे कानहा की ज़मीन को अपना घर मान पाते हैं। यदि यह सफल रहा, तो यह भारतीय वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होगा। यह सफलता केवल मछेरों की वापसी नहीं, बल्कि भारत के वन नीति और प्रबंधन के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक होगी।

मुख्यमंत्री मोहन यादव और वन विभाग के अधिकारी मछेरों के विजयदशमी के अवसर पर आगमन का साक्षी बनते हुए।
मुख्यमंत्री मोहन यादव और वन विभाग के अधिकारी मछेरों के विजयदशमी के अवसर पर आगमन का साक्षी बनते हुए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कानहा में वापसी के लिए कितने मछेरे लाए गए थे और वे कहाँ से आए?

कानहा में असम की कज़िरंगा राष्ट्रीय उद्यान से आठ मछेरे लाए गए हैं। इनमें छह मादा और दो नर मछेरे शामिल हैं, जिन्होंने लगभग 2,200 किलोमीटर का सफर तय किया है।

मध्य प्रदेश की सरकार ने अगले तीन वर्षों में मछेरों की संख्या बढ़ाने का क्या लक्ष्य रखा है?

सरकार ने अगले तीन सालों के भीतर कानहा में 50 जंगली मछेरों को बसाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह योजना केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक जानवर के स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर भी ध्यान केंद्रित है।

मछेरों को कानहा में छोड़ने से बाघों और चिंकारों जैसे शिकारी जानवरों को क्या लाभ होगा?

मछेरों की उपस्थिति से जंगल में पारिस्थितिकीय संतुलन बना रहता है, जिससे बाघों और चिंकारों को भी लाभ होता है। मछेरे नई घास और वनस्पति के विकास को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे हिरण जैसे शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ती है।

सुपखर रेंज को मछेरों के लिए नए आवास के रूप में क्यों चुना गया?

सुपखर रेंज को इसलिए चुना गया क्योंकि वहाँ के भूगोल और वनस्पति में ऐतिहासिक सबूत मिलते हैं। यह इलाका कभी मछेरों का प्राकृतिक आवास था, इसलिए इसे वापसी के लिए उपयुक्त माना गया है।

मछेरों को कानहा के खुले जंगल में कब छोड़ा जाएगा?

मछेरों को मानसून के बाद खुले आवास में छोड़ा जाएगा। इससे पहले उन्हें 17 हेक्टेयर के बड़े कंजर्वेशन इन्क्लोजर में रखा गया है ताकि वे नए माहौल और जलवायु से जुड़ सकें।

कानहा में मछेरों की वापसी के लिए असम सरकार ने क्या भूमिका निभाई?

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की टीम ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कज़िरंगा राष्ट्रीय उद्यान से मछेरों को मध्य प्रदेश तक ले जाने और उनकी तैयारी में मदद की।

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इशा राव 2026-10-12 · 4 min read · 6 reads
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